देवप्रिय अवस्थी-
केंद्रीय डेस्क का विस्तार…
भोपाल में केंद्रीय डेस्क का काफी विस्तार हुआ. इसका काम अब सिर्फ खबरें बनाना नहीं रह गया. सभी संस्करणों के लिए संपादकीय पेज और एक दैनिक फीचर पेज बनाने के साथ खेल और व्यापार पेज के लिए विशेष पैकेज तैयार करने की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी इसे दी गई. विशेष ख़बरों पर काम करने के लिए रिपोर्टरों की एक छोटी टीम भी बनाई गई. समूह के गुजराती अखबार दिव्य भास्कर के लिए भास्कर की विशेष ख़बरों का अनुवाद करने के लिए दो साथी अहमदाबाद से भोपाल स्थानांतरित किए गए. जयपुर के मुकाबले भोपाल में विस्तारित डेस्क का आकार लगभग दोगुना हो गया. चूंकि यह प्रबंध संचालक सुधीर अग्रवाल का प्रिय प्रोजेक्ट था इसलिए स्टाफ और साधनों की कोई कमी नहीं थी.
समूह संपादक श्रवण गर्ग यहीं बैठते. समूह स्तर पर नियुक्ति, स्थानांतरण और प्रमोशन के काम में कार्यकारी संपादक सुदेश गौड़ उनकी मदद करते. एक अन्य कार्यकारी संपादक मुकेश भूषण समाचारों पर निगरानी रखते. एक बदलाव यह भी आया कि पहले मेरी रिपोर्टिंग सीधे प्रबंध संचालक सुधीर अग्रवाल को थी. अब मुझे श्रवण जी को रिपोर्ट करना था. सुधीर जी की व्यस्तता के चलते उनके साथ प्रत्यक्ष संपर्क यदा-कदा ही होता था. श्रवण जी का कक्ष मेरे कैबिन के ठीक बगल में था. शुरू के दो साल सब कुछ ठीक-ठाक चला, लेकिन बाद में कुछ दिक्कतें पैदा हुईं. उनका उल्लेख बाद में. पहले उस दौरान हुई कुछ बड़ी घटनाओं का जिक्र.
प्रमोद महाजन की हत्या
22 अप्रैल 2006 की सुबह भाजपा नेता प्रमोद महाजन को उनके मुंबई स्थित निवास पर उनके छोटे भाई प्रवीण ने तीन गोलियां मारकर बुरी तरह जख्मी कर दिया. डाक्टरों के भरसक कोशिशों के बावजूद 13 दिन बाद 3 मई को महाजन की मृत्यु हो गई. वे उस समय वाजपेयी-आडवाणी के बाद भाजपा के तीसरे सबसे प्रभावी नेता थे. उनकी मौत ने भाजपा में वाजपेयी-आडवाणी के उत्तराधिकार के समीकरणों को काफी प्रभावित किया.
विदेश यात्रा का ठप्पा
भोपाल में रहते हुए मुझे पहली और अंतिम विदेश यात्रा का मौका मिला. जी-8 के शिखर सम्मेलन (15-17 जुलाई 2006) में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ रूस के सेंट पीटर्सबर्ग जाने वाले पत्रकार दल में भास्कर की ओर से मुझे नामित किया गया. तमाम औपचारिकताओं और बंधनों वाली यह यात्रा में मुझे कुछ खास नहीं जमी. फिर भी, विदेश यात्रा का ठप्पा तो लग ही गया. यात्रा के अंत में पत्र सूचना कार्यालय की ओर से सभी पत्रकारों को उपहार में एक बैग दिया गया जिसमें अन्य सामग्री के अलावा शराब की एक महंगी बोतल भी थी. भोपाल लौटकर मैंने वह बोतल श्रवण जी को सौंप दी. चूंकि श्रवण जी भी शराब नहीं पीते, इसलिए उन्होंने बोतल भास्कर के एचआर प्रमुख जयंत मिश्र को दे दी.
बेटी की सगाई
इस बीच बड़ी बेटी पंखुड़ी की, जो एमसीए करने के बाद दिल्ली में एक आईटी कंपनी में काम कर रही थी, सगाई 24 दिसंबर 2006 को तय हुई. इस मौके पर मेरे और वर पक्ष के परिवार के 30-35 सदस्यों को कानपुर से भोपाल आना था. एक होटल में रात्रि भोज का छोटा आयोजन भी था. आयोजन के करीब एक सप्ताह पहले मैं सुधीर अग्रवाल को निमंत्रण देने गया तो उन्होंने शुभकामनाएं देते हुए कार्यक्रम की व्यवस्थाओं के बारे में पूछा. मैंने बाहर से आने वाले परिजनों के ठहरने की व्यवस्था में कुछ दिक्कत का उल्लेख किया तो उन्होंने कहा कि परेशान न हों. कंपनी ने हाल ही एक गेस्ट हाउस लिया है. उसका उद्घाटन इस शुभ कार्य के साथ हो जाएगा. उन्होंने अतिथियों को लाने-ले जाने के लिए भास्कर के ट्रांसपोर्ट विभाग के प्रमुख को बुलाकर छह ड्राइवरों की ड्यूटी भी लगा दी. इतना ही नहीं, उन्होंने होटल में रात्रि भोज के पूरी राशि का भुगतान अपने निजी खाते से करने की बात भी कही. यह बात मेरे लिए अप्रत्याशित थी. मैंने ना-नुकुर करने की कोशिश की तो उनका कहना था-यह हमारी परंपरा है. बाद में सुधीर जी के स्टाफ ने होटल जाकर लगभग 42000 रुपए (मौजूदा लगभग डेढ़ लाख रुपए) का भुगतान कर दिया और मेरे द्वारा जमा की गई अग्रिम राशि मुझे लौटा दी.
पाक क्रिकेट टीम के कोच की मृत्यु
टी-20 क्रिकेट विश्व कप 2007 के दौरान पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कोच बाब वूल्मर की 18 मार्च 2007 को जमैका के किंग्स्टन स्थित पेगासस होटल के कमरे में रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई. इससे कुछ घंटे पहले पाकिस्तान आयरलैंड के हाथों अप्रत्याशित रूप से पराजित होकर प्रतियोगिता बाहर हो गया था. इस कारण वुल्मर की मौत के कारणों पर विवाद खड़ा हो गया. बाद में जांचकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में मौत को स्वाभाविक करार दिया. इस घटना को मैंने गंभीरता से नहीं लिया और खेल पेज की खबरें देखने वाले साथी के भरोसे रहा. इस पर श्रवण जी खफा हो गए. चूंकि वे इस घटना पर विशेष टिप्पणी लिखने का मन बना चुके थे, इसलिए वे इस खबर का कवरेज प्रमुखता से चाहते थे. लगभग दो साल साथ काम करने के बाद यह पहला मौका था जब मैंने श्रवण जी को इतना उत्तेजित देखा था.
बेनजीर भुट्टो की हत्या
27 दिसंबर 2007 की शाम 5:30 बजे रावलपिंडी में पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की प्रमुख बेनजीर भुट्टो की हत्या बम विस्फोट के जरिए कर दी गई. श्रवण जी ने इस मौके पर एक विशेष पेज तैयार करने का निर्देश दिया. दो घंटे के भीतर विशेषज्ञ लेखकों से लेख मंगवाना बड़ी चुनौती थी. मेरे ध्यान में सबसे पहले वेदप्रताप वैदिक का नाम आया. श्रवण जी की सहमति लेकर उन्हें फोन लगाया. पता चला कि वे एक कार्यक्रम के सिलसिले में भोपाल में ही हैं. वैदिक जी ने कहा “मैं थोड़ी देर में भास्कर के दफ्तर आकर लेख लिख दूंगा”. इससे मुख्य लेख की समस्या हल हो गई. कुछ सामग्री एजेंसियों की खबरों से और कुछ सामग्री संदर्भ विभाग से जुटाई गई. वैदिक जी दफ्तर आए और श्रवण जी के कमरे में लेख लिखने बैठ गए. वे बीच-बीच में एजेंसियों की खबरें भी देखते रहे. उनके लेख के सहारे डाक संस्करणों के लिए विशेष पेज तैयार हो तो गया, लेकिन उसकी सामग्री अपेक्षा के अनुरूप नहीं थी. इसलिए नगर संस्करणों के लिए फिर से पेज बनाने की तैयारी की गई. श्रवण जी के संपर्कों के चलते रात 10 बजे तक दिल्ली और इस्लामाबाद से दो और लेख आ गए जिन्हें समाहित कर नया पेज बनाया गया. उस दिन किसी और अखबार में बेनजीर की हत्या की घटना पर इतना व्यापक कवरेज नहीं था.
अब थोड़ी जानकारी निस्तारित केंद्रीय डेस्क के साथियों की. डेस्क पर दो कार्यकारी संपादक सुदेश गौड़ और मुकेश भूषण शुरू से थे. इस पद पर रतनमणि लाल की नियुक्ति बाद में हुई. राकेश माथुर, विश्वदीप नाग और विनोद तैलंग जयपुर से मेरे साथ स्थानांतरित होकर आए थे. समाचार संपादक प्रदीप भटनागर चंडीगढ़ से आए थे. अमन नम्र उपसमाचार संपादक थे. प्रशांत राय चौधरी और जयप्रकाश पाराशर क्रमशः खेल और कारोबार पेज के लिए पैकेज बनाते थे. समाचार डेस्क पर बबन सिंह, जयजीत अकलेचा, नीहार ऱजन सक्सेना, गुरुदत्त तिवारी, शिवकुमार मिश्र, तेज बहादुर यादव आदि साथी थे. विजय मनोहर तिवारी, राकेश दीवान और जयश्री पिंगले विशेष घुमंतू रिपोर्टर थे. संपादकीय और फीचर पेज अरुण आदित्य की जिम्मेदारी थी. आनंद नाइक, शहला फाइज और दो अन्य उनके सहयोगी थे. अरुण आदित्य कै अमर उजाला जाने के बाद राजीव अग्निहोत्री ने उनका काम संभाला था.
पिछला भाग…
मेरी पत्रकारिता यात्रा (16): जयपुर में भास्कर समूह की केंद्रीय डेस्क की स्थापना हिंदी के किसी बहु-संस्करण अखबार में अपने ढंग का पहला प्रयोग था!


