
देवप्रिय अवस्थी-
मेरी पत्रकारिता का इंदौर पड़ाव पिछले पड़ावों से सर्वथा भिन्न और चुनौतीपूर्ण था. राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी और वेदप्रताप वैदिक सरीखे संपादकों के शहर में नया अखबार निकालना और जमाना आसान नहीं था. नईदुनिया और दैनिक भास्कर के अलावा नवभारत, स्वदेश और इंदौर समाचार शहर में पहले से जमे-जमाए अखबार थे. न तो प्रबंधन को अखबार उद्योग का कोई पूर्व अनुभव था और न प्रधान संपादक प्रभाकर माचवे की अखबार की कोई पृष्ठभूमि थी. प्रबंध संचालक सुरेंद्र संघवी ने, जो मूलतः जमीनों के कारोबार से जुड़े थे, अच्छा अखबार निकालने का सपना जरूर संजो रखा था. उनके पिता जयंतीलाल संघवी इंदौर नगर भाजपा के अध्यक्ष रह चुके थे और गुजराती समाज, इंदौर के तत्कालीन अध्यक्ष थे.
पांच भाइयों में चौथे पंकज संघवी कुछ समय पहले ही भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए थे. इस कारण सुरेंद्र संघवी के इंदौर के व्यापार-उद्योग जगत के अलावा कांग्रेस और भाजपा के स्थानीय नेताओं-कार्यकर्ताओं से अच्छे संपर्क थे. भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय एक समय संघवी परिवार की सिंचाई पंपों की दुकान में सेल्समैन रह चुके थे.
चौथा संसार के लिए ज़्यादातर संपादकीय स्टाफ की भर्ती सुरेंद्र संघवी ने रमण रावल की मदद से की थी. रमण नवभारत, इंदौर छोड़कर मुझसे पहले से चौथा संसार से जुड़े थे. उस दौर में इंदौर के ज्यादातर अखबारों के संपादकीय विभाग में अंशकालीन सहयोगियों की बहुतायत थी. ऐसे ज्यादातर सहयोगी शिक्षण, बैंकिंग या आकाशवाणी से जुड़े थे. यह व्यवस्था अखबार प्रबंधन और अंशकालीन सहयोगियों, दोनों के लिए मुफीद थी.
अखबार को कम खर्च में संपादकीय सहयोगी मिल जाते थे और अंशकालीन सहयोगियों को पत्रकार होने की पहचान. चौथा संसार से पहले मैंने जिन अखबारों में काम किया था, उनमें इक्का-दुक्का अंशकालीन सहयोगी ही थे इसलिए मुझे यह व्यवस्था अटपटी लगी, लेकिन इंदौर में आम चलन होने के कारण उसे मानना पड़ा. बताता चलूं कि कभी राजेंद्र माथुर, विष्णु खरे, प्रभाष जोशी और ओम नागपाल सरीखे दिग्गज इंदौर के अखबारों से अंशकालीन सहयोगी के रूप में जुड़े थे.
एक और समस्या अखबार की स्वतंत्र पहचान बनाने की थी. पंकज संघवी के कांग्रेस में सक्रिय होने के कारण यह धारणा आम थी कि चौथा संसार मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह और कांग्रेस का समर्थक अखबार है. इस धारणा को तोड़ना इसलिए भी जरूरी था क्योंकि शहर का प्रमुख अखबार नईदुनिया कांग्रेस समर्थक था. फिर एक और कांग्रेस समर्थक अखबार को पाठक क्यों स्वीकार करते? मैंने इस बारे में सुरेंद्र संघवी से बात की और अखबार के रोजमर्रा के कामकाज में पंकज संघवी को दूर रखने का आग्रह किया. सुरेंद्र भाई ने बगैर किसी हिचक के मेरा आग्रह स्वीकार कर लिया. पांच में से चार संघवी बंधु-सुरेंद्र, नैनेश, योगेश और भूपेश अखबार के दफ्तर में अक्सर आते रहते, लेकिन पंकज संघवी नहीं आते.
माचवे जी की गरिमामय मौजूदगी से पूरी संपादकीय टीम में एक तरह का आश्वस्ति भाव बना रहता था. वे विविध विषयों पर नियमित रूप से संपादकीय टिप्पणियां तो लिखते ही, तमाम विषयों पर हमारा संदर्भ कोश भी थे. कैसा भी संशय हो, वे चुटकियों में दूर कर देते थे. माचवे जी जब कभी इंदौर से बाहर जाते, कई लेख और टिप्पणियां इस हिदायत के साथ मुझे सौंप जाते कि जरूरत और सुविधा के अनुसार उनका अखबार में उपयोग कर लेना. उन सरीखे सहज-सरल संपादक बिरले ही होते हैं.
चौथा संसार का प्रकाशन 16 दिसंबर 1988 को शुरू हुआ. स्थानीय और क्षेत्रीय खबरों को प्राथमिकता देने की नीति से उसे अपनी पहचान बनाने में ज्यादा समय नहीं लगा. प्रतिदिन चार पेज का फीचर परिशिष्ट उसका अतिरिक्त आकर्षण था. कुछ ही समय में उसकी प्रसार संख्या ने 40 हजार का आंकड़ा छू लिया. उस समय चौथा संसार इंदौर का तीसरा बड़ा अखबार बन गया था. पहले दो अखबार नईदुनिया और भास्कर थे.
अब कुछ जानकारी चौथा संसार के शुरुआती संपादकीय सहयोगियों के बारे में. रमण रावल सभी फीचर परिशिष्टों के समन्वयक थे. इस काम में शकील अख़्तर उनके सहयोगी थे. सभी फीचर परिशिष्टों के अलग-अलग अंशकालीन प्रभारी थे. बाल संसार की जिम्मेदारी लोकेंद्र चतुर्वेदी के पास थी तो सखी संसार प्रतिमा डिके संभालती थीं. अर्थ संसार नैनेश संघवी की देखरेख में बनता था. कृषि संसार आकाशवाणी के राकेश जोशी देखते थे. संपादकीय पेज जीवन सिंह ठाकुर के जिम्मे था.
संपादकीय विभाग में प्रतीक श्रीवास्तव हरफनमौला किरदार थे. छात्र राजनीति में पंकज संघवी के साथी रहे प्रतीक, सुरेंद्र संघवी के विश्वस्त थे. वह बहुत सारी जिम्मेदारियां निभाने के साथ सुरेंद्र संघवी और मेरे बीच कड़ी की भूमिका भी निभाते थे. वे बहुत अच्छे डिबेटर और मोटीवेशनल स्पीकर भी हैं.
सिटी रिपोर्टिंग का काम सतीश जोशी, आशुतोष वाजपेयी और नारायण भूतड़ा देखते थे. चूंकि इंदौर की पत्रकारिता में प्रेस विज्ञप्तियों की भूमिका अहम थी इसलिए विज्ञप्तियों के चयन और संपादन के लिए दो-तीन और सहयोगी भी थे.
मुख्य डेस्क बापू परमार और मोहन राठौर (दोनों अंशकालीन) संभालते थे. सुरेंद्र जोशी, रमेश पांडेय, जयंत गोस्वामी आदि समय-समय पर उनके सहायक रहे.
खेल पेज अनिल वत्स, महेश कजोड़िया व सुशीम पगारे और व्यापार पेज मूदड़ाज्ञऔर मोहन नरवरिया के जिम्मे था. डाक डेस्क पर गोपाल जोशी, कैलाश मालवीय, रफीक विसाल, कैलाश यादव आदि थे.
सफदर शामी नामक आर्टिस्ट कैरिकेचर बनाने में दक्ष थे. परिशिष्टों को अंतिम रूप देने में भी उनकी भूमिका रहती थी. संदर्भ और लायब्रेरी का काम शैलेंद्र जोशी देखते थे.
नए-नवेले अखबार के कामचलाऊ दिल्ली ब्यूरो में अशोक वानखेडे, दीपक चौरसिया, संजीव आचार्य, कुमार राकेश आदि ने भी काम किया. अखबार के भोपाल ब्यूरो के प्रमुख शिव अनुराग पटेरिया जनसत्ता, मुंबई छोड़कर आए थे. दिनेश गुप्त और ऋषि पांडेय उनके सहयोगी थे. मालवा-निमाड़ के जिला मुख्यालयों में भी अखबार का नेटवर्क बनाया गया था. इनमें मुस्तफा आरिफ (उज्जैन), अरविंद काशिव (धार), अजीजुद्दीन शेख (खरगोन), प्रकाश कोठारी (रतलाम), सुरेश शर्मा (खंडवा), यशवंत घोड़ावत (झाबुआ) के नाम मुझे याद रह गए हैं. देवास, मंदसौर, शाजापुर के साथियों के नाम याद नहीं आ रहे.
चौथा संसार की बात हो तो उसके पहले महाप्रबंधक अवनींद्र जोशी का जिक्र भी जरूरी है. बेहद उत्साही और निपुण अवनींद्र विज्ञापन और प्रसार दोनों विधाओं की अच्छी समझ रखते थे. उन्होंने मालवा और निमाड़ क्षेत्र में घूम-घूमकर अखबार के मुफस्सिल संवाददाताओं और एजेंटों की प्रभावी टीम तैयार करने में खासी मेहनत की थी. प्रोडक्शन विभाग में सुल्तान खान और आहूजा सक्रिय भूमिका में थे.
अखबार के रूप में चौथा संसार की ठीक-ठाक पहचान बन जाने के बावजूद मुझे वहां अपना और अखबार का भविष्य नहीं दिखता था, इसलिए जल्दी ही मन उचाट होने लगा. संयोग से इसी बीच नईदुनिया के स्वामित्व के विभाजन की प्रक्रिया भी आकार ले रही थी. इस प्रक्रिया के तहत नईदुनिया का भोपाल संस्करण उसके तीन संस्थापकों में एक नरेंद्र तिवारी के पुत्र द्वय राजेंद्र और सुरेंद्र के हिस्से में आना था. विभाजन की प्रक्रिया की जानकारी मिलने पर मैंने प्रभाष जी से वहां जाने की इच्छा जाहिर की. प्रभाष जी ने इस बाबत राजेंद्र तिवारी से बात की तो उन्होंने मुझे दैनिक नईदुनिया, भोपाल में कार्यकारी संपादक बनाने के लिए हामी भर दी. उनकी हामी के बाद मैंने सुरेंद्र संघवी को सूचना देकर 31 मार्च 1991 को मुझे कार्यमुक्त करने का आग्रह किया.
इस तरह चौथा संसार में करीब पौने तीन साल की मेरी पहली पारी पूरी हुई.
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मेरी पत्रकारिता यात्रा (8): मैं मानता हूं कि यह एक ऐतिहासिक भूल थी जिसने जनसत्ता को अभियान से संस्थान में तब्दील नहीं होने दिया!


