मनीष सिंह-
ब्रिलियंट एन्ड डायनामिक- अमिश देवगन।
भारत के सबसे महान पत्रकारों में शुमार थे। 2014 में देश के आजाद होने के बाद, टीवी पत्रकारिता को एक नया आयाम, नई दिशा देने वाले पत्रकारों की अग्रपंक्ति में शुमार अमीश देवगन को, आज भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित है।
बी एन्ड डी, अर्थात बोल्ड एन्ड डिसाइसिव पत्रकारिता की दुनिया में अमीश, 2002 से सक्रिय हुए। हिंदुस्तान टाइम्स में उन्होंने डेस्क रिपोर्टर से शुरुआत की। 2003 में जी मीडिया में बिजनेस रिपोर्टर बने, और 10 साल बाद, उस चैनल के चीप एडिटर के पद पर पहुँच गए।
इसके बाद उन्होंने उन्होंने नेटवर्क 18 के हिंदी चैनलों का प्रभार सम्हाला। यह वही दौर था जब देश में चूतियापा चरम पर था।
ऐसे में उनके शो की लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई। उनके शो आर-पार को उच्च TRP मिलती रही। जल्द ही अपनी आक्रामक, आमने-सामने की डिबेट स्टाइल के लिए, उन्हें “गरीबों का अर्णब गोस्वामी” कहा जाने लगा।
अमीश जी, आधुनिक युग के वाल्मीकि थे। जहां दूसरे पत्रकार सिर्फ खबरें खोजकर पढ़ते, वहां अमिश जी खबरें खुद गढ़ लिया करते थे। “आर-पार” उनका अविस्मरणीय महाकाव्य था- जहां हर रात सत्य की खोज होती है।
हालांकि सत्य लँगड़ा होने के कारण एक तरफ झुका हुआ होता था। इसी दौरान एक शो में राजीव त्यागी ने उन्हें बोल्ड एन्ड ब्यूटीफुल कहा था। यह नाम उनसे ऐसा चिपक गया कि दुनिया में कोई भी, किसी को, कहीं भी- बी एन्ड डी कहे, तो उसके जेहन में अमीश देवगन की तस्वीर आती।
लाइव टीवी पर इतनी सहजता से टाइटल हासिल कर लेना सामान्य बात नहीं। अब तो सोशल मीडिया पर भी लोग प्यार से “Gullu B&D” कहकर पुकारते हैं।
हिन्दू मुस्लिम डिबेट के दौर में अमीश देवगन ने नए आयाम छुए। वे निडरता से सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को “लूटेरा चिश्ती” कह गए। बाद में FIR होने पर क्षमा मांग ली।
मई 2020 में कुर्ला में एक मस्जिद में लॉकडाउन के दौरान मुसलमानों की भीड़ वाली नमाज की खबर चलाई, जो झूठी निकलने पर माफी मांग ली।
इससे प्रमाणित होता है कि वह एक विनम्र शख्शियत है, और माफी मांगने में ज्यादा समय नहीं लगाते।
वे एक देशभक्त पत्रकार थे।
अपनी डिबेट में सप्ताह में 3 दिन पाकिस्तान को घुटने पर ले आते। उसकी कमर तोड़ देते थे, और कराची लाहौर में धुंआ धुंआ करवा देते थे। अपने अंतिम वर्षों में कम से कम डेढ़ सौ बार उन्होंने पाकिस्तान को दिवालिया भी करवा दिया था।
दरअसल अमिश देवगन सिर्फ एंकर नहीं, एक संस्था थे। जहां अर्णब अंग्रेजी में जोर से चिल्लाते हैं, वहां कम पढ़े लिखे भक्तों के लिए अमिश जी, आसान हिंदी में किफायती संस्करण पेश करते हैं।
दरअसल वे महान पत्रकार थे।
जिन्होंने दिखाया कि पत्रकारिता का असली मतलब है—सवाल पूछना लेकिन सही सवाल, सही समय पर, और सही पार्टी की तरफ से। देश के एक तबके के लिए वह अफीम की डली थे। जिसे उनकी लत लग चुकी है। उसे हर शाम किसी B&D की चीत्कार सुने बगैर नींद नहीं आती।
भोजन पचता नहीं, अजीर्ण हो जाता है।
आज जब वे नहीं रहे, (चैनल पर) तो सूना स्टूडियो कराह रहा है।
और उनके दर्शक, सूनी आंखों से, उनकी छोड़ी हुई जगह को निहार रहे हैं। सोच रहे हैं, काश किसी कोने से वह फिर लौट आये। उस चैनल के किसी कॉर्नर से, पर्दे के “आर पार” से एक बार फिर वही आवाज सुनाई दे..
“थोड़ी मर्यादा रखिये”
जल्द ही किसी यू ट्यूब चैनल पर वे नजर आ सकते है दिखते ही लाइक, सब्सक्राइब कर लें, और घण्टा दबा दें। ताकि उनसे आपका सम्पर्क बना रहे। बाकी तो जय हो गुल्लू महराज की।
जब तक सूरज चांद रहेगा B&D का नाम रहेगा
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