अखिलेश आनंद-
रवीश जी! बतौर पत्रकार मैं आपकी इज़्ज़त करता हूँ लेकिन हर पत्रकार को आपके गढ़े शब्द की वजह से बेइज़्ज़त होना पड़ रहा है.
आज भी ज़्यादातर पत्रकार ना तीन में हैं, ना तेरह में. उन्हें कहीं से लिफाफा नहीं मिलता. नौकरी करते हैं, सैलरी आती है.. घर चलता है. नौकरी से निकाल दिए जाते हैं. घर बैठ जाते हैं लेकिन ये जो पत्रकारों की मॉब लिंचिंग शुरू हो गई है वो बहुत खतरनाक है.
जंतर मंतर पर महिला जर्नलिस्ट के साथ दुर्व्यवहार हुआ. उनकी लिंचिंग हुई. कुछ साथियों ने बताया उन पर थूका गया. क्या आपको ये सही लगता है?
भीड़ कैसे ईमानदारी और बेईमानी का सर्टिफिकेट देकर मारपीट कर सकती है? जब किसी के सामने माइक आए तो उसका अधिकार है मना कर सकता है या उसके मुताबिक जो ग़लत हैं उनका नाम लेकर उन्हें दलाल बोल दे लेकिन सभी को एक तराजू में तौल देना आपको जायज़ लगता है?
ये किसी को नहीं भूलना चाहिए कि जो आपको माइक थामे फील्ड में दिख रहा है वो नौकरी भी कर रहा है. मॉब लिंचिंग उतना ही खतरनाक है जितना किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिसिया लाठी।
कृष्ण कांत-
नफरत के सौदागर गोदी मीडिया को अपने प्रति जनता की नफरत देखकर बुरा लग रहा है।
ये वही लोग हैं जिन्होंने जीवन भर कलम घसीटने वाले लेखकों को “टुकड़े टुकड़े गैंग” कहकर यह खेल शुरू किया था।
सत्ता की गोद में बैठे एंकर-एंकराइन बहुत बेचैन हैं कि रवीश कुमार ने उनको गोदी कहकर बदनाम कर दिया।
बेचारे कितने मासूम हैं! मालिक की तरह ये भी जनता को बेवकूफ समझते हैं। आपको रवीश ने नहीं, आपकी नफरत की सौदागरी ने बदनाम किया।
जब आप सत्ता के खिलाफ खड़े बुद्धिजीवियों को टुकड़े टुकड़े गैंग बता रहे थे, तब तक किसी ने आपको गोदी मीडिया नहीं कहा था।
जब आप हर कैंपस में देशद्रोही ढूंढ रहे थे, तब किसी ने आपको गोदी मीडिया नहीं कहा था।
शुरुआत आपने की थी।
जब आप किसान आंदोलन में पहुंचे तो उनको खालिस्तानी बताया।
आप छात्रों के आंदोलन में पहुंचे तो छात्रों को विदेशी टूल किट का औजार बताया।
आपने प्रदर्शन में मुसलमान देखा तो उनको सीधा पाकिस्तानी एजेंट बताया। आप मजदूरों के आंदोलन में गए तो उनको वामपंथी आतंकी बताया।
फिर वह शुरू हुआ जिसके आप काबिल थे। किसान आंदोलन के बाद आप लोग हर प्रदर्शन से भगाये गए, लतियाये गए।
यह गलत है। खतरनाक है। अलोकतांत्रिक है। हिंसक है। लेकिन शुरुआत आपने की थी। आप तो चौथा खंभा थे। आप हत्थे से उखड़ गए। सत्ता के टुकड़े खाकर नशे में आ गए। जनता कोई खंभा नहीं है। वही सिर्फ बुनियाद की मिट्टी है।
अब आपका सामना उस मिट्टी से हुआ है जिसमें आप धंसने के भी काबिल नहीं पाए गए। अब इसका खामियाजा निर्दोष पत्रकारों को भी भुगतना पड़ रहा है।
हैरानी की बात है कि कोई पत्रकार उस संरचना को दोष नहीं दे रहा है जिसमें मीडिया मालिक सत्ता से गठबंधन करके जहर का कारोबार करते हैं, पत्रकार को इस्तेमाल करते हैं और अपने चैनल पर जनता को देशद्रोह का सर्टिफिकेट देते हैं।
जिस जनता को आपने देशद्रोही कहा, टुकड़े टुकड़े गैंग बताया, उन्हीं में से कुछ ने आपके प्रति जरा सा तो द्रोह किया है, आप अभी से बुरा मान रहे हैं? यह खतरनाक खेल आपने शुरू किया था।
अगर अपनी साख वापस पानी है तो अपने जहरखुरान मालिकों से कहो कि आपसे जहरखुरानी करवाना बंद करें। आप वह नफरत का कारोबार करने से इनकार करो, वरना अंजाम भुगतने को तैयार रहो। समय का चक्र क्रूर होता है और उकताई जनता आपकी तरह समझदारी से मलाईदार पैकेज नहीं चुनती।
आपकी हरकतों का जो अंजाम होना है, वह सोचने में भी डरावना है। अभी समय है। प्लीज इसे ठीक कर लीजिए। लोकतंत्र में लौट आइये। जनता के साथ खड़े होकर जनता के सवाल पूछना शुरू कर दीजिए।
जिस जनता को आप सालों से द्रोही कहते आए हैं, उसके द्रोह का सामना न आप कर सकते हैं, न आपके मालिकान। जमीन पर रहिए, आप भी सुखी रहेंगे, देश भी।
Related News…


