यशवंत सिंह-
सरकारी नौकरियां अब सबके वश की बात नहीं है। बहुत तनाव और दबाव है। यूपी में आबादी भयंकर है। उसी अनुपात में हैं समस्याएं। झगड़े रगड़े। परफॉरमेंस का दबाव। बॉसेज का आदेश निर्देश। सत्ताधारी नेताओं और उनके द्वारा संरक्षित अपराधियों की बदतमीज़ियाँ।
ऐसे में संवेदनशील व्यक्ति अगर अफ़सर बन गया तो पहले वह हर कुछ दिल पर लेता है। फिर धीरे धीरे एडजस्ट करने लगता है। लेकिन एक बेचैनी तो बनी ही रहती है। वह मौलिक नहीं रह जाता। ज़िन्दगी जबरन उसे किसी तरफ़ खींचती चली जाती है। कुछ पाता है तो बहुत कुछ खोता है।
दिव्या मित्तल के आईएएस पद से इस्तीफ़ा देने की बात सुनकर लगा, ज़रूर इस महिला के भीतर एक पवित्र और बेचैन आत्मा है जिसे वह कलुषित करने देने को तैयार नहीं है। समझदार और संवेदनशील व्यक्ति चाहते तो हैं बदलाव आए, लेकिन रिस्क लेने से डरते हैं। जमी जमाई नौकरी का मोह, आर्थिक और पारिवारिक सुरक्षा का बोझ इतना ज़्यादा होता है दिल दिमाग़ पर कि लंबी छलाँग लगाने का साहस कर लीक तोड़ने की हिम्मत नहीं कर पाते। लेकिन दिव्या मित्तल की तरह कभी कभार हिम्मत करने वाली शख़्सियतों से ये साबित होता रहता है कि प्रकृति की फैक्ट्री में वीरों के भी गढ़े जाने का क्रम जारी है।
ग़ाज़ीपुर शहर में मेरा डेढ़ बिस्वा का एक प्लॉट है। काफ़ी पहले लिया था। उसे बेचकर नोएडा में थ्री बीएचके लेने की सोच रहा हूँ। अभी 2 बीएचके में रहता हूँ। छोटा से बड़ा घर। यही सब करने में पता चलता है कि ज़िन्दगी खर्च हुई जाती है। ग़ाज़ीपुर वाले प्लॉट की बिक्री में कुछ पेंच फँस रहा था तो निराकरण के लिए तहसीलदार साहब के यहाँ पहुँचा। एक सुंदर सलोना नौजवान फ़ाइलों के अम्बार के बीच हैरान परेशान। मैं चुपचाप बैठ गया। कामकाज निपटाते, अधीनस्थों को निर्देश देते मुझसे मुखातिब हुए और काम पूछा। मैंने बताया प्लॉट बेचना है लेकिन प्लॉट का अंश निर्धारित नहीं है कागज में, और बताया जा रहा है कि नए नियम के मुताबिक बिना अंश निर्धारण के, खरीद बिक्री संभव नहीं है। तहसीलदार राजीव यादव जी ने तुरंत इलाके के लेखपाल अवधेश जी को कॉल किया और अंश निर्धारण का काम यथाशीघ्र पूरा करने का निर्देश दिया। मैंने आभार व्यक्त किया। अपना परिचय दिया, उनके बारे में जाना।
मैं बाहर निकलते वक़्त सोचता रहा, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़कर नौकरी में आये तहसीलदार राजीव यादव जी जैसे नौजवान सच में कितना वर्कलोड और तनाव में जी रहे हैं। सिस्टम को अगर ऊपर से न सुधारा जाए तो उसका असली दबाव मिडिल लेवल पर बैठे लोगों को उठाना पड़ता है। और, सिस्टम है कि उसकी अपनी गति है, अपनी चाल है।
ज़िन्दगी और व्यवस्था को गहराई से देखो तो समझ आता है, हम कितने नासमझ हैं। कोई हमें चला रहा है और हम सोचते हैं हम ख़ुद दौड़ रहे हैं। इसी आपाधापी में एक दिन घंटी बजती है और ज़िंदगी के स्कूल के हम सब छात्र निकल लेते हैं!
तस्वीर भाई राजीव यादव जी (तहसीलदार, गाजीपुर सदर) की, फ़ाइलों के अंबार के बीच ज़िन्दगी की जद्दोजहद!
आई ए एस अधिकारी दिव्या मित्तल Divya Mittal के इस्तीफे पर उनकी वाल पर मेरी प्रतिक्रिया
आप जब मिर्जापुर की जिलाधिकारी थीं, तब अचानक सोशल मीडिया के जरिए आपको देखा और तब से आपको अनियमित रूप से फालो कर रहा हूं..भारतीय नौकरशाही पर मेरी सोच जरा क्रिटिकल है..मेरी इस सोच को आप जैसे लोग ही चुनौती देते रहे हैं..नानक देव की सोच की तरह आप जैसे लोगों का ज्यादा जगहों पर फैलना जरूरी है। मानते हैं कि राजनीति आपकी राह में बाधा बनती रहेगी, लेकिन यह भी सच है कि नौकरशाही में रहते हुए जितना योगदान आप दे सकती हैं, शायद ही किसी अन्य विधा या कार्य से आप दे सकती हैं। आप जैसे लोग नौकरशाही में ज्यादा होने चाहिए। उसकी सोच को बदलने में आप जैसे लोगों की भूमिका और महत्व बढ़ जाता है। मेरी राय वैसे आपके लिए कोई मायने नहीं रखती, लेकिन मेरा सुझाव है कि व्यापक जनकल्याण, नौकरशाही को लोकशाही बनाने के सपने को पूरा करने के लिए आपका अपनी सेवा में बने रहना जरूरी है। एक बार आप अपने त्यागपत्र पर विचार जरूर कीजिएगा।
-उमेश चतुर्वेदी

विनय मौर्या-
नौकरशाही में आईएएसों के ठाठ होते हैं। यह ऐसी ठसकदार नौकरी है, जिसमें पद, पावर, पैसा और रुतबा सब समाहित है। मगर मैं कभी आईएएसों से बहुत प्रभावित नहीं हुआ। यूं कहिए कि मुझे यह सेवा कभी आईपीएस की तरह आकर्षक नहीं लगी।
मिला तो कई आईएएस अधिकारियों से, मगर तीन आईएएस अधिकारियों का व्यवहार और उनकी सादगी मुझे प्रभावित करती रही। एक नितिन रमेश गोकर्ण, दूसरे आईएएस एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष आलोक सिन्हा भईया और तीसरी दिव्या मित्तल।
मेरी किसी भी अधिकारी से निकटता का पहला पैमाना यही होता है कि वह पद और पावर के अहंकार से मुक्त हो, सरल और सहज स्वभाव का हो। ऊपर उल्लेखित तीनों नाम मुझे मिलनसार, सरल और सहज लगे।
आलोक सिन्हा साहित्यिक रुचि के रहे हैं। व्यवस्था पर व्यंग्य सहित मेरे अन्य लेखों को बजरिये एक दूसरे पत्रकार के वह पढ़ते और सराहते थे। उन्होंने ही एक बार कहा था कि पत्रकार शासन-प्रशासन या सरकार से सवाल नहीं करेगा तो कौन करेगा। सरकार के पास अपना पक्ष रखने के लिए प्रवक्ता हैं, पार्टी के लोग हैं और सूचना विभाग है।
बहरहाल, बात दिव्या मित्तल की।
आज सुबह उठा तो सोशल मीडिया पर एक खबर तैर रही थी कि दिव्या मित्तल ने इस्तीफा दे दिया है। पिछले साल अप्रैल में देवरिया जाना हुआ था। हमारे साथी पत्रकार मूलतः वहीं के निवासी हैं। हम तीन पत्रकार कार से देवरिया पहुंचे थे। उस वक्त देवरिया की डीएम दिव्या मित्तल थीं और कप्तान विक्रांत वीर।
हमें डीएम से मिलना था। यही कोई दो बजे का समय था। फरियादियों की जबरदस्त भीड़ थी। दफ्तर में फरियादियों के लिए कुर्सियां लगी हुई थीं। दिव्या मित्तल स्वयं एक-एक फरियादी के पास जातीं, उनकी बात सुनतीं और तत्काल संबंधित विभाग को मोबाइल पर निर्देश देतीं। साथ ही ताकीद करतीं कि जांच करके या जो भी विषय है, उसके बारे में फोन करके बताइएगा।
फरियादियों के साथ उनका व्यवहार अफसराना कम और दोस्ताना ज्यादा था। शायद यही वजह थी कि वह जनता से आसानी से कनेक्ट हो जाती थीं।
जब वह हम लोगों के पास आईं तो हमने अपनी समस्या के साथ कुछ सवालों पर चर्चा के लिए कहा। उन्होंने कहा, थोड़ा रुक जाइए, इत्मीनान से बात करते हैं।
कुछ देर में फरियादियों की भीड़ छंट गई। दफ्तर खाली हो गया। अब उनके अर्दली और सुरक्षा में लगे लोग ही थे। इसके बाद वह हम लोगों से मुखातिब हुईं। न सिर्फ हमारी बात सुनी, बल्कि मौके से संबंधित अधिकारी को निर्देश भी दिया। ऑफिस टाइम खत्म होने के बाद करीब एक घंटे तक तमाम सवालों पर इंटरव्यू दिया।
इसके बाद अपने सहयोगी से बोलीं, इन लोगों का नंबर ले लीजिए, कोई जरूरत हो तो बताइएगा। उनकी शालीनता और सरलता अव्वल दर्जे की लगी।
उसी दौरान तत्कालीन कप्तान विक्रांत वीर से भी मुलाकात हुई। उनका व्यवहार भी सहयोग और सादगी भरा लगा।
दिव्या मित्तल ने इस्तीफा तो दे दिया है, अभी उसकी मंजूरी बाकी है। उनकी क्या मजबूरी है, यह तो वही जानें। मगर दिव्या मित्तल जैसे अधिकारी, जो जनता से जुड़ जाते हैं, उनका सेवा से टूट जाना खलता है।
पद और पावर तो बहुतों के पास होता है, लेकिन पद पर रहते हुए सहज सरल संवेदनशील बने रहना हर किसी के बस की बात नहीं।
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