नई दिल्ली। स्वतंत्र पत्रकार रवि नायर के दिल्ली और केरल स्थित घरों पर गुजरात पुलिस की कार्रवाई के बाद डिजिटल डिवाइस की जब्ती और पत्रकारों के अधिकारों को लेकर बहस तेज हो गई है। गुजरात पुलिस ने 17 अगस्त को नायर के परिसरों में तलाशी लेकर मोबाइल फोन, लैपटॉप और आईपैड समेत कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए। यह कार्रवाई उनके खिलाफ दर्ज एक FIR की जांच के सिलसिले में की गई, जो द वॉशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित अडानी समूह से जुड़ी एक जांच रिपोर्ट के बारे में नायर की सोशल मीडिया पोस्ट से संबंधित है।
मामले में खास बात यह है कि पुलिस ने नायर के अलावा उनके बेटे और एक सहयोगी के डिवाइस भी जब्त किए। रिपोर्टों के मुताबिक, ये दोनों इस मामले में आरोपी नहीं हैं। इस पहलू ने पुलिस की कार्रवाई के दायरे और डिजिटल उपकरणों की जब्ती की प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
क्या है पूरा मामला?
रवि नायर ने द वॉशिंगटन पोस्ट की अक्टूबर 2025 में प्रकाशित उस जांच रिपोर्ट से जुड़ी सामग्री सोशल मीडिया पर साझा की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि सरकारी स्वामित्व वाली LIC ने केंद्र सरकार के निर्देश पर अडानी समूह की कंपनियों में निवेश करने की योजना बनाई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 3.9 अरब डॉलर के संभावित निवेश से जुड़े दस्तावेजों और अधिकारियों से बातचीत के आधार पर यह जांच की गई थी।
इस मामले में अडानी पोर्ट्स एंड SEZ की शिकायत के बाद गुजरात पुलिस ने FIR दर्ज की। नायर पर धोखाधड़ी और जालसाजी समेत कई धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं। गुजरात हाईकोर्ट ने हाल में FIR रद्द करने की उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद पुलिस ने उनके परिसरों की तलाशी ली।
डिजिटल डिवाइस जब्त करना इतना महत्वपूर्ण क्यों?
मोबाइल फोन, लैपटॉप और आईपैड आज सिर्फ सामान्य सामान नहीं हैं। इनमें किसी पत्रकार के सोर्स, संपर्क, ईमेल, दस्तावेज, नोट्स, तस्वीरें और दूसरे पत्रकारों के साथ हुई बातचीत जैसी संवेदनशील जानकारी हो सकती है। ऐसे में किसी पत्रकार का पूरा डिजिटल उपकरण जब्त किए जाने से जांच के दायरे से बाहर की निजी और पेशेवर जानकारी तक पहुंच का सवाल भी उठता है।
यही वजह है कि डिजिटल सबूत इकट्ठा करने की प्रक्रिया में तलाशी का कानूनी आधार, वारंट की शर्तें, जब्ती की सूची, डिवाइस की फॉरेंसिक कॉपी और डेटा की सुरक्षा जैसे पहलू महत्वपूर्ण हो जाते हैं। मौजूदा मामले में भी यही सवाल चर्चा के केंद्र में हैं।
आरोपी नहीं होने वालों के डिवाइस क्यों लिए गए?
रिपोर्टों के अनुसार दिल्ली में पुलिस ने नायर के घर से तीन लैपटॉप, दो फोन और एक आईपैड जब्त किया। इनमें कुछ डिवाइस उनके बेटे और सहयोगी के बताए गए हैं। उनके खिलाफ इस मामले में आरोप नहीं हैं।
यही बिंदु इस कार्रवाई को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा में है। सवाल यह है कि जांच के दौरान किसी आरोपी के परिसर से तीसरे व्यक्ति के निजी डिजिटल उपकरण जब्त करने की जरूरत और उसका कानूनी आधार क्या था।
पत्रकार संगठनों ने जताई चिंता
कार्रवाई के बाद पत्रकार और मीडिया संगठनों ने भी चिंता जताई है। DIGIPUB News India Foundation ने गुजरात पुलिस की कार्रवाई की निंदा करते हुए कहा कि पत्रकार के घरों की तलाशी और डिजिटल डिवाइस की जब्ती प्रेस की स्वतंत्रता और उचित प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है। संगठन ने खास तौर पर ऐसे लोगों के डिवाइस जब्त किए जाने पर सवाल उठाया जो मामले में आरोपी नहीं हैं।
मीडिया संगठनों ने इसे सिर्फ एक पुलिस जांच का मामला न मानते हुए पत्रकारों के काम, उनके स्रोतों की गोपनीयता और प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक मुद्दे के तौर पर देखा है।
मामला अब सिर्फ रवि नायर तक सीमित नहीं
रवि नायर के मामले ने डिजिटल युग में पुलिस की जांच शक्तियों और नागरिकों के निजता के अधिकार के बीच संतुलन पर एक महत्वपूर्ण बहस छेड़ दी है। खासकर पत्रकारों के मामले में सवाल और गंभीर हो जाता है, क्योंकि उनके उपकरणों में ऐसी जानकारी हो सकती है जिसका संबंध किसी चल रही जांच से नहीं बल्कि उनके पत्रकारिता स्रोतों से हो।
इसलिए अब बहस सिर्फ इस बात पर नहीं है कि पुलिस ने डिवाइस जब्त किए या नहीं, बल्कि यह भी है कि डिजिटल सबूत जुटाने के दौरान जांच एजेंसियां कितनी जानकारी तक पहुंच सकती हैं और पत्रकारों की संवेदनशील सामग्री तथा तीसरे पक्ष के डेटा की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाती है।
मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया यह तय करने में अहम होगी कि जांच में जब्त किए गए डिजिटल उपकरणों के साथ किस तरह की प्रक्रिया अपनाई जाती है और डिजिटल निजता तथा प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े सवालों पर अदालतों का रुख क्या रहता है।


