सिद्धार्थ-
पिछले दो सालों से मीडिया में लगातार छंटनियों का दौर जारी है। लेकिन फिर भी देख रहा हूं दुनिया को अपनी लिखी हुई स्टोरी से प्रभावित करने वाले पत्रकार/कंटेंट राइटर/न्यूज प्रोड्यूसर/सोशल मीडिया एग्जक्यूटिव/एंकर्स/ वीडियो एडिटर/ग्राफिक डिजाइनर, इन लोगों का खून नहीं उबाल मार रहा है।
विरोध करना तो दूर मीडिया कंपनियों का नाम सार्वजनिक करने में भी अपने भविष्य और वर्तमान करियर के बारे में आगे-पीछे का जोड़-घटाव, गुणा-भाग लगाते हैं फिर इक्का-दूक्का अगर कोई कुछ लिखने को बढ़ता है तो सैंकड़ों उसकी आवाज को अनप्रोफेशनल बताकर-डराकर, बहकाकर दबा देते हैं।
मेरा बस एक ही सवाल है, जो इस तरह की विचारधारा रखते हैं, उनकी करियर ज्योग्राफि देखिएगा। चाहे वो आपका गुरु, गुरु मित्र, मित्र कोई भी हो। यह भी सोचिएगा आवाज नहीं उठाकर, एकजुट नहीं कर के भी 100-200 लोग इस साल, पिछले साल भी करीब इतनी ही संख्या वाले लोग क्या हासिल कर लिए? कौन से मंत्रालय का मीडिया प्रभारी या PIB महानिदेशक बन गये? जिन चैनलों के लिए 5-6 लाख सालाना पैकेज में सड़कों पर या समाज में गालियां खाते हो। लात जूते खाते हुए। न्यूजरूम में भी गाली खाते हो। बात-बात पर क्वालिटी/फैक्ट चेकर्स/SEO प्रमुख से जलील होते हो। तिमाही/छमाही नौकरी से निकालने वाला धमकी भरा मेल मिलते रहता है। वो नमक का जायका जीभ पर कितने समयबतक रहता है? फिर एक झटके में हटा क्यों दिए जाते हो। इंक्रीमेंट के समय चूहे-बिल्ली क्यों बन जाते हो?
अरे जाओ, फर्जी का भौकाल बात में जमाना पहले वर्तमान में खुद को कहां रखे हो? अपने आप को देखो, उनके पास, उसके पास क्या सेविंग्स है? क्या फ्यूचर और बैकअप है? क्या लिंक है? कोई लिंक काम आ रहा है, जो लोग रोक रहे हैं? वो अपनी नौकरी बचा पाए? उनका खुद का ट्रैक रिकाॅर्ड क्या है जो क्रांतिकारी नाम देते हैं?
एकजुटता नहीं है, इसलिए हर साल कहीं ना कहीं से 100-200 लोग हटाने का रिवाज़ बना हुआ है। सब अपना-अपना सोचते हैं, लेकिन सिर्फ सोचते हैं, करियर नहीं बना पाते हैं। ऐसे लूजर सफल ना हो पाएं हैं ना हो पाएंगे। प्रोफेशनल एथिक्स अपने जांघिए में डाल लो।


