पंकज शुक्ला-
कमेंट से पहले पूरी पोस्ट ध्यान से पढ़ें। ये पढ़े लिखों की लापरवाही का ऐसा नमूना है, जिससे सबक़ लेना ज़रूरी है। क्योंकि, मुंबई में फ़िल्मों के प्रचार में लगी पीआर एजेंसियों के आईटी सेल, सियासी दलों से भी भयानक हैं!
थोड़ी देर पहले मैंने असग़र वजाहत जी के फ़ेसबुक पेज पर एक पोस्ट पढ़ी, जिसमें उन्होंने किसी ‘मित्र’ से मिले स्क्रीनशॉट का हवाला देकर ‘नवभारत टाइम्स’ की काफ़ी लानत-मलामत की है।
इस स्क्रीन शॉट में असग़र वजाहत को पाकिस्तानी लेखक लिखा गया है। ज़ाहिर है कि ऐसी किसी बात पर लेखक बिरादरी का ग़ुस्सा फूटेगा ही। तो इस पोस्ट पर उनके तमाम चाहने वालों के अलावा, जनसत्ता के पूर्व संपादक ओम थानवी, वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज सरीखे कई विद्वान लोगों ने भी टिप्पणियाँ कीं।

लेकिन, मेरा मन माना नहीं। क्योंकि, नवभारत टाइम्स की फीचर्स और एंटरटेनमेंट एडीटर रेखा ख़ान से मेरा बहुत पुराना परिचय रहा है। मशहूर शायर और गीतकार असद भोपाली की वह बहू हैं। फ़िल्म ‘बटवारा 1947’ का रिव्यू उन्होंने ही नवभारत टाइम्स की वेबसाइट पर लिखा है। और, रिव्यू पूरा पढ़ते ही पक्का हो गया कि असग़र वजाहत ने ‘कौआ कान ले गया’ पर यक़ीन कर लिया है।
मैंने नवभारत टाइम्स की वेबसाइट पर न सिर्फ़ रेखा ख़ान का पूरा रिव्यू पढ़ा बल्कि उन्हें इस बाबत मैसेज भी किया। उनका तुरंत जवाब आया कि स्क्रीन शॉट में दिख रहा रिव्यू उनका नहीं है। जिस पोर्टल की तरफ़ उनका इशारा था, वहाँ जाकर देखा तो वहां पर भी ऐसा कुछ मिला नहीं। हाँ, असग़र वजाहत ने जो स्क्रीन शॉट शेयर किया है, उसके फॉन्ट उस हिंदी न्यूज़ चैनल की वेबसाइट जैसे ही हैं।
अब सवाल ये उठता है कि क्या असग़र वजाहत ने अपने ‘दोस्त’ से स्क्रीन शॉट मिलने के बाद और अपनी पोस्ट में नव भारत टाइम्स का ज़िक्र करने से पहले खुद जाकर फ़िल्म ‘बटवारा 1947’ का रिव्यू संबंधित पोर्टल पर पढ़ने की कोशिश की? और, नहीं तो फिर जिस तरह से उन्होंने एक वरिष्ठ समीक्षक के कार्य पर तोहमत लगाने की कोशिश की, वह बहुत आपत्तिजनक है।
ताज्जुब इस बात का भी है कि असग़र वजाहत की फ़ेसबुक वॉल पर इस पोस्ट के नीचे टिप्पणी करने वाले तमाम वरिष्ठ पत्रकारों ने भी नव भारत टाइम्स पर संबंधित फ़िल्म का रिव्यू देखने की कोशिश नहीं की। किसी ने समीक्षक का नाम लिखने के लिए वजाहत जी को ‘उत्साहित’ किया तो किसी ने कुछ और टिप्पणी की।
बहरहाल, सबक़ यही है कि कौन कान ले गया की आवाज़ आए तो कौए के पीछे भागने से पहले अपने कान चेक कर लेना बहुत ज़रूरी है। जै जै..!
रिव्यू के दोनों पैरा हू-ब-हू मिलते हैं, सिवाय ‘पाकिस्तानी’ शब्द के. दो संभावनाएं हो सकती हैं- या तो असग़र वज़ाहत को किसी ने स्क्रीनशॉट से छेड़छाड़ कर के भेजा हो (पाकिस्तानी शब्द जोड़कर) या फिर ‘आज तक’ ने अपनी रिपोर्ट को संशोधित कर दिया हो ‘पाकिस्तानी’ शब्द बाद में हटा दिया हो. क्योंकि Bhadas4media में ये ख़बर छपी थी जिससे मामले ने तूल पकड़ लिया था. बाद में भड़ास ने भी नवभारत टाइम्स से स्थिति क्लीयर होने के बाद ये ख़बर हटा दी…
-खुशदीप सहगल, वरिष्ठ पत्रकार
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