नितिन त्रिपाठी-
हरिद्वार में रेलवे स्टेशन से उतर अपर रोड स्थित होटल में जाना था. साथ में कई बुजुर्ग लोग भी थे और एक बुजुर्ग महिला भी थीं, व्हील चेयर भी थी. एक रिक्शे पर सामान रख होटल की ओर चले. भयंकर भीड़ और ट्रैफ़िक धीमे धीमे मूव कर रहा था. अकस्मात् एक होम गार्ड भागता हुआ आया और रिक्शे वाले का कॉलर पकड़ डंडा फटकारता हुआ गाली गलौज करने लगा – इधर आये कैसे.
मैंने प्रश्न किया, लिखा था कि इधर आना मना है? बैरियर लगा है? कोई पुलिस / होम गार्ड ड्यूटी पर है जो बता रहा हो इधर प्रवेश वर्जित है? उत्तर, नहीं. आगे भी ढेरों रिक्शे जा रहे हैं, पीछे भी दसियों आ रहे हैं. हमें इससे मतलब नहीं हमको अभी आदेश मिला है इधर कोई रिक्शा नहीं होना चाहिए. और उसने सारे रिक्शे वालों को ऑन द स्पॉट गाली गलौज करते हुवे मुड़वाया. भयंकर जाम लग गया जो फिर रात तक न हटा.
संक्षेप में यही है आपदा प्रबंधन ट्रिक चार धाम की. कोई तैयारी नहीं, कोई प्रबंध नहीं. जब कुछ हो जाता है तो निर्णय लिये जाते हैं सब कैंसिल. यात्रा पर्ची है, पर कोई लिमिट नहीं, अनलिमिटेड इशू हो रही थीं ऑफलाइन. पर्ची इशू हो गई पर उसके बाद भी कोई विशेष चेक नहीं.
सोन प्रयाग से गौरी कुंड सूमो सिस्टम कोई कंट्रोल नहीं.
सबसे वर्स खच्चर व्यवस्था और सफ़ाई. पूरा रास्ता गीला फिसलन भरा, लीद और यूरिन से महकता हुआ. खच्चरों पर कोई कंट्रोल नहीं. कश्मीर से खच्चर चलाने वाले हज़ारों मुस्लिम बुला लिये हैं स्थानीय खच्चर ओनर्स ने. पैसा आ रहा है, धंधा है पर गंदा है. खच्चर को न खाना देते हैं न आराम. रास्ते भर नब्बे प्रतिशत सड़क पर इनका क़ब्ज़ा और दादागिरी.
ऊपर स्टे में ऑनलाइन बुकिंग की है, ज्यादा भीड़ है, लेट हो गए, रूम महँगा उठ रहा है उठा दिया जाएगा जो कर पाओ कर लो. इतना हेलीकॉप्टर का शोर जैसे कोई युद्ध क्षेत्र हो.
इतना कंस्ट्रक्शन कि पूछो मत. मंदिर परिसर के अंदर शंकराचार्य मूर्ति के पास भी अवैध टेंट लगे हैं.
और मंदिर में प्रवेश के समय कोई सिंपल मेटल स्कैनर चेक तक नहीं. संक्षेप में जितने तरीक़े से बर्बाद किया जा सकता है किया जा रहा है.
इन सबके बीच ज़्यादातर तीर्थ यात्री वैसे ही हैं जैसे होने चाहिए. यस हज़ारों में एकाध ऐसे भी मिल जाएँगे जो ऊपर दारू भी पीते हैं. यस रील बनाने वाले भी होते होंगे, मुझे दिखे तो नहीं पर सोसल मीडिया पर अवश्य रील्स दिखीं. यस होंगे लाखों में एकाध. वह सारी प्रवृत्तियाँ हैं तीर्थ यात्रियों में जो सामान्यतः सब जगह होती हैं. लाइन तोड़ने वाले भी, गंदगी फैलाने वाले भी.
पर यही तो कार्य होता है प्रबंधन का. आप नियम बना दो एक दिन में दस हज़ार लोग. आप नियम बना दो आने वालों से दस हज़ार टैक्स जो दो दिन से ज्यादा रुके. आप नियम बना दो जिस समय एंट्री लिखी है उसी समय जाने देंगे. खच्चर / हेली कॉप्टर / सूमो नियम से चलाओ. एक झटके में पूरी व्यवस्था सुधर जायेगी. ईको सिस्टम भी सम्भलेगा. तीर्थ यात्री जहां जाता है वहीं के नियम से चलता है. वैष्णो देवी जाता है डीजे लेकर जाता है. केदारनाथ जाता है मन ही मन ॐ नमः शिवाय बोलता जाता है.
लेकिन ले देकर चाहे वह सोसल मीडिया हो या प्रशासन एक्चुअल वर्क की जगह फ़ोकस है हवा हवाई मुद्दों पर. रील्स /डांस /म्यूजिक जैसे मुद्दों को बग़ैर वजह तूल दिया जा रहा है. यह सब बैन होना चाहिए था पहले से ही. पर इनकी आड़ में मूल विषय पूरी तरह से दबा दिए गए. उन पर कोई चर्चा ही नहीं. बिज़नस एज यूजअल है.

केदारनाथ जाकर एहसास होता है कि वाक़ई दुनिया शिव ही चला रहे हैं अन्यथा उसे बर्बाद करने में जिन्हें वर्तमान में रहने और चलाने का हक़ मिला है उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी है.
नोट: पूरी यात्रा में दो विभाग की विशेष तारीफ़ बनती है. 1) यात्रा के दौरान शौचालयों की व्यवस्था अभूतपूर्व है. पर्याप्त शौचालय हैं और वेल मेंटेण्ड नीट क्लीन हैं. हैट्स ऑफ. 2) परिसर में पुजारियों ने ठीक ठाक सिस्टम मेण्टेन किया हुआ है. इतनी अव्यवस्थाओं के बावजूद उनका सिस्टम कार्य कर रहा है परफ़ेक्ट. हैट्स ऑफ.



