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यूट्यूबर रुचि तिवारी वाला केस भी ऐसा ही है!

आराधना मुक्ति-

प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ ऐसे ही नहीं कहा जाता है। पत्रकारिता एक ज़िम्मेदार और गम्भीर जॉब है। इसके लिए बाकायदा कोर्स होता है। किसी कार्यक्रम में पत्रकारों को विशेष सुविधा दी जाती हैं। उनके लिए कुर्सियाँ आरक्षित होती हैं। बिना पहचान पत्र कोई पत्रकार कहीं भी जाकर किसी से भी कुछ भी नहीं पूछ सकता।

एक ज़िम्मेदार पत्रकार पहले सामने वाले से पूछता है कि क्या मैं आपका इंटरव्यू ले सकता हूँ, फोटो खींच सकता हूँ। सामने वाला मना कर दे तो वह वहाँ से हट जाता है।

इधर एक चलन हो गया है एक कैमरामैन और माइक लेकर कहीं भी घुसकर वीडियो बनाने लगना। यह प्रवृत्ति तबसे अधिक बढ़ी है, जबसे यूट्यूब ने मोनेटाइजेशन शुरू किया। जिसे देखो वही पत्रकार बना घूम रहा है, जबकि उन्हें पत्रकारिता के कोर्स के दौरान सिखाए जाने वाले नियमों और एथिक्स की न जानकारी होती है, न कोई परवाह।

यूट्यूबर रुचि तिवारी वाला केस भी ऐसा ही है। उन्होंने प्रोटेस्ट कर रहे युवाओं के बीच घुसकर जैसा व्यवहार किया वह पत्रकारिता तो कहीं से भी नहीं है, उल्टे यह प्रवृत्ति बहुत खतरनाक भी है। उसके बाद क्या-क्या हुआ इस मामले को जानने वालों को पता है।

यह समय इस तरह अनाधिकृत लोगों के के द्वारा कानून हाथ में लेने वालों का विरोध करने का है। कल से तीन-चार ऐसे वीडियो देखें जहाँ लोगों ने इंटरव्यू लेने वाले या दूसरी तरह की पूछताछ करने वालों से आईडी माँगनी शुरू कर दी। बेचारे आईडी तो दे नहीं पाए, उल्टा वहाँ से भागना पड़ा। हम सभी को इस तरह की कोशिश करने वालों का विरोध करना पड़ेगा। सीधे आईडी माँगिए।

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