यशवंत सिंह-
जिन लोगों के बारे में मुझे बताया गया या पता चला कि वे बड़े अद्भुत संत हैं या जाग्रत उच्चचेत्ता व्यक्ति हैं या एनलाइटेंड आदमी हैं या सिद्ध साधु हैं या भविष्यदृष्टा व्यक्तित्व हैं, उनमें से अधिकतर मुझे औसत किस्म के लोग लगे। इन सबकी बड़ी प्रॉब्लम इनका अहंकार होता है। वे ख़ुद को स्पिरिचुअल वीआईपी टाइप फील करते हैं और सामने वालों को समस्याग्रस्त टाइप दीनहीन कंफ्यूज आदमी जिसे ये अब ठीक कर देंगे अपने ज्ञान से।
एक बाबाजी का काफ़ी नाम सुना था। उनकी कुटिया पर गया तो देखा कि स्थानीय गाँव का एक सवर्ण व्यक्ति जब उनकी कुटिया में झाड़ू लगाने लगा तो वो उसे मना करने लगे। उनका कहना था झाड़ू लगाने का काम अवर्ण का होता है। वो बाबा उस दिन मेरी नज़र से गिर गया। उस बाबा की तारीफ़ में मैं कई सचित्र पोस्ट भी एफबी पर लिख चुका हूँ लेकिन अंत में मेरा उससे मोहभंग हो गया। जो मानव मात्र में भेद करता हो, वो कैसा संत।
एक अन्य बाबा से मिलने पहाड़ की ऊँचाई पर गया। कुछ मित्रों से उनकी बहुत चर्चा सुनी थी तो उन्हीं मित्रों के साथ चल पड़ा। उस बाबा का मन अध्यात्म में कम, अपने चैनल पर अपने प्रवचन का वीडियो अपलोड करने में ज़्यादा लगता है। वो वीडियो अपलोड करने के पहले अच्छे से एडिटिंग भी करता है। वीडियो बनाने से पहले कंघी वंघी करके बाल ठीक करता है। मिलने आने वालों से बातचीत का वीडियो तैयार करना बाबा के चित्त में हमेशा रहता है। ख़ुद का इंटरव्यू करने के लिए आदमी भी रख रखा है। मतलब बाबा आत्ममुग्ध से लगे। मुझे ये बाबा कम, आध्यात्मिक इन्फ़्लुएंसर ज़्यादा लगे जिनका चैनल मोनेटाइज़ हो चुका है।
इसी तरह आज मेरी मुलाक़ात एक ऐसे शख्स से हुई जिसे बहुत गुरु टाइप चीज बताया गया लेकिन मुझे ये आदमी आध्यात्मिक अहंकारी लगा। बैठते ही गुरुडम वाले भाव में पूछा, आपकी क्या समस्या है? मैंने कहा कोई समस्या नहीं है। तो आपके लिए क्या शुभेच्छा करूँ? अरे मेरे लिए क्यों करेंगे, पूरे जगत के लिए करिए, उसमें से मुझे भी मिल जाएगा। वे बताये प्रकृति बहुत सरल है, मैंने कहा प्रकृति बहुत सरल और बहुत काम्प्लेक्स दोनों एक साथ है, जो जैसा कन्सीव करे।
खैर, देर तक बतकही हुई। गुरु जी अपनी गुरुता छोड़ने के लिए तैयार नहीं और मुझे ऐसे लोग स्वीकार नहीं जो बात तो सहजता सरलता की करते हैं लेकिन होते आध्यात्मिक अहंकारी हैं। वे अपनी स्वनिर्मित गुरुडम की उच्च कुर्सी से उतरने के लिए तैयार नहीं होते।


(ग़ाज़ीपुर आवास पर स्ट्रीट डॉग टहलते आते हैं और इस भयानक उमस वाले मौसम में ख़ूब वेंटीलेटेड रूम में पंखा की ठंढी हवा पाकर फ़टाक से सो जाते हैं, बेहद निश्चिंत होकर कि यहाँ कोई उन्हें कुछ न बोलेगा। आपस में जब अहंकार नहीं होता, तो बराबरी का रिश्ता बनता है, जिसकी नींव भरोसे से निर्मित होती है! ये कुत्ते उन स्वघोषित संतों से ज़्यादा सहज सरल और भरोसेमंद होते हैं)


