नवभारत टाइम्स हिंदी अख़बार के जो नियमित पाठक हैं वो चंद्रभूषण के नाम से ज़रूर परिचित होंगे। वे आज भी संपादकीय पेज पर छपते हैं। अपनी अदभुत मेधा, गहन शोध वृत्ति और तीक्ष्ण ऑब्जरवेशन के कारण चंद्रभूषण का लिखा सबसे अलग और माइंडब्लोइंग होता है। एक बार आप पढ़ना शुरू करते हैं तो पढ़ते ही चले जाते हैं। वे जटिल से जटिल विषयों पर सरलतम शब्दों में लिखने के उस्ताद हैं। छात्र जीवन से मेधावी रहे चंद्रभूषण आईएएस बनने इलाहाबाद गए लेकिन वे बन गए एक्टिविस्ट। वामपंथी सोच से प्रभावित होकर रेल-जेल की लगातार यात्राएँ की। वामपंथी रुझान वाली मैग्ज़ीन समकालीन जनमत से पत्रकारीय करियर शुरू किया। फिर कई बड़े अख़बारों से होते हुए नवभारत टाइम्स तक पहुँचे और यहाँ लंबे कार्यकाल के बाद संपादक (विचार) पद से रिटायर हुए। सेवानिवृत्ति के बाद चंद्रभूषण की सक्रियता हर मोर्चे पर तेज़ हो गई। घूमना, सोचना, शोध करना और किताबें लिखना उनका प्रिय शगल है। बुद्धिज्म और तिब्बत पर दो किताबें आ चुकी हैं। जंतर मंतर पर छात्र आंदोलन शुरू हुआ तो उनके भीतर का एक्टिविस्ट मचल गया। वे पहुँच गए आंदोलन स्थल। वहाँ दिल्ली पुलिस की टीम ने छात्रों के साथ डिटेन कर लिया और दूर कहीं किसी स्टेडियम में ले गई। जब वे छूट कर घर पहुंचे तो भड़ास की तरफ़ से शिवा कुमारी ने उनसे विस्तार से बातचीत की। इस इंटरव्यू को पढ़कर आपको ये एहसास हो पाएगा कि आज के दौर का सच्चा पत्रकार कैसा होता है और कैसे सोचता है।


आंदोलनों में सांस ली है, ऑब्जरवेशन अपना पैशन है : चंद्रभूषण
सवाल- आपके परिचय से शुरू करना चाहूँगी। आप कहाँ से हैं, कहाँ आपका जन्म हुआ, पत्रकारिता में किस प्रकार आए? क्या जर्नी रही आपकी?
जवाब- जी मैं आजमगढ़ का रहने वाला हूं। 18 मई 1964 को मेरा जन्म आजमगढ़ में ही हुआ। गांव से ही स्कूली पढ़ाई पूरी की।ग्रेजुएशन के लिए आजमगढ़ शहर गया। वहां से मैने B.Sc. किया, फिर M.Sc.(Maths) करने इलाहाबाद (अब प्रयागराज) गया। उससे पहले वहा्ँ I.A.S. का प्रीलिम्स दिया। उसी समय ऑप्रेशन ब्लू स्टार हुआ था। वह एक बड़ा टर्निंग पॉइंट था। जिस दिन प्रीलिम्स परीक्षा थी, उसके ठीक पहले ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ और ऐन परीक्षा के दिन रामगढ़ छावनी (झारखंड) से प्रतिक्रिया स्वरूप बगावत करके आ रहे सिक्ख रंगरूटों को इलाहाबाद के शास्त्री ब्रिज पर फौज की घेरेबंदी के बाद गिरफ्तार किया गया। कुछ स्थितियां पहले से भी थीं लेकिन यहां से मन उचाट होना शुरू हुआ तो थोड़े ही समय बाद छात्र संगठन पीएसओ (अभी आइसा) से जुड़ा और जल्द ही पोलिटिकल होलटाइमर हो गया। इसके बाद इलाहाबाद से पटना गया, वहां से दिल्ली और फिर आंदोलन से जुड़े राजनीतिक काम करने आरा चला गया।
सवाल- आप जब पोलिटिकल होलटाइमर हो गए थे तो फिर पत्रकारिता की शुरूआत कैसे हुई?
जवाब- इलाहाबाद में ही हमलोग अभिव्यक्ति नाम से एक छात्र पत्रिका निकालते थे। उसी में मैं लिखता था और कुछ संपादन के काम करता था। शुरुआत तो वहीं से हुई। उसके बाद समकालीन जनमत नाम की साप्ताहिक पत्रिका से मैं जुड़ा, जो खुद में आंदोलन की पत्रिका थी। जनमत ने ही जून 1990 में बतौर रिपोर्टर मुझे दिल्ली भेजा था।
सवाल- पत्रकारिता के दौरान आपने जिन बड़ी घटनाओं को कवर किया, उनमें से कुछ का जिक्र करना चाहेगें?
जवाब- दिल्ली आने के बाद उस वक्त मैंने पंजाब के खालिस्तानी मूवमेंट को कवर किया। पंजाब गया और वहां कुछ दिन रहा। सन 1990 के आखिरी दिनों में मैं पंजाब गया था और कई जिलों में डेरा जमाने के बाद जिस दिन अमृतसर से लौट रहा था उसी दिन जॉर्ज बुश ने इराक पर पहला हमला किया था। पंजाब के उन दिनों को कवर करना मेरे लिए एक बड़ा तजुर्बा था । पंजाब के लोगों में बहुत भय का माहौल था । जब शाम को लोग घर से बाहर नहीं निकलते थे, मैं वहां की सड़कों पर रहता था।
दूसरा बड़ा अनुभव नेपाल का रहा । नेपाल के डेमोक्रेसी मूवमेंट में मै कई दिन नेपाल में रहा! वहां रहना बहुत बड़ा तजुर्बा था। शहर से लेकर वहां की देहातों तक गया। विभिन्न तरह के लोगों से बातचीत हुई। उनमें से जिन लोगों के मैंने इंटरव्यू किए, उनमें से चार लोग- कृष्ण प्रसाद भट्टराई, मनमोहन अधिकारी, गिरिजाप्रसाद कोइराला और माधव नेपाल और बाद में चलकर नेपाल के प्रधानमंत्री बने। नेपाल की प्रसिद्ध फोटोजर्नलिस्ट उषा तितिक्षु और वहां के एक बड़े मीडिया अकादमीशियन कुंदन अर्याल उसी समय से मेरे दोस्त हैं। अभी जंतर-मंतर के आंदोलन में जब मुझे पुलिस डिटेन कर के ले गई, तो वह मुझे फोन कर के ऐसे मौके पर साथ नहीं होने का अफसोस जता रहे थे।
सवाल – आपने ये नहीं सोचा कि IAS बन जाता तो बड़का बाबू बन गया होता। ये झोला लेकर पत्रकारिता नहीं करना पड़ता।
जवाब – कितना बढ़िया सवाल है आपका! ये तब भी मुझे लगता था और अब भी लगता है कि मैने मोस्ट सैटिस्फाइंग करियर चुना। उसकी वजह यह है कि जो क्वेस्ट है, प्यास है चीजों को जानने-समझने की, ऐसा ही मेरा दिमाग है। मैं हर वक्त एक क्वेस्ट में जीता हूँ। ये मुझे किसी और करियर में नहीं मिल सकता था। मेरे बहुत से मित्र हैं जो IAS या अन्य केंद्रीय सेवाओं में हैं लेकिन वे कहते है कि चीजें ठप हो जाती हैं, एक समय के बाद। तो मैं कह रहा था कि क्वेस्ट के लिहाज से जर्नलिज्म एक अच्छा पेशा रहा है। एक नौकरी के तौर पर देखें तो यह अच्छी नौकरी नहीं होती।
सवाल- क्या आपने पत्रकारिता की कोई औपचारिक पढ़ाई की है?
जवाब – नहीं! मेरी पत्रकारिता एक क्रांतिकारी विचार से निकली पत्रकारिता थी, जिसको मन के धरातल पर धर्म जैसी कोई चीज भी कहा जा सकता है।
सवाल- दिल्ली में पत्रकारिता के सफ़र की शुरुआत कैसे हुई?
जवाब- आरा में मुझे 1993 में एक फर्जी केस में जेल भेज दिया गया था। बाहर निकला तो पार्टी की तरफ से आदेश हुआ कि जनमत अब दिल्ली से निकलेगी। फिर मैं दिल्ली में रहकर पत्रिका के लिए काम करने लगा। 1996 में पार्टी की ही पहल पर मैंने RYA नाम का संगठन बनाने में हाथ बंटाया, पुरी में उसका पहला राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया। इस संगठन का दूसरा नाम इंकलाबी नौजवान सभा है और यह अभी नौजवानों का एक चर्चित संगठन है।
सवाल – क्या आपको कभी आर्थिक तंगी ने नहीं सताया?
जवाब – जी नहीं। यह कोई मुद्दा ही नहीं था। लेकिन जब मेरा बेटा होने वाला था तब मेरी सास ने मुझसे कहा कि “कुछ है तुम्हारे पास?” तब मुझे पहली बार खटका। तब मैंने किताबों का अनुवाद करना शुरू किया। बच्चे की डिलिवरी के समय उससे कुछ मदद मिली। फिर पहली बार मैंने बैंक में खाता खोला। उसके बाद मैंने कई महत्वपूर्ण किताबों का अनुवाद किया। फिर अखबारों में आर्टिकल लिखना शुरू किया। आगे चलकर मेरे एक मित्र ने संदेशा भिजवाया कि लिखते हैं तो काम ही क्यों नहीं कर लेते, नौकरी क्यों नहीं कर लेते? मेरे दिमाग में आया कि मैं IAS देने जा रहा था, उस तरफ तो पलटकर देखा भी नहीं, अब किसी की नौकरी कैसे कर लूंगा?
सवाल – क्यों, आपको अच्छा नहीं लगा कि कोई एक स्टेबल नौकरी दे रहा है, महीने की तनख़्वाह दे रहा है, जीवन में थोड़ा सुकून रहेगा।
जवाब – नहीं वो जो लॉ ऑफ एनर्शिया होता है न न्यूटन का…मगर हर महीने कमरे का किराया जुटाने की हक़ीक़त मेरे सामने थी। फिर मैं अमर उजाला में चला गया। बिल्कुल इनीशियल लेवल पर चला गया। मेरे घर-परिवार के लोगों, रिश्तेदारों ने कहा कि इतना ज़हीन आदमी अखबार में बिल्कुल छोटे ओहदे पर काम कर रहा है! मै छह महीने में सब एडिटर बन गया, मगर मुझे बार-बार ये लगता था कि ये मेरी दुनिया नहीं है। मैं इसको आज छोड़ दूं कि कल छोड़ दूं। फिर कुछ ही महीने के बाद मैंने वो नौकरी छोड़ दी।
सवाल – क्यों, क्या आपको अच्छा नहीं लगा कि हर महीने खर्च जुटाने के जद्दोजहद से मुक्त हुआ?
जवाब – नहीं। क्योंकि जब नौकरी नहीं थी तो मैं किसी हाइअरार्की में नहीं था। अब मुझे लगने लगा था कि कोई मेरा लेवल तय कर रहा है। उस समय की मेरी कविताएं भी ऐसी ही होती थी कि कुछ संख्याएं मेरी हैसियत जांच रही हैं। लेकिन नौकरी छोड़ देने के बाद मुझे आटा-दाल का भाव पता लगा। फिर जनसत्ता में मेरे नियमित लेख छपने शुरू हुए, हालांकि डेढ़ साल मैं बेरोजगार ही रहा।
सवाल – आपको नहीं लगा कि अमर उजाला को फिर से एप्रोच करूं नौकरी पाने के लिए?
जवाब – नहीं! क्रांतिकारी था न!
सवाल – फिर क्या किया आपने?
जवाब – फिर मैं राजकमल प्रकाशन में संपादक के तौर पर काम करने लगा। फिर मेरा वहां भी झगड़ा हो गया। मैंने वहां भी नौकरी छोड़ दी। मगर इस बार जो मैंने नौकरी छोड़ी और घर आया तो एक छोटा ब्लैक एंड वाइट टीवी और एक मिठाई का डब्बा साथ लाया!
सवाल – क्यों?
क्योंकि नौकरी तो छोड़ी ही है, तनाव साथ लेकर मैं नहीं जाऊंगा। नुकसान और तनाव दोनों एक साथ नहीं झेलूंगा। हालांकि मैं 1999 में फिर से अमर उजाला गया, फिर मैं जनसत्ता में गया, फिर भास्कर में गया और वहां से साप्ताहिक सहारा समय गया।
सवाल – क्या आप मूलत: हमेशा प्रिंट मीडिया में ही रहे?
जवाब- जी हां। मैं मूलतः प्रिंट मीडिया में ही रहा। आजतक से मुझे बुलावा आया था मगर मैं जा नहीं पाया। वह अकेली ऐसी जगह थी जहां मैं जा नहीं पाया और मुझे बुलावा आया था। कारण यह कि उसी समय मेरे पिताजी का देहांत हुआ था, मैं गांव गया हुआ था और मोबाइल का चलन तब था नहीं। फिर अन्य कई अखबारों में काम करते हुए मैं नवभारत टाइम्स पहुंचा और सबसे ज्यादा समय तक वहीं काम करता रहा। 2008 से लेकर 2021 तक, जब मैं रिटायर हुआ हूं। यह मेरी सबसे लंबी नौकरी थी। वहां मैं संपादकीय पृष्ठ का प्रभारी था, जिसे ओपिनियन एडिटर या विचार संपादक कहते हैं।
सवाल- आपके करियर में ऐसी कौन सी पहली स्टोरी थी जिसने आपको पहचान दिलाई?
जवाब – मेरी 1989 में की हुई एक स्टोरी थी- ‘सशस्त्र किसान संघर्ष के इलाके में चार दिन’। यह जनमत मैगजीन के लिए स्टोरी थी। यह उस समय की सबसे चर्चित स्टोरी थी
सवाल- क्या आपको कभी भी कोई स्टोरी करते हुए किसी तरह के सामाजिक या राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ा?
जवाब – दबाव मेरे लिए मैटर नहीं करता था क्योंकि लोगों को पता था कि मैं अखबार की घोषित पॉलिसी पर चलता हूं, किसी के फायदे के लिए उसे बदलता नहीं। मैनेजर भी मुझे फोन करते हुए हिचकते थे। इस तरह का दबाव मेरे पर एक बार वरुण गांधी की तरफ से आया था लेकिन मैंने उनको भी यही कहा कि मैं अपने अखबार की पॉलिसी पर चलता हूं, किसी के लिए उसे बदलता नहीं हूं। उसके बाद वरुण गांधी मेरे मित्र जैसे हो गए। कोविड के समय भी उन्होंने मुझे फोन करके कुछ महत्वपूर्ण खबरें दी थीं। पत्रकारिता में जैसे-जैसे आप ग्रो करते जाते हैं वैसे-वैसे आपका रोल सूचना लाने और उसे प्रस्तुत करने से ज्यादा एक टिकट चेकर की तरह होता जाता है। मेरी एक जिद सी थी कि मैं वही छापूंगा जिसके लिए मेरा ज़मीर गवाही देगा। शुक्र है कि नवभारत टाइम्स की पॉलिसी का इसके साथ कभी कोई बड़ा क्लैश नहीं हुआ।
सवाल – प्रिंट मीडिया और डिजिटल मीडिया में आपको क्या लगता है कि आने वाले समय में किस माध्यम से पत्रकारिता का भविष्य मजबूत है।
जवाब -सूचना देने का माध्यम तो कोई भी हो सकता है। रेगुलर मीडिया वाले सोशल मीडिया से बहुत नाराज रहते हैं। इसी तरह वे डिजिटल प्लेटफॉर्म से भी नाराज होते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म की एक सबसे बड़ी दिक्कत है कि उसको सोशल मीडिया से सीधे जूझना पड़ता है। जो व्यक्ति डिजिटल माध्यम से सूचना देख रहा है वही व्यक्ति फेसबुक भी देख रहा है, जिस जगह पर ज्यादा जिंदा ढंग से सूचना मिल रही है, बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप वाली सूचना मिल रही है। आदमी उसकी तरफ मुड़ जाता है। वहीं प्रिंट को देखें तो प्रिंट तो एक तरह से डेड न्यूज़ होकर रह जाता है। अब, मेरे पास जो अखबार आते हैं, देखकर मुझे लगता है कि यह सब तो पहले ही मैं पढ़ चुका हूं, मैं तो यह सब पहले से ही जानता हूं।
सवाल – अच्छा, पत्रकारिता आजकल ग्राउंड रिपोर्टिंग की जगह ट्विटर आदि सूत्रों पर निर्भरता ज्यादा हो गई है, इस पर आपका क्या कहना है?
जवाब – देखिए फर्स्ट इनफॉरमेशन तो फर्स्ट इनफॉरमेशन ही है, वह तो आपको जाकर ही जुटानी पड़ेगी। सूचना जितने स्रोतों से छनकर आती है, हर स्तर पर कुछ न कुछ इंटरेस्ट उसमें जुड़ते जाते हैं। जो सूचना आप स्वयं जुटाते हैं वही मूल सूचना है। बाकी सारी चीज उसकी सत्यता के लिए है। अब यह जो चिंदीचोर मैनेजर हैं यह आपको किराया ही नहीं देंगे वहां जाने का, तब कैसे सूचना ले आएंगे? जो मीडिया हाउसेस हैं उन्होंने तो मूल सूचना पर पैसा खर्च करना ही बंद कर दिया है। अब आपको दिन भर में पांच खबर डालना है और फील्ड में जाने पर एक ही खबर कर पाएंगे तो कुछ खोजने के बजाय आप घास-भूसा ही डालेंगे ना।
सवाल – क्या खोजी पत्रकारिता का कोई वजूद बचा है?
जवाब- खोजी पत्रकारिता व्यवहारत: टीवी में तो होती ही नहीं है। वहां सबसे ज्यादा कमाऊ पूत आप तब माने जाते हैं जब बकबक करते हुए ज्यादा से ज्यादा टाइम खींच सकें। जो पूंजी लगाने वाला व्यक्ति है वह सबसे पहले यह देखेगा कि कहीं आपकी खोजी पत्रकारिता की वजह से उसकी पूंजी पर कोई झटका ना लग जाए, किसी ऐसे इंटरेस्ट पर चोट न हो जाए जिससे उसकी आमदनी चली जाए। अब मान लीजिए किसी ने यह खबर चला दी की सरकार ने रिलायंस को बिना टेंडर के या फर्जी टेंडर निकालकर कोई बहुत बड़ा ठेका दे दिया है। रिलायंस अगर उस ग्रुप को महीने में एक करोड़ रुपए का ऐड देता था तो इस सूचना के बाद उसको वह ऐड देना बंद कर देगा और उस पत्रकार की नौकरी चली जाएगी। मैं तो टीवी की खबरें देखता नहीं और अंग्रेजी का एक ही अखबार मंगवाता हूं जिसमें लगता है कि थोड़ी बहुत खोजी पत्रकारिता रह गई है। वह है इंडियन एक्सप्रेस, जिसे पढ़कर लगता है कि खोजी पत्रकारिता कब्र में भले हो मगर उसका एपिटॉफ अभी नहीं लिखा गया है, कब्र का समाधि लेख नहीं लिखा गया है।
सवाल – क्या वाकई आपको लगता है कि पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है? क्या आज के समय में जो भी सरकार चल रही है, जिस भी प्रकार की सिचुएशन आज देश में है, क्या आपको लगता है कि पत्रकारिता चौथा स्तंभ है, या ये सिर्फ कहने की बात है?
जवाब – प्रैक्टिकली तो यह कहने की ही बातें हैं कि मीडिया चौथा स्तंभ है। सरकार में भी पत्रकार को लोग अभी फालतू से कमतर मानते हैं, भले ही वह दिन-रात उनका ही गाना गाता हो। पहले सरकार को थोड़ा डर लगता था तो वजन देते थे। अभी किस चीज के लिए वजन देंगे? आपकी कोई औकात ही नहीं है, फिर काहे के स्तंभ? आप देखिए कि सीजेआई ने कह दिया कॉकरोच तो अभिजीत दीपके ने कॉकरोच जनता पार्टी का निर्माण कर दिया। एक सूचना आई थी, और उसने उस सूचना के साथ थोड़ी सी टेक्नोलोजी का इस्तेमाल करके एक मंच बना दिया तो लोगों का दबा हुआ गुस्सा फूट पड़ा।
एक संगठित, जिम्मेदार संस्था के रूप में तो मीडिया का कोई वजूद नहीं रह गया है, लेकिन सूचना हमेशा मायने रखती है और अभी भी मायने रख रही है। सूचना एक ऐसी पावर है जो दिखती नहीं। जैसे एक पहाड़ है, उसकी पावर दिखती नहीं है मगर जिस दिन उसकी एक चट्टान गिरती है, उस दिन उसकी पावर दिखती है। इस तरह सूचना की ताकत हमेशा रहेगी और सूचना को जो कैरी करने वाला माध्यम है चाहे वह सोशल मीडिया हो चाहे वह कोई भी माध्यम हो वह हमेशा पावरफुल रहेगा। उसको आप चौथा स्तंभ कहिए या ना कहिए, भारत का गंभीर मीडिया चौथा स्तंभ कहलाने के लिए मरा नहीं जा रहा है। ध्यान रहे, सूचना कोई देता नहीं है। सूचना तो अक्सर गले में हाथ डालकर निकालनी पड़ती है। अभी हम जो भी टीवी पर देख रहे हैं, वह समाचार नहीं, कुछ घपले वाला पॉलिटिकल ऐड भर है।
सवाल – आपके समय की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता में क्या अंतर है अपने समय की पत्रकारिता में आपने आंदोलन किया, झोला लेकर निकल पड़े घर से पत्रकारिता करने के लिए, देश की समस्याओं को आवाज देने के लिए, तब से आज की पत्रकारिता में क्या अंतर देख पाते हैं?
जवाब – ऐसा कोई युग परिवर्तन तो नहीं हुआ है लेकिन एक होती है नौकरी और एक होता है काम। तो हम लोग काम करते थे और आज लोगबाग ज्यादातर नौकरी करते हैं। अब यह जो एंकर नाम की ब्रीड निकली है, उसकी नियुक्ति ही इस आधार पर होती है कि आपको मजमा लगाना आता है या नहीं, आप कितना जोर से चीख सकते हैं, आपका चेहरा लोगों का ध्यान खींचता है या नहीं। फिर भी अभी बहुत से ऐसे लोग हैं जो सूचना पर काम करते हैं। मेनस्ट्रीम मीडिया में उनके लिए सरवाइव करना थोड़ा कठिन है तो वे सोशल मीडिया और दूसरे तरह के प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करते हैं। जानने की इच्छा खत्म हो जाए, क्वेस्ट खत्म हो जाए, सूचना खत्म हो जाए, यह तो तभी हो पाएगा जब सृष्टि खत्म हो जाएगी। अब, अपने अतीत के गीत तो मैं गा नहीं सकता कि पहले सब बहुत अच्छा था, अब कुछ भी अच्छा नहीं है। अलबत्ता, एक चीज पहले बहुत खराब थी कि मीडिया में सैलरी बहुत कम थी। अभी इस मामले में थोड़ी आसानी है।
सवाल – क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि वर्तमान सरकार लोकतंत्र को दबा रही है? नई पीढ़ी के इतने बड़े आंदोलन को देखते हुए क्या आपको नहीं लगता कि लोकतंत्र खतरे में है?
जवाब -इधर कुछ सालों में हम लोग जैसा देख रहे हैं, ऐसी टोटल वनसाइडसनेस देश में कभी नहीं रही। मतलब आपकी आंख के सामने आपको दिख रहा है कि पूरी की पूरी हाईवे धंस गई है लेकिन कोई भी गडकरी पर सवाल नहीं उठाने वाला है कि ऐसा क्यों हुआ! और अभी भी वह डार्लिंग ऑफ मीडिया है। परसेप्शन मैनेजमेंट इतना ताकतवर हो गया है कि आंख से देखी हुई चीज भी बगल के आदमी तक कम्युनिकेट नहीं होती है। बनारस में अधबीच में पहुंचा फ्लाईओवर गिर गया और आज तक यह पता भी नहीं चला कि उसका ठेकेदार कौन है। जो भी थोड़ी-बहुत कार्रवाई हुई, सिर्फ सब-कंट्रैक्टर्स पर। परसेप्शन मैनेजमेंट इतना ज्यादा हो गया है कि लोगों की जो ठेठ समस्याएं हैं वह भी मीडिया के द्वारा मैनेज कर ली जा रही हैं। जैसे मान लीजिए कि अयोध्या की चढ़ावाचोरी के तुरंत बाद अभी इतना बड़ा छात्र आंदोलन अपने मुकाम तक पहुंचा है। लेकिन यूपी में योगी को पूरा भरोसा है कि अभी कांवड़ यात्रा शुरू होगी और सब कुछ मैनेज हो जाएगा। कुछ फूल-वूल डलवा देंगे…कांवड़ वालों को जय-जय बम-बम बोल देंगे, फिर कहां कौन सा मुद्दा?
ऊपर खूब पैसे निछावर करने वाले दो-तीन सबसे बड़े पूंजीपति हैं, नीचे मीडिया भी उन्हीं का है जो सरकार के गुन गाता रहता है। मीडिया से भी कोई चीज छूट गई तो उसको मैनेज करने के के लिए धर्म है.. ट्रिपल लाइन ऑफ सिक्योरिटी हो गई सरकार की! पूरी की पूरी राज्य सरकारें खरीद ले रहे हैं, सांसद खरीद ले रहे हैं, इलेक्शन ख़रीद ले रहे हैं…इतनी बड़ी बदइंतजामी कोविड के समय हुई, कूड़े की तरह लाशें बिखरी दिख रही थीं, सत्ताधारी दल की ओर से बेवकूफों वाले बयान कि पीपल के नीचे लिटा दो आक्सीजन मिल जाएगी। उसके बावजूद तुरंत कई सारे इलेक्शन जीत गए, फिर तो लोगों के पास यह मानने के सिवा कोई चारा ही नहीं रहा कि बेड की, दवाओं की, आक्सीजन की कहीं कोई समस्या ही नहीं थी!
सवाल – तो आखिर जनता इतनी भारी मात्रा में वोट क्यों दे रही है?
जवाब- इंसान के दिमाग की एक सीमा है न! दिन-रात वही सूचना आ रही है, सारे लोग कह रहे हैं कि हिंदू धर्म के लिए इतने सारे काम हो रहे हैं, यह सब पहले हुआ था क्या? तो भारत के लिए सामूहिक रूप से आंख पर पट्टी बांध कर चलने वाली ऐसी बातें नई हैं ही, पूरी दुनिया के लोकतंत्र के लिए भी यह एक नई चीज है। क्या पता, रूस में पूतिन का ही मैनेजमेंट ऐसा हो तो हो।
सवाल – इस पीढ़ी के लिए क्या खतरा है? यह एक प्रकार से तानाशाही नहीं हो रही है ?
जवाब – आप सही कह रही हैं मगर मुझे इस पीढ़ी से बहुत उम्मीद है। और मुझे ये बार-बार लगता है कि 23 साल की उम्र में भगत सिंह इतने सारे काम करके, इतनी लिखाई करके शहीद हो गए थे, और ये सब इतने जो जरठ जटायु बैठे हुए है जो अपनी ही महिमा गाते रहते हैं, ये सिर्फ पैसे खा सकते हैं। मुझे तो यही लगता है कि यह जो पीढ़ी आ रही है यह इतनी आसानी से झांसे में आने वाली नहीं है। इनको आप जैसे चाहे वैसे नहीं घुमा पाएंगे। हमें आप घुमा देंगे मगर इन्हें नहीं घुमा पाएंगे। इस पीढ़ी को घुमाना इतना आसान नहीं है। इतना धर के दबोचा ना दिल्ली में कि इनके होश ठिकाने ला दिए। 16 साल से लेकर 30 साल के इन नौजवानों के आंदोलन का असर बच्चों तक पहुंच गया, तो आप उनको कांवड़ के बहाने मैनेज नहीं कर पाएंगे। किसी तरह इस पीढ़ी को सांप्रदायिकता के जहर से बचा लिया जाए। सबसे खतरनाक यही है। इसी के नाम पर सब कुछ कर रहे हैं। मुझे तो इस पीढ़ी से बहुत उम्मीद है।
सवाल -इस आंदोलन में भाग लेने का आपका अनुभव कैसा रहा? आपको पुलिस ने डिटेन कर लिया था!
जवाब – बहुत अच्छा अनुभव रहा और मैं यह कह सकता हूं कि मेरे एज ग्रुप के लिए तो यह दुर्लभ अनुभव है, क्योंकि इस एज में तो इंसान नेचुरली सेफ खेलने लगता है कि किसी तरह बचा रहे। मान लीजिए कि मेरी एक-आध हड्डी टूट गई होती या हार्ट अटैक आ गया होता, तो मैं ये कहने की स्थिति में नहीं होता!
सवाल – कैसा रवैया था पुलिस का, सरकार के लोगों का?
जवाब – बहुत खराब रवैया था! चार जगह बवाल हुआ। पुलिस का रवैया चीजों को नियंत्रित करने का था ही नहीं। मैंने इससे बहुत ज्यादा भीड़ देखी है दिल्ली के अंदर लेकिन हिंसा चाहने वाला, जान-बूझकर उसे भड़काने वाला सरकारी ढांचा पहली बार देखा!
सवाल – क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि सोनम वांगचुक जैसे लोगों को या इस तरीके की सोच रखने वाले लोगों को सरकार दबा देना चाहती है?
जवाब – मुझे ऐसा लगता है कि ओवर कॉन्फिडेंस में यह चीज हो रही हैं, क्योंकि तीन-चार ऐसे मामलों को उन्होंने मैनेज कर लिया है जिस पर सरकार चली जानी थी। नोटबंदी का मामला हो या कोविड का मामला हो, चीन का मामला हो, जीएसटी का मामला हो! हर बार इन्होंने समस्या को नहीं, सिर्फ परसेप्शन को मैनेज किया। कोविड में जितने लोग बीमारी से नहीं मरे, उससे ज्यादा ऑक्सीजन की कमी की वजह से मरे। चीन ने कब्जा ही कर लिया लद्दाख के नो मैंसलैंड पर। उस चीज को भी मैनेज कर लिया। यह सारा मैनेज कर लेने का जो ओवर कॉन्फिडेंस है उसी में यह सारा रायता ये फैलाए जा रहे हैं। लेकिन जैसा कहा जाता है ना कि हाथी अपने मद में चल रहा है और एक चींटी यदि उसके सूंड में घुस जाए तो उसका जीना हराम कर सकती है। इनके साथ ऐसा होना अभी शुरू ही हुआ है।
सवाल – रिटायरमेंट से लेकर अभी तक आपका जीवन क्या रहा है?
जवाब – इस बीच में मेरी छह किताबें आ गई हैं, सातवीं छपने के लिए तैयार है। और यह कोई इंडस्ट्रियल पैमाने का लेखन नहीं है। चीजें पहले से दिमाग में पक रही थीं। पहली किताब ‘तुम्हारा नाम क्या है तिब्बत’, एक ऐसी रेयर किताब है जिसमें इस तरफ के तिब्बत के लोगों की भी बात है और उस तरफ के तिब्बत के लोगों की भी बात है। सबसे आमने-सामने बैठकर की गई बातचीत, किताबों से पढ़ा हुआ कुछ भी नहीं! दूसरी, ‘पच्छूँ का घर’ आत्मकथात्मक है। तीसरी ‘भारत से कैसे गया बुद्ध का धर्म’ और चौथी ‘बुद्धचरित और महाकवि अश्वघोष’ एक बंद बहस को फिर से खोलने की कोशिश जैसी हैं और इस काम में कुछ हद तक वे कामयाब भी हुई हैं। बतौर बुद्धिजीवी जो भी थोड़ी-बहुत पहचान मेरी बन सकी है, उसकी धुरी ये दोनों किताबें ही हैं। पांचवीं ‘नई सदी में विज्ञान : भविष्य की खिड़कियां’ इक्कीसवीं सदी के साइंटिफिक ब्रेकथ्रूज पर फोकस करती है, जबकि छठीं- ‘प्रलय का प्रतिपक्ष’ ग्लोबल वॉर्मिंग की स्थिति में जैव विविधता के विविध पहलुओं पर खोजबीन की गई है। विषय बताने से आगे इस मामले में इतना ही कह सकता हूं कि मेरे ख्याल से ये महत्वपूर्ण किताबें हैं और इनमें दस साल या उससे ज्यादा की लाइफ है। सातवीं किताब- ‘भारतीय संस्कृति में लंबी दरार’- दो साल लंबी एक परियोजना की उपज है और इसमें पिछले ढाई हजार वर्षों में लिखे गए संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, हिंदी, पंजाबी, मराठी, बांग्ला और अंग्रेजी के ग्रंथों के अध्ययन के जरिये भारत की संस्कृति में मौजूद एक गहरे विभाजन और एकतरफा विस्मृति की शिनाख्त की गई है।
सवाल – अभी आपका रूटीन क्या रहता है?
जवाब – किसी स्टडी टूर या सैर-सपाटे पर न निकला रहा तो घर में रहते हर रोज लैपटॉप लेकर बैठता हूं और कोशिश करता हूं कि 5 से 6 घंटा लिखूं। कभी-कभी सिर्फ पढ़ता भी हूं और इस तरह के वर्किंग डेज दस, बारह, या एकाध बार चौदह घंटे तक के भी हो जाते हैं।
सवाल – बुद्धिज्म पर आपकी सोच कैसे डेवलप हुई? कैसे मन में आया इस विषय पर लिखने का?
जवाब – 2015 के आसपास सारनाथ स्थित महाबोधि सोसाइटी ने मुझे बुद्ध ऐज़ अ कम्युनिकेटर विषय पर बोलने के लिए बुलाया था। यह ऑफिशियल इनवीटेशन था, जो नवभारत टाइम्स के ओपिनियन एडिटर के रूप में मुझे भेजा गया था। मैने सोचा ये अच्छा है, बुद्ध भी कम्युनिकेटर मैं भी कम्युनिकेटर। कुछ विशेष बात तो इसमें थी नहीं लेकिन पता नहीं क्यों इसके लिए मैने बहुत पढ़ाई की! फिर चीन और तिब्बत की यात्रा ने इस बीज को खाद-पानी दिया और अनजाने में ही यह पौधा पनपने लगा।
सवाल – बुद्ध पर ओशो ने भी काफी लिखा है…
जवाब – हां ओशो ने भी बहुत लिखा है, यूं कहें कि वक्तव्य दिए हैं, मगर ओशो का स्पिरिचुअल ओरिएंटेशन है और मेरा पूरी तरह से इहलौकिक तथ्यों और तत्व मीमांसा पर। उसमें भी मेरा काम बाद के बुधिज्म पर ज्यादा केंद्रित है, यानी बुद्ध का दौर गुजर जाने के हजार साल बाद वाले समय पर।
सवाल – क्या आप स्पिरिचुअल नहीं हैं?
जवाब – किसी ऐब्स्ट्रैक्ट अर्थ में होंगे तो होंगे, कुछ पता नहीं। पूजा-पाठ, ध्यान आदि के अर्थ में तो नहीं हैं!
सवाल – क्या आपको कभी डिप्रेशन हुआ?
जवाब – हां, मगर डिप्रेशन की मेडिकल कंडीशन से थोड़ा पहली वाली स्टेज का। दूसरी वाली नौकरी छूटने के बाद मुझे बहुत रोना आता था। 1999 की बात होगी। गनीमत थी कि दिन तब अकेले ही बिताने होते थे। पास में कोई होता तो बड़ी झेंप आती। खर्चे बहुत बढ़ गए थे और आमदनी कुछ भी नहीं थी। तो उसको कह सकते हैं कि वह डिप्रेशन के बहुत करीब का एक अनुभव था, मगर मेडिसिन तक मामला कभी नहीं पहुंचा। हां, वह बेरोजगारी ज्यादा लंबी चलती तो हो सकता है, पहुंच जाता।
सवाल – मेरे जैसे नए पत्रकारों को क्या सलाह देंगे आप?
जवाब- एक तो यह है कि अभी आपके पास लिखने की बहुत अच्छी जगहें हैं, जहां कोई बॉस या सुपरबॉस आपकी कलम या कीबोर्ड पर आसन जमाकर नहीं बैठा है। इन जगहों का खूब अच्छा इस्तेमाल करिए। ज्यादा इस्तेमाल करिए। सोशल मीडिया आपका एक प्राइवेट स्पेस है और नौकरी करें तो भी उसमें किसी को हस्तक्षेप का अधिकार न दें। दबाव आए तो कह दें कि ऐसा कुछ नहीं लिखेंगी जिससे एंप्लॉयर को कोई प्रत्यक्ष नुकसान होता हो। रिल्के (ऑस्ट्रियन कवि राइनर मारिया रिल्के) की एक लाइन है कि तुम्हारे पास एक भाषा है और सामने दुनिया खुली हुई है, इस भाषा की रस्सी से सामने की दुनिया का जितना हिस्सा खींच सको, खींच लो।
बतौर पत्रकार, संसार में कुछ भी ऐसा नहीं है जो आपका क्षेत्र नहीं है। बैंकिंग वालों का क्षेत्र बैंक है। राजनीतिक लोगों का क्षेत्र राजनीति है मगर एक पत्रकार ऐसा है जिसका कोई क्षेत्र नहीं है और सारे क्षेत्र उसके हैं। एक चींटी से लेकर दस लाख प्रकाश वर्ष दूर एक गैलेक्सी के ऊपर भी आप लिख सकते हैं। मैं एक पत्रकार हूं। ऑब्जर्वेशन लेना मेरी अभिरुचि है और वही मेरी ट्रेनिंग भी है। किसी भी क्षेत्र में कुछ ऐसा ऑब्जर्व कर सकता हूं जो उस क्षेत्र का कोई महाविद्वान भी अपने टनेल विजन के कारण शायद न कर पाए। मेरी सलाह यह है कि यदि आपके पास लिखने की कोई जगह है और चीजों को लेकर ऑब्जर्वेशन है तो आप बैठी क्यों हैं? लिखिए।
सवाल- बहुत-बहुत धन्यवाद आपका। आपसे बात करने का मेरा अनुभव बहुत शानदार रहा। न सिर्फ पत्रकारिता को लेकर बल्कि जीवन को भी लेकर। मुझे ये समझ में आया कि पत्रकारिता करना एक क्वेस्ट है, प्यास है, ललक है। और यह भी कि इसको नौकरी या करियर तक समेटकर देखना बेवकूफी है।
जवाब- धन्यवाद!
चंद्रभूषण से संपर्क [email protected] के ज़रिए किया जा सकता है.
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