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आज के अखबार गा रहे हैं प्रधानमंत्री ने कहा, कांग्रेस का ‘सड़ा हुआ तंत्र’ उसके कुकर्मों को नहीं छिपा सकता

संजय कुमार सिंह

अमित शाह करीब 12 सेकेंड के एक वायरल वीडियो में यह कहते हुए देखे जा रहे हैं कि अंबेडकर का नाम लेना ‘फैशन’ हो गया है और उनका नाम इतना लिया जाता है कि भगवान का लेते तो सात जन्म के लिए स्वर्ग सुनिश्चित हो जाता। उनके इस कथन पर और लोगों के साथ मुझे भी एतराज है कि सात जन्म के लिए स्वर्ग सुनिश्चित हो जाता यह अमित शाह की राय है, आस्था और श्रद्धा भी हो सकती है लेकिन इसपर यकीन करने का कोई कारण नहीं है। उन्हें एक धर्म निरपेक्ष देश में, लोकतंत्र के मंदिर में सरकारी खर्चे पर अपनी इस धार्मिक आस्था का प्रचार करने की कोई जरूरत नहीं है। उनका काम नहीं है। जो लोग भगवान को नहीं मानते उनके लिए इस बात का कोई मतलब नहीं है, जो मानते हैं उनके लिए भगवान का प्रचार बढ़ा-चढ़ाकर करना है और उनकी बातों की सत्यता की जांच का कोई तरीका नहीं है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को संसद में ऐसा नहीं कहना चाहिये था। इसके कई कारण हैं और इनमें पहला तो यही है। नवोदय टाइम्स की एक खबर के अनुसार मायावती ने कहा है कि दलितों और उपेक्षितों के लिए एकमात्र भगवान केवल बाबा साहेब अंबेडकर हैं। उन्होंने यह भी कहा है अंबेडकर की वजह से इन वर्गों को सात जन्मों तक का स्वर्ग मिल गया था, जब संविधान में उन्हें कानूनी अधिकार दिये गये थे। मैं मायावती से सहमत नहीं भी होऊं तो वे दलितों और उपेक्षितों के एक बड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं और ऐसे भगवान का नाम लेना ‘फैशन’ नहीं हो सकता है। और जिस अंदाज में कहने का वीडियो है ना उसे सही ठहराया जा सकता है।

तीसरी बात राज्यसभा अध्यक्ष और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान बार-बार यह कहना कि नथिंग विल गो ऑन रिकार्ड से यह समझ बनी है कि जो रिकार्ड में जाता है वह उपराष्ट्रपति की सहमति से सहमति से और बेकार या बेमतलब की बातें रिकार्ड में नहीं जाती हैं  यानी रिकार्ड में कुछ आपत्तिजनक दर्ज नहीं होगा। ऐसे में बहुत संभावना है कि अमित शाह ने जो कहा उसे रिकार्ड में दर्ज नहीं किया गया हो। अगर पहले ध्यान नहीं दिये जाने के कारण दर्ज हो गया हो तो अब उसे हटाया जा सकता है और कहा जा सकता है कि उन्होंने कहा भी तो वह रिकार्ड में दर्ज नहीं है इसलिए उससे नाराजगी का कोई मतलब नहीं है। सरकार और राज्यसभा द्वारा ऐसा नहीं कहना बताता है कि इस मामले में उसे कुछ नहीं कहना है जबकि कहने भर से जरूरी नहीं है कि विपक्ष मान जाता पर लगता कि सरकार उस दिशा में गंभीर नहीं है। लेकिन सरकार ऐसा कुछ नहीं करके अमित शाह ने जो कहा उसके किसी तरह आपत्तिजनक होने से इनकार कर रही है। नवोदय टाइम्स में एक शीर्षक है, मोदी ने किया जोरदार बचाव। और बचाव भी कैसे? कांग्रेस के तंत्र को सड़ा हुआ कहकर (यह अमर उजाला के शीर्षक में है)।

कांग्रेस का तंत्र सड़ा हुआ हो भी तो अमित शाह, केंद्रीय गृहमंत्री को दलितों के भगवान के बारे में ऐसी टिप्पणी करने की कोई जरूरत नहीं थी। अगर हो ही गई थी तो माफी मांग लेना, उसे रिकार्ड से हटा देना सामान्य तरीका था। वैसे भी, विरोध सिर्फ कांग्रेस नहीं कर रही है पर प्रधानमंत्री को अपनी व्यवस्था में सिर्फ कांग्रेस दिख रही है और वे इसे कुकर्मों को छुपाना कहना चाह रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि कांग्रेस के ‘कुकर्मों’ का प्रचार करके ही भाजपा को सत्ता मिली है और इनमें ज्यादातर झूठ हैं और अगर कुकर्म किसी ने किया है तो वह कांग्रेस नहीं कोई और है और कांग्रेस ने जो किया है उसे छिपाने की जरूरत नहीं है, सब कुछ सर्वविदित है। छिपाने और बचाने का काम तो सरकार की पूरी सिस्टम कर रही है। अपनी गलती तो कोई भी  छिपाता है। सरकार का काम नहीं है कि वह अपनी गलती छिपाये। यहां यह भी दिलचस्प है कि कांग्रेस को अपने कुकर्म छिपाने होते तो वह आरटीआई कानून नहीं लाती और सरकार के पास कुछ छिपाने को नहीं रहता तो आरटीआई कानून का यह हाल नहीं हुआ होता। इन सबके बावजूद आज के अखबार सरकार का गा रहे हैं और खुल कर, पूरी बेशर्मी से। सरकार का मकसद चाहे जो हो वह शाह के कहे तो रिकार्ड से निकालने की बात करके भी गलत स्वीकार करत दिख सकती थी लेकिन भाजपा गलती करती ही नहीं है। क्योंकि ईवीएम उसके साथ है और ईवीएम का विरोध करने की ‘गलती’ को खुद भूल चुकी है।

आज द हिन्दू को छोड़कर मेरे सभी अखबारों में यही खबर लीड है। शीर्षक से पता चलेगा कि कांग्रेस का कैसा या कितना समर्थन है या विरोध है तो कैसा। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, विपक्ष ने नहीं चलने दी संसद, शाह बोले भाषण तथ्यात्मक, झूठ फैला रही है कांग्रेस। कहने की जरूरत नहीं है कि तथ्यात्मक कहें या कुछ और उसे साबित करने का कोई तरीका नहीं है और यकीन वही करेगा जिसके पीछे ईडी, सीबीआई लगी हो या लगा दी जाये। अमित शाह का जवाब उपशीर्षक है, नहीं किया अपमान, इस्तीफे से नहीं गलेगी दाल। अब दाल नहीं गलने का यह आत्मविश्वास भाजपा के लोगों को कहां से कैसे आता है समझना मुश्किल नहीं है। यहां यह बताना दिलचस्प होगा कि द हिन्दू में आज संपादकीय पन्ने पर चुनावी ईमानदारी पर सामग्री है और इसका शीर्षक है, चुनाव आयोग को बहुत सारे जवाब देने हैं और यह ईवीएम के बारे में नहीं है। इसमें कहा गया है कि चुनाव के सिलसिले में पार्टियां गंभीर मुद्दों को नजरअंदाज कर रही हैं। दि हिन्दू ने अमित शाह से संबंधित इस विवाद को पहले पन्ने पर नहीं लिया है और बताया है कि यह अंदर पेज 11 पर है।

नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, गृहमंत्री के बयान पर हंगामा। इसपर अमित शाह का पक्ष ज्यादा शब्दों में है और शीर्षक भी उन्हीं की बात बताता है। सपने में भी नहीं सोच सकता अंबेडकर का अपमान। अभी तक का तरीका तो यही रहा है कि शीर्षक के साथ जोड़ा जाना चाहिये था, …फिर भी आपको (उनके प्रशंसकों) को बुरा लगा तो खेज जताता हूं और आगे से इसका ध्यान रखूंगा। जबकि उन्होंने जो कहा है उसका मतलब यह है कि स्वर्ग दिलाने वाले भगवान के रूप में अंबेडकर से बेहतर उनके भगवान हैं। मायावती ने जो कहा है उसका यही मतलब। अखबार वाले जब शाम में अखबार बना रहे होते हैं तो सारी खबरें सामने होती हैं और इसी आधार पर खबरों का प्लेसमेंट या उसे दिया जाने वाला महत्व तय किया जाता है। दिल्ली में भाजपा की इस राजनीति के मुकाबले आम आदमी पार्टी की आज की घोषणा ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उसकी सरकार बनी तो दिल्ली में 60 पार वालों का इलाज फ्री होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि इसे अखबारों ने वहा महत्व नहीं दिया है जो दिया जाना चाहिये था।

इंडियन एक्सप्रेस में यह दो कॉलम की खबर है जबकि लीड छह कॉलम में है। शीर्षक है, अंबेडकर पर टिप्पणी के लिए विपक्ष ने शाह का इस्तीफा मांगा, प्रधानमंत्री ने कांग्रेस उसके सड़े हुए इकोसिस्टम की आलोचना की। इसके साथ की एक खबर का शीर्षक है, जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कहा हुआ है। कांग्रेस के संदिग्ध झूठ उसके कुकर्मों, अंबेडकर के अपमान को छिपा नहीं सकते। कोई भी कहेगा कि कांग्रेस ने अंबेडकर का अपमान किया इसलिए भाजपा भी करेगी? और भाजपा को अंबेडकर के अपमान की चिन्ता थी तो पहले ही कहना चाहिये था। अब क्यों कह रहे हैं। अब कहने का मतलब तो कोई बच्चा भी समझ जायेगा लेकिन मुख्यधारा के अखबारों के कई संपादकों को नहीं समझ में आया। एक्सप्रेस ने शाह का कहा यह भी छापा है कि उनके बयान को तोड़फोड़ कर पेश किया गया। लेकिन ऐसा है तो उन्हें पुलिस में शिकायत करनी चाहिये और पुलिस में शिकायत तब करते जब सच बोल रहे होते। वीडियो सबने देखा है उसी तरह जैसे कन्हैया का देखा था। कन्हैया मामला अभी तक आगे नहीं बढ़ा और इसमें एफआईआर ही नहीं हुई। 

टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, अंबेडकर विवाद : शाह की टिप्पणी पर सरकार, विपक्ष आमने-सामने। इसके साथ एक खबर का शीर्षक है, तृणमूल ने गृहमंत्री के खिलाफ राज्यसभा में विशेषाधिकार नोटिस दायर की। यहां और लोगों के साथ ममता बनर्जी का कोट भी है जो आज कम छपा है। उन्होंने कहा है, मुखौटा उतर गया है। यह (शाह की टिप्पणी) भाजपा की जातिवादी और दलित विरोधी मानसिकता का प्रदर्शन है। एक्सप्रेस की खबर से लग रहा था कि मामला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है। आज के कई अखबारों में मुंबई तट पर नौसेना के स्पीड बोट की टक्कर में 13 लोगों की मौत की खबर प्रमुखता से है। नौसेना की नाव से दुर्घटना का कारण सेना की मनमानी का मामला भी हो सकता है और जहां आम जहाज चलते हैं वहां नौसेना की नौका को नियंत्रण में रहना न्यूनतम जरूरी है। अब इस दुर्घटना के बाद अगर कुछ किया जायेगा तो वह पहले ही किया जाना चाहिये था और पहले किया गया होता तो इन 13 लोगों की जान बच सकती थी। 

दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है अंबेडकर पर युद्ध में विस्फोट, विपक्ष ने शाह की बर्खास्तगी की मांग की। इसपर अमित शाह ने जो कहा है उसमें ना तर्क है ना ताकत लेकिन कई अखबारों ने छापा है। यहां लीड के साथ शाह का आरोप है, कांग्रेस अंबेडकर विरोधी है, तथ्यों को तोड़ मरोड़ रही है। मुद्दा यह है कि कांग्रेस भाजपा से पुरानी पार्टी है और जैसी है सब जानते हैं। भाजपा ही नये-नये आरोप लगाती रही है जो साबित नहीं हुआ है। एक और खबर के अनुसार प्रधानमंत्री ने अमित शाह का समर्थन किया है और कांग्रेस की आलोचना की। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, अंबेडकर पर चल रहे जोरदार विवाद में मोदी शाह का पलट वार। कल राज्यों के जरिये यूसीसी लाने की खबर छपी थी। आज उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि उत्तराखंड में अगले महीने यूसीसी लागू हो जायेगा। इससे आप समझ सकते हैं कि भाजपा की प्राथमिकता कौन से काम करने में है और उसमें जनहित का क्या हो रहा है। ऐसे में द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक सरकार के प्रति थोड़ी सी आलोचना लिये हुए है। यहां फ्लैग शीर्षक है, अंबेडर पर विवाद ने प्रधानमंत्री को अग्निशमन के लिए मजबूर किया। मुख्य शीर्षक है, शाह के बचाव में शहंशाह आगे आये।

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