संजय सिन्हा-
आप पत्रकार नहीं हैं, जितनी जल्दी मान लें, अच्छा रहेगा
नमस्कार, मैं संजय सिन्हा। ssfbNews पर आज पेश है पत्रकारों की शिकायत पर जवाब।
आप पत्रकार नहीं हैं। आपको यह मान लेना चाहिए कि आप कभी पत्रकार थे ही नहीं। आपने पत्रकारिता नहीं चुनी थी। आपने ग्लैमर चुना था। आपने कैमरा चुना था। आपने पहचान चुनी थी।
आपने वह दुनिया चुनी थी, जहां लाखों लोग आपको पहचानें, आपके साथ सेल्फी लें, एयरपोर्ट पर लोग आपको देखकर मुस्कुराएं और सोशल मीडिया पर आपके वीडियो के नीचे लोग लिखें कि आप कमाल लग रहे हैं।
अगर किसी लड़के या लड़की का सपना यह हो कि उसका चेहरा पूरे देश में पहचाना जाए तो उसका रास्ता फिल्में हो सकती थीं, मॉडलिंग हो सकती थी, मनोरंजन की दुनिया हो सकती थी। लेकिन वहां पहुंचना कठिन था। टीवी न्यूज मीडिया ने एक आसान रास्ता खोल दिया।
देश में गिने चुने राष्ट्रीय चैनल थे। उन चैनलों पर बैठ जाइए और रातोंरात चेहरा घर घर में पहुंच जाता था। आपने वही रास्ता चुना। आसान रास्ता।
अब सच थोड़ा कड़वा है, लेकिन सच यही है कि आपको वहां तक आपकी प्रतिभा नहीं लाई थी। आपको वहां तक हमारा लोभ लेकर गया था। हमने गलती की। हमने सोचा कि सुंदर चेहरा टीआरपी देगा। वैसे हम ये जानते थे कि आप पत्रकार नहीं हैं। पर दर्शकों के बीच भी हमने ही ये लोभ परोसा कि खबर देखो या न देखो, एंकर देखो। वो हम ही थे जिसने खबर और चेहरे के बीच का फर्क मिटा दिया।
उसी गलती का परिणाम था कि आपको उस कुर्सी पर बैठा दिया गया, जिसे आपने पत्रकारिता की कुर्सी समझ लिया। वह पत्रकार की कुर्सी नहीं थी। वह प्रस्तोता की कुर्सी थी।
किसी भी न्यूज चैनल में जाइए। अकाउंट्स विभाग में काम करने वाला कर्मचारी खुद को पत्रकार नहीं कहता। मानव संसाधन विभाग का अधिकारी खुद को पत्रकार नहीं कहता। मार्केटिंग वाला खुद को पत्रकार नहीं कहता। क्योंकि उसे अपनी भूमिका पता है।
फिर आप क्यों खुद को पत्रकार कहते हैं?
सच क्या है? आपके सामने किसी रिपोर्टर की रिपोर्ट रखी जाती है। किसी उप संपादक या टीवी की भाषा में प्रोड्यूसर की लिखी स्क्रिप्ट रखी जाती है। वही पूरी संरचना तैयार करता है। कौन सी खबर पहले चलेगी, कौन सा वीडियो कटेगा, कौन सा ग्राफिक आएगा, कौन सा सवाल पूछा जाएगा, कौन सा ब्रेक कब लेना है, यह सब कोई और तय करता है।
आप तो केवल उसे पढ़ते हैं। उसे प्रस्तुत करते हैं। प्रस्तुत करना और पत्रकार होना दो अलग बातें हैं।
अब आप कहेंगे कि हमने तो रिपोर्टिंग भी की है। बिल्कुल की होगी। लेकिन यह मत भूलिए कि आपको रिपोर्टिंग पर भेजने का फैसला भी आपका नहीं था। वह संपादक का फैसला था। और संपादक का फैसला भी अक्सर पत्रकारिता से अधिक टीआरपी से संचालित होता था। उसे मालिक को दिखाना होता था कि देखिए, हमारा बड़ा (सुंदर) चेहरा मैदान में है। भीड़ जुटेगी। कैमरे घूमेंगे। सोशल मीडिया पर क्लिप चलेगी। इसलिए आपको भेजा गया।
आपको इसलिए नहीं भेजा गया था कि आपके पास कोई असाधारण खोजी क्षमता थी। आप वहां पहुंचते थे और आपके कान में लगातार आवाज आती रहती थी। अब यह पूछिए। अब उधर जाइए। अब भीड़ से बात कीजिए। अब कैमरे की तरफ देखिए। अब यह लाइन बोलिए। आप जो सवाल पूछ रहे होते थे, उनमें से कितने आपके अपने होते थे?
- माहौल कैसा लग रहा है?
- क्या महसूस कर रहे हैं?
- आम काटकर खाते हैं या चूसकर (टाइप)?
इस तरह के सवाल पत्रकारिता नहीं होते। यह टेलीविजन का तमाशा होता है। पत्रकारिता वह होती है, जिसमें सवाल सत्ता से पूछा जाता है, व्यवस्था से पूछा जाता है, दस्तावेजों से पूछा जाता है, आंकड़ों से पूछा जाता है। पत्रकारिता कैमरे के सामने अभिनय नहीं, कैमरे के पीछे की मेहनत होती है।
पत्रकार वह है जो महीनों एक फाइल के पीछे लगा रहे। जो सूचना के अधिकार से दस्तावेज निकाले। जो अदालत की फाइलें पढ़े। जो गांव -गांव घूमकर सच खोजे। जो किसी खबर की पुष्टि किए बिना उसे चलाने से इनकार कर दे। जिसने अपनी नींद, अपना आराम और कभी कभी अपना करियर तक दांव पर लगाया हो।
केवल कैमरे पर दिख जाना पत्रकारिता नहीं है।
यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी फिल्म में कोई अभिनेता होंठ हिलाता है और पर्दे पर गाना चलता है।
क्या वह अभिनेता गायक हो जाता है? नहीं। उसकी लोकप्रियता अपनी जगह है, लेकिन आवाज किसी और की होती है।
मैं चाहता तो यहां माधुरी दीक्षित और लता मंगेशकर का उदाहरण दे सकता था। लेकिन मुझे सिल्क स्मिता का उदाहरण ज्यादा सटीक लगता है। सिल्क स्मिता फिल्मों में थीं, लेकिन लोग उन्हें अभिनय के लिए नहीं जानते थे। पर्दे पर दिखाई देना और कला का वास्तविक सृजन करना दो अलग बातें हैं।
ठीक यही फर्क कैमरे पर बैठने और पत्रकार होने में भी है।
आज जब आपको आंदोलन स्थल से लोग यह कहकर भगा देते हैं कि आप पत्रकार नहीं हैं, तब आपको बुरा लगता है। लेकिन एक बार ठहरकर सोचिए। शायद नई पीढ़ी वह फर्क समझने लगी है जिसे हमारी पीढ़ी ने धुंधला कर दिया था। उन्हें समझ में आने लगा है कि रीयल सेट क्या होता है और क्रोमा सेट क्या होता है। उन्हें मालूम है कि स्टूडियो की रोशनी और सड़क की धूल में बहुत अंतर होता है।
उन्हें दिखने लगा है कि जो आदमी रात नौ बजे स्टूडियो में सबसे ऊंची आवाज में बोलता है, वही आदमी मैदान में पहुंचकर टेलीप्रॉम्प्टर और प्रोड्यूसर के बिना असहज हो जाता है।
इसलिए परेशान मत होइए। संजय सिन्हा की बात मानिए, स्टूडियो आपकी जगह है। वहां आप सहज हैं। वहीं रहिए। खुद को ऐसी लड़ाइयों में मत डालिए जिनके लिए आपने कभी तैयारी ही नहीं की। कम बोलिए। सोशल साइट पर कम लिखिए। क्योंकि जैसे ही आप ज्यादा बोलते हैं, ज्यादा लिखते हैं, आपके भीतर की खाली जगह दिखाई देने लगती है। तब पता चल जाता है कि कैमरे की चमक और पत्रकारिता की तपस्या में कितना अंतर है।
संजय ज्ञान- पत्रकारिता रोशनी से नहीं बनती। धूल से बनती है। पत्रकारिता कैमरे से नहीं बनती, चरित्र से बनती है। पत्रकारिता मेकअप से नहीं बनती। मेहनत से बनती है।
अभी बहुत से लोग ये सच नहीं समझते। उन्हें नहीं समझने दीजिए। जिस दिन यह फर्क समाज पूरी तरह समझ गया, उस दिन चेहरों का जादू पूरी तरह खत्म हो जाएगा। तब केवल वही बचेगा जिसके पास सच होगा। बाकी सब रोशनी बुझते ही अंधेरे में खो जाएंगे।
पाउडर, क्रीम का झूठ बचा कर रखें। जब तक चेहरे का जादू चल रहा है उसे चलने दीजिए। बस।
नोट– बतौर प्रस्तोता भी आपके पास विकल्प था विरोध का कि ये नहीं पढ़ेंगे। पर पढ़ने से मना करने के लिए रीढ़ जरूरी होती है। वो होती तो पत्रकार बनने का विकल्प होता। आपने वो चुना ही नहीं। जिसने चुना वो कहां हैं, कौन नहीं जानता?


