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सुख-दुख

मेरी पत्रकारिता यात्रा (12) : दैनिक भास्कर की उस शर्त से दैनिक चौथा संसार की अर्थव्यवस्था चरमरा चुकी थी!

देवप्रिय अवस्थी-

चौथा संसार में 40 महीने के अंतराल के बाद शुरू हुई मेरी दूसरी पारी घर वापसी जैसी थी. प्रबंधन, संपादकीय और अन्य सभी विभागों में ज्यादातर पुराने लोग ही थे. इस बीच कुछ पुराने साथी अखबार छोड़ गए और कुछ नए जुड़े भी. संपादक श्रीनरेश मेहता के अलावा नए साथियों में सबसे प्रमुख महेश जोशी थे. वे नईदुनिया, इंदौर और नवभारत टाइम्स, जयपुर में कई जिम्मेदारियां संभाल चुके थे. मुख्य डेस्क पर अविनाश दीक्षित, आनंद देशमुख, सुभाष रानाडे, मिलिंद मजुमदार और फीचर डेस्क पर आलोक वाजपेयी, रवींद्र व्यास, विनीता श्रीवास्तव और दीपक असीम नए साथी थे, सखी संसार परिशिष्ट की शुरुआती प्रभारी प्रतिमा डिके अपने पति के स्थानांतरण के कारण मुंबई चली गई थीं. उनका काम संध्या राय चौधरी संभाल रही थीं. संध्या के भास्कर में जाने के बाद यह जिम्मेदारी स्वाति तिवारी ने संभाली.

इसी तरह स्टेट बैंक में अधिकारी रहे प्रकाश बियाणी अर्थ संसार के प्रभारी बने. डाक डेस्क पर कैलाश सेंगर, संजय जैन, रिपोर्टिंग में मनोहर लिंबोदिया, प्रवीण खारीवाल, जितेंद्र जाखेटिया, चंद्रशेखर शर्मा, विपिन नीमा, राजेंद्र गुप्त और व्यापार डेस्क पर प्रदीप भटेले नए साथी थे. जनसत्ता, चंडीगढ़ में सेंट्रल डेस्क के इंचार्ज रहे प्रदीप पंडित भी बहुत कम समय के लिए हमारी टीम में रहे.

मेरे चौथा संसार में दूसरी पारी शुरू करने के कुछ ही दिन बाद एक बड़ा हादसा हो गया. श्री नरेश मेहता के इकलौते पुत्र का भोपाल से इंदौर आते समय सड़क दुर्घटना में निधन हो गया. वे महज 37 वर्ष के थे. इस हादसे ने मेहता जी और उनकी पत्नी महिमा जी को बुरी तरह तोड़ दिया. उन्होंने फौरी तौर पर संपादक पद से मुक्त होने और भोपाल शिफ्ट हो जाने का फैसला किया. उनके जाने के बाद अखबार की प्रिंट लाइन में बतौर संपादक मेरा नाम जाने लगा. इससे मुझ में जिम्मेदारी का अहसास तो बढ़ा, लेकिन कोई खास खुशी नहीं हुई.

प्रभाष जोशी षष्टिपूर्ति प्रसंग’

इसी दौरान प्रभाष जोशी की षष्टिपूर्ति का अवसर आया. मेरी इस अवसर पर बड़ा आयोजन करने की इच्छा थी. सुरेंद्र भाई से बात की तो उन्होंने ने हर तरह के सहयोग की तत्परता दिखाई. मेरी पहल तथा इंदौर प्रेस क्लब, जन संपर्क विभाग, मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति और इंदौर नगर निगम की सक्रिय भागीदारी में 14-15-16 जुलाई 1997 को ‘प्रभाष जोशी षष्टिपूर्ति प्रसंग’ का तीन दिन का भव्य आयोजन हुआ. नानाजी देशमुख, दिग्विजय सिंह, नारायण दत्त तिवारी, हरिकृष्ण दुआ, संदीप पाटिल, रामबहादुर राय, हरिवंश, ओम थानवी, सुशील दोषी, आलोक तोमर सरीखी नामचीन हस्तियों की भागीदारी ने इस आयोजन की गरिमा में चार चांद लगा दिए. जनसत्ता, दिल्ली के लगभग 20 साथी पहुंचे थे. मुंबई से भी 8-10 साथी आने वाले थे, लेकिन 14 जुलाई को वहां दंगा भड़क जाने के कारण वे नहीं आ सके. रामबहादुर राय के आग्रह पर अटल बिहारी वाजपेयी ने भी कार्यक्रम में आने के लिए सहमति दे दी थी, लेकिन उन्हीं तारीखों में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा दिल्ली पहुंचने वाली थी इसलिए वे नहीं आ पाए. आयोजन के लिए शुभकामनाएं देते हुए जन संपर्क विभाग में फैक्स के जरिए उनका एक संदेश जरूर आया.

मध्यप्रदेश सरकार ने अतिथियों को राजकीय अतिथि का दर्जा देकर उनके ठहरने के लिए होटल-गेस्ट हाउस और वाहनों की व्यवस्था कर दी थी. भोजन की व्यवस्था भास्कर, नगर निगम और एक अन्य संस्था ने संभाली थी. इस आयोजन की सफलता के लिए बहुत से साथियों हाथ बंटाया था. इनमें प्रवीण खारीवाल, सतीश जोशी, मनोहर लिंबोदिया और चिन्मय मिश्र प्रमुख थे.

अजीबोगरीब समझौता

मेरे दैनिक नईदुनिया में रहने के दौरान 1993 में चौथा संसार और दैनिक भास्कर के प्नबंधन ने विज्ञापनों के मामले में दो वर्ष के लिए एक अजीबोगरीब समझौता कर लिया था. इस समझौते के तहत भास्कर अपनी प्रसार संख्या में चौथा संसार की प्रसार संख्या जोड़कर इंदौर में सबसे ज्यादा प्रसार संख्या वाला अखबार होने का दावा करता और उसी आधार पर रेट कार्ड बनाकर कारपोरेट विज्ञापन जुटाता. फिर विज्ञापन की आय का एक छोटा हिस्सा चौथा संसार को दे देता. हालांकि उस दौरान इंदौर का नंबर एक अखबार नईदुनिया ही था. चौथा संसार के लिए यह व्यवस्था इसलिए मुफीद थी कि उसे बैठे-ठाले ढेरों कारपोरेट विज्ञापन मिलने लगे और अखबार आर्थिक रूप से कमोबेश आत्म-निर्भर होने लगा, लेकिन इस व्यवस्था से चौथा संसार का विज्ञापन विभाग पूरी तरह पंगु हो गया. मुंबई, चेन्नई जैसे महानगरों में उसने अपने विज्ञापन कार्यालय बंद कर दिए.

दोनों अखबारों के इस समझौते की अवधि बढ़ाने का समय आया तो भास्कर प्रबंधन ने चौथा संसार का स्वामित्व/प्नबंधन उसे हस्तांतरित करने की शर्त रख दी. यह शर्त चौथा संसार के प्रबंध संपादक सुरेंद्र संघवी को मंजू़र नहीं थी. उधर, अपनी आक्रामक मार्केटिंग के बल पर भास्कर इंदौर में प्नसार संख्या के मामले में नईदुनिया से आगे निकल गया. अब उसे चौथा संसार की प्रसार संख्या की बैसाखी की गरज नहीं रह गई. नतीजतन, दोनों अखबारों का समझौता टूट गया और चौथा संसार की अर्थव्यवस्था चरमरा गई.

सुरेंद्र भाई का दूरी बनाना

इस घटनाक्रम से सुरेंद्र भाई को भारी सदमा लगा. वे अखबार के रोजमर्रा के कामकाज से क्रमशः दूरी बनाने लगे. उनकी जिम्मेदारी उनके पिताजी जयंतीलाल संघवी संभालने लगे. जयंतीलाल संघवी को हम सब काका कहते थे. वे परंपरागत सोच के व्यापारी थे. उन्होंने पूरी जिंदगी सिंचाई पंपों की दुकान चलाई थी. काका अखबार के खर्चों में यहां-वहां कतरब्योंत करने लगे. नतीजतन, कभी जिस अखबार की लगभग 45000 प्रतियां बिक रही थीं और जो शहर का तीसरा बड़ा अखबार था, वह सिमटकर 10000 प्रतियों से नीचे आ गया.

फ़रवरी 1998 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने इंदौर से पंकज संघवी को अपना उम्मीदवार बनाया. उनका मुकाबला भाजपा की सुमित्रा महाजन से था. पंकज भारी अंतर से चुनाव हार गए. भास्कर से समझौता टूटने के बाद संघवी परिवार के लिए यह दूसरा बड़ा झटका था. अखबार पर इसका नकारात्मक असर पड़ना ही था. दिन-ब-दिन परिस्थितियां बद से बदतर होती जा रही थीं. पूरी संपादकीय टीम निराश और हताश थी. ज्यादातर साथी दूसरे विकल्प तलाश रहे थे. नवंबर 1998 आते-आते में मैं भी विकल्प तलाशने के लिए मजबूर हो गया.

इस सिलसिले में मैंने भास्कर के प्रबंध संचालक सुधीर अग्रवाल को उनके पिछले दो प्रस्तावों की याद दिलाते हुए पत्र लिखा. दिसंबर के शुरू में श्रवण गर्ग ने फोन पर सूचना दी कि सुधीर जी अगले हफ्ते इंदौर आ रहे हैं. आप आकर उनसे मिल लें. सुधीर जी से मिला तो उन्होंने भास्कर के भोपाल संस्करण में को-आर्डिनेटर की भूमिका में काम देने का प्रस्ताव रखा. इसके लिए मैंने हामी भर दी. साथ ही, आग्रह किया कि मैं संपादकीय विभाग में प्रूफ रीडिंग से लेकर संपादकीय लिखने तक के सारे काम करने के लिए उपलब्ध रहूंगा, लेकिन दफ्तर के बाहर किसी भी तरह की लायजनिंग या दूसरे काम नहीं कर सकूंगा. सुधीर जी ने यह कहते हुए मेरा आग्रह स्वीकार कर लिया कि इस काम के लिए उनके पास और लोग हैं.

मुलाकात के फौरन बाद सुधीर जी ने नियुक्ति पत्र तैयार कराया और कहा कि पांच-छह दिन इंदौर संस्करण में रहकर हमारी कार्य प्रणाली देखिए-समझिए, फिर भोपाल आकर काम शुरू कीजिए. मैंने ऐसा ही किया. दिसंबर 1998 के आखिरी हफ्ते में भोपाल पहुंचकर अपनी नई जिम्मेदारी संभाल ली.

पिछला भाग…

मेरी पत्रकारिता यात्रा (11): अगले दिन राजेंद्र जी ने अपने कक्ष में तलब कर मुझसे कहा कि आपने सोम डिस्टीलरी वाली खबर छापकर अखबार का बड़ा नुकसान कर दिया है!

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