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दलित दस्तक यू-ट्यूब चैनल ने 15 लाख सब्सक्राइबर्स का आंकड़ा छुआ!

Screenshot of a YouTube Studio dashboard for the channel 'Dalit Dastak' showing the left navigation, a video thumbnail in the center, and an analytics/notifications panel on the right.

अशोक दास-

हालांकि यह एक हफ्ते पुरानी खबर हो गई है, लेकिन उन लोगों के लिए साझा करना जरूरी हैं, जिन्होंने इस आंकड़े तक पहुंचाया है। दलित दस्तक यू-ट्यूब चैनल ने 15 लाख सब्सक्राइबर्स का आंकड़ा छू लिया है। मैं हर उस एक साथी को धन्यवाद देना चाहूंगा, जो इस आंकड़े में शामिल है।

वैसे जून 2017 में यू-ट्यूब की शुरूआत के बाद 9 सालों में इस आंकड़े तक पहुंचना कोई क्रांति नहीं है। बल्कि कई अन्य चैनलों ने हमसे जल्दी और बहुत कम वक्त में इस आंकड़े को छुआ है। ऐसे में यह मेरे आलस का परिणाम है कि दलित दस्तक को इस आंकड़े तक पहुंचने में इतना वक्त लगा। क्योंकि यू-ट्यूब 365 दिन एक जैसा समर्पण मांगता है, और मैं इसके लिए इतना समर्पित नहीं हो पाता हूं।

वीडियो बनाना और कोई स्टोरी सोचने से लेकर उस स्टोरी के ऑन लाइन होने तक की प्रक्रिया बहुत लंबी होती है। यह एक टीम वर्क है और मैं कभी भी बड़ी टीम बनाने में सफल नहीं हो पाया। एक दो बार कोशिश की लेकिन आर्थिक संकट में घिर कर पीछे हटना पड़ा। ऐसे में जो भी आप तक पहुंचा पाता हूं उसमें मेरे अलावा बस वीडियो एडिटर और कैमरा मैन शामिल होते हैं।

2012 में जब पहले वेबसाइट और फिर मैगजीन शुरू की थी, और फिर 2017 में जब यू-ट्यूब शुरू किया तो एक जिद थी कि अपना मीडिया हाउस बनाना है। इसी बीच प्रकाशन (दास पब्लिकेशन) भी शुरू किया और 20 किताबें भी प्रकाशित की। लगा कि हर तरीके से समाज के साथ संवाद होना चाहिए। इसलिए बाद में कैलेंडर भी शुरु किया। सोचा कि कभी तो कुछ लोग जुड़ेंगे जो कहेंगे कि चलो मिलकर इसको बड़ा बनाते हैं, लेकिन छोटी-मोटी सहायता से ज्यादा कुछ हो नहीं पाया।

कई बार लगा कि काम को इतना फैला लिया है कि बिखर जाता हूं। लेकिन मैगजीन का मोह नहीं जाता। लिखते-पढ़ने के बाद लगता है कि जिंदा हूं।

2005-06 में IIMC से मीडिया की पढ़ाई पूरी करने के बाद साल 2006 से मीडिया में सक्रिय हूं और अब जबकि मीडिया में 20 साल और अंबेडकरवादी मीडिया को 15 साल दे चुका हूं, तो एक बार ठहर कर सोचना चाहता हूं कि इस रास्ते में किस ओर और कैसे बढ़ा जाए। क्योंकि इतने दिन में यह तो क्लियर हो गया है कि जो करना है, बहुत कम संसाधनों में खुद ही करना है।

इस बीच एक द्वंद और रहा। कई बार लगा कि “दलित दस्तक” नाम के कारण समाज को जोड़ना आसान रहा। लेकिन जब करोड़ों की संख्या वाला समाज 9 सालों में सिर्फ 15 लाख ही जुड़ पाया तो लगता है कि क्या इस नाम ने लाखों लोगों को दूर तो नहीं कर दिया? लेकिन वहीं सोचता हूं कि हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में बोलना, अमेरिका की दो बार की यात्रा, कनाडा का कांफ्रेंस, स्वीडन में मीडिया फेलोशिप के अलावा दुबई की यात्रा का मौका दिलाने में इस नाम और समाज के साथियों का योगदान रहा है। उनका शुक्रिया।

खैर, सबसे बड़ी बात यह है कि अगर आप अपने मीडिया इनिसिएटिव को एक संस्थान नहीं बना पाएं और ऐसा सिस्टम नहीं बना पाएं, जिसमें दस लोग काम करें और आप उसकी निगरानी की भूमिका में आ जाएं तो एक उम्र के बाद यह काम बोझ लगने लगेगा। क्योंकि यह आपको तभी तक पैसे देता है, जब तक आप तेजी से दौड़ते हैं। इस सफर में रुकने की गुंजाइश नहीं है। रुकते ही आप पिछड़ते नहीं, बल्कि दौड़ से बाहर हो जाते हैं। आपकी जगह कोई और ले लेता है। और निस्संदेह… मैं ऐसी किसी दौड़ में शामिल नहीं होना चाहता।

तो या तो दलित दस्तक को कोई ऐसा साथी मिले, जिसके साथ मिलकर इसको बड़ा बनाया जाए, या फिर रुक कर सोचा जाए कि आगे क्या किया जाए।

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