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इंटरव्यू

जाने माने पत्रकार विनोद शर्मा से बातचीत : मेरे में भड़ास नहीं, आह भरी है… मैं एंटी बीजेपी हूँ लेकिन कांग्रेस समर्थक नहीं हूँ, मैं फ्री थिंकर हूँ!

एडवर्सरियल रिश्ता खत्म हुआ, गोदी रिश्ता शुरू हो गया!

पत्रकारिता में patience अच्छी चीज़ है, लेकिन वह cowardice में नहीं बदलनी चाहिए…

जब गलत चीज़ों के सामने पत्रकार चुप हो जाए तो “Silence is acquiescence”

मुझे तरस इस बात पर आता है कि बहुत से युवा पत्रकारों को देखकर लगता है कि इनकी रीढ़ की हड्डी नहीं है!

Two smiling people stand side by side in a sunny room: an older man in a blue patterned shirt on the left and a young woman with long dark hair and glasses on the right, with a window and colorful decor behind them.

वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा की यह बातचीत महज मीडिया पर एक और टिप्पणी नहीं है। यह उस पत्रकारिता की गवाही है जिसने सत्ता के सबसे ताकतवर लोगों से भी सवाल पूछे, नेताओं से दोस्ती की तो बराबरी के रिश्ते पर और जरूरत पड़ी तो उन्हें “अकल देने” से भी पीछे नहीं हटे। पत्रकार और सत्ता के बीच का वह रिश्ता दिखाई देता है, जिसमें न डर था, न दरबारीपन।

विनोद शर्मा उस दौर के पत्रकार हैं, जब एडिटर सिर्फ पद नहीं, एक संस्था हुआ करता था। प्रधानमंत्री कार्यालय का अधिकारी दफ्तर में जाकर ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के संपादक गिरिलाल जैन को ब्रीफ करता था। किसी खबर को रोकने के लिए सत्ता का दबाव आता था तो संपादक कह सकता था- “I can’t ask him to stop this story.” और खबर छपती थी।

आज विनोद शर्मा उसी पत्रकारिता को सामने रखकर सवाल करते हैं- वह एडिटर कहाँ गया? वह संस्थागत रीढ़ कहाँ गई? और वह पत्रकार कहाँ गया, जो सत्ता से सवाल पूछने के बाद भी अपनी बात पर कायम रहता था?

उनका आरोप सीधा है, मीडिया का बिजनेस मॉडल ही ऐसा बना दिया गया है कि पाठक खबर के लिए पैसा नहीं देना चाहता। अखबार लागत से बहुत कम कीमत पर बिकता है और घाटा विज्ञापन से पूरा होता है। विज्ञापनदाता उद्योगपति है और उद्योगपति सत्ता की ओर देखता है। नतीजा- “The media has been tamed.”

लेकिन विनोद शर्मा की नाराज़गी सिर्फ मीडिया मालिकों से नहीं है। उन्हें नई पीढ़ी के पत्रकारों पर तरस आता है, क्योंकि उनके शब्दों में कई पत्रकारों की “रीढ़ की हड्डी नहीं है।” उनके लिए पत्रकारिता का तीसरा नेत्र सिर्फ देखने के लिए नहीं, अन्याय के सामने रौद्र रूप धारण करने के लिए भी है।

वह आज की पत्रकारिता को “ICU में पड़ी हुई” मानते हैं, लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण को लेकर चिंतित हैं और कहते हैं कि कभी सरकार के साथ पत्रकार का रिश्ता adversarial हुआ करता था, दुश्मनी का नहीं, निगरानी का रिश्ता। आज वही रिश्ता “गोदी रिश्ता” हो गया है।

लेकिन बातचीत सिर्फ शिकायत पर खत्म नहीं होती। विनोद शर्मा मानते हैं कि डिजिटल मीडिया और YouTube ने पत्रकारिता के लिए एक नया रास्ता खोला है। और शायद इस पूरे इंटरव्यू की सबसे खूबसूरत बात यही है, एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को अपना अर्जित ज्ञान सौंपना चाहती है। उनके शब्दों में, “मेरे गुरुओं ने अपना इल्म मुझे दिया, अब मैं चाहता हूँ कि मेरे पास जो कुछ है, वह आगे ट्रांसमिट हो।”

यही वजह है कि यह बातचीत सिर्फ एक वरिष्ठ पत्रकार का आत्मकथ्य नहीं, बल्कि भारतीय पत्रकारिता के बदलते चरित्र का एक जीवंत दस्तावेज़ है, उस दौर का भी, जब पत्रकार सत्ता के दरवाज़े पर खड़े होकर सवाल करता था और आज के उस दौर का भी, जब सवाल पूछने से पहले पत्रकार अपनी ‘लाइन ऑफ रिट्रीट’ खोजता है।

भड़ास 4मीडिया के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा से यह विस्तृत बातचीत शिवा कुमारी ने की।

Older man and younger woman sit on a gray sofa in a living room with framed photos on the wall behind them.

सवाल: सबसे पहले आपके बैकग्राउंड के बारे में जानना चाहूंगी। आपका जन्म कहाँ हुआ, आप कहाँ से हैं और पत्रकारिता में आने का सफर कैसे शुरू हुआ?

जवाब: मेरी पैदाइश बीकानेर की है। मेरी माँ अपनी बड़ी बहन के पास गई हुई थीं और मैं वहीं अवतरित हो गया, 21 जनवरी 1955 को। वैसे मैं पंजाबी हूँ। मेरी स्कूलिंग जयपुर में हुई, सेंट जेवियर्स, जयपुर से।

उस दौरान हिंदी के पक्ष में एक आंदोलन भी हुआ था। उसके चलते मैं कुछ समय के लिए हिंदी माध्यम के स्कूल में चला गया था।

लेकिन आप यह कह सकती हैं कि मेरी स्कूलिंग जयपुर में हुई। जब कॉलेज में मेरा एडमिशन हो गया, उसके बाद मेरी माताजी, जो जयपुर में पढ़ाती थीं, उनका देहांत हो गया। उस समय मेरी उम्र करीब 19-20 साल थी। इसके बाद मेरे पिता मुझे आगे की पढ़ाई के लिए पंजाब ले आए।

मेरी बड़ी बहन राजस्थान यूनिवर्सिटी में पढ़ाती थीं। वह लाइब्रेरी साइंस की लेक्चरर थीं। बाद में वह अपने पति के साथ नाइजीरिया चली गईं और फिर नाइजीरिया से कनाडा जाकर वहीं सेटल हो गईं।

सवाल: पत्रकारिता में आने की शुरुआत कैसे हुई?

जवाब: ऐसा है कि मैं मेडिकल प्रोफेशन से डिस्कार्ड हुआ हूँ। मैं प्री-मेडिकल कर रहा था और उसी दौरान स्टूडेंट पॉलिटिक्स में इन्वॉल्व हो गया। हम अमृतसर के डीएवी कॉलेज में पढ़ते थे। मेरे प्री-मेडिकल के लगभग सारे स्कूलमेट्स और क्लासमेट्स को मेडिकल में एडमिशन मिल गया, मुझे छोड़कर।

क्योंकि मैं स्टूडेंट पॉलिटिक्स में इन्वॉल्व हो गया था, इसलिए मैं अपने आपको कहता हूँ कि “I am a discard from the medical profession.”

और फिर पत्रकारिता में आया। पत्रकारिता में आपको jack of all trades होना पड़ता है। पत्रकारिता का रूट वर्ड भी ‘जनरल’ है- यानी जनरली आपको हर चीज़ के बारे में जानना पड़ता है।

सवाल: उस दौर के आपके साथी और मित्र भी क्या आगे चलकर अपने-अपने क्षेत्रों में स्थापित हुए?

जवाब: हाँ। मेरा डीएवी कॉलेज में रूममेट था इंद्रबीर सिंह निज्जर। वह अमृतसर का बहुत प्रमुख रेडियोलॉजिस्ट है। उसका वहाँ रेडियोलॉजी का बहुत बड़ा क्लिनिक था। बाद में उसने उसे लीज पर दे दिया, तो सिर्फ लीज से ही वह हर महीने लाखों रुपये कमाता होगा।

वह आम आदमी पार्टी की सरकार में मंत्री भी बना था। बाद में वहाँ कुछ कंट्रोवर्सी हुई, जो उसे पसंद नहीं आई और उसने मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया।

सवाल: फिर आप दिल्ली कब आए?

जवाब: मैं दिल्ली 1973-74 के आसपास आया, यानी 1974-75 तक दिल्ली आ चुका था। यहाँ आकर मैंने भारतीय विद्या भवन में पत्रकारिता की पढ़ाई की। वहीं से पत्रकारिता का औपचारिक प्रशिक्षण लिया। कुमी कपूर भी हमें वहाँ पढ़ाती थीं, जो बाद में इंडियन एक्सप्रेस से जुड़ीं और जिनका पत्रकारिता पर महत्वपूर्ण काम रहा है।

भारतीय विद्या भवन ने भी बाद में मुझे एक सफल एलुमनाई के तौर पर सम्मानित किया। जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने मुझे इनाम दिया था।

सवाल: आपकी पहली नौकरी बतौर वर्किंग जर्नलिस्ट कहाँ हुई?

जवाब: उस समय हम पत्रकारिता कर ही रहे थे कि इमरजेंसी लग गई। बतौर वर्किंग जर्नलिस्ट मेरा पहला काम ऑल इंडिया रेडियो में हुआ। वहाँ ऑडियंस रिसर्च यूनिट होती थी और मैंने वहाँ रिसर्च एसोसिएट के तौर पर काम शुरू किया।

सवाल: ऑडियंस रिसर्च यूनिट में आपका काम क्या था?

जवाब: वहाँ हम यह पता करते थे कि कौन-से कार्यक्रम कौन लोग सुनते हैं, उनकी डेमोग्राफिक प्रोफाइल क्या है, किस उम्र के लोग उन्हें सुनते हैं और उन कार्यक्रमों के बारे में उनकी क्या राय है। यानी श्रोताओं से संबंधित डेटा कलेक्ट किया जाता था और उसका अध्ययन किया जाता था।

हमने ऑल इंडिया रेडियो के लिए एक बड़ा सर्वे भी किया था, जिसमें लिसनरशिप का मैप तैयार किया गया था। उसके साथ-साथ दूरदर्शन के लिए भी हमने ऑडियंस रिसर्च किया।

सवाल: यह इमरजेंसी का दौर था। उस समय सरकार के प्रचार को लेकर भी आपने काम किया?

जवाब: हाँ। वह इमरजेंसी का जमाना था। उस समय 21 सूत्रीय कार्यक्रम और संजय गांधी का 5 सूत्रीय कार्यक्रम चल रहा था। हमारा काम यह देखना भी था कि इन कार्यक्रमों का कितना प्रचार हो रहा है और लोगों तक इनका संदेश किस तरह पहुँच रहा है।

उस समय सरकार हर जगह घुसकर अपना प्रचार करना चाहती थी। मैं समझता हूँ कि अगर कोई सरकार अपनी लड़ाई हार रही हो तो उसे इस तरह का प्रचार नहीं करना चाहिए। लेकिन उस वक्त यह हो रहा था। और आज के हुक्मरानों ने इंदिरा गांधी की उन गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा है, इसलिए वे भी वही गलतियाँ दोहरा रहे हैं।

सवाल: ऑल इंडिया रेडियो के बाद आप यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ इंडिया यानी यूएनआई में कैसे पहुँचे?

जवाब: 1977 में जनता पार्टी की सरकार सत्ता में आई। उस समय उसका एक बड़ा वादा था कि समाचार एजेंसियों को फिर उनकी पुरानी स्थिति में लाया जाएगा।

इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी सरकार ने चार समाचार एजेंसियों पीटीआई, यूएनआई, हिंदुस्तान समाचार और समाचार भारती को मिलाकर ‘समाचार’ नाम की एक एजेंसी बना दी थी। जनता पार्टी का वादा था कि इस व्यवस्था को खत्म करके समाचार एजेंसियों को फिर से अलग-अलग किया जाएगा।

सवाल: इसके पीछे तर्क क्या था?

जवाब: माना जाता था कि कम से कम दो स्वतंत्र समाचार एजेंसियाँ होनी चाहिए, ताकि वे एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करें। प्रेस की स्वतंत्रता के लिहाज से भी यह बेहतर व्यवस्था थी।

उस समय पीटीआई और यूएनआई जैसी समाचार एजेंसियाँ अखबारों के मालिक चलाते थे। उनके बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में भी अखबार मालिकों का प्रतिनिधित्व होता था। इसलिए जब यूएनआई को फिर से स्वतंत्र रूप देने की प्रक्रिया शुरू हुई और वहाँ वैकेंसी निकलीं, तो मैंने भी आवेदन कर दिया।

मेरा चयन हो गया और इस तरह मैं यूएनआई में आ गया।

सवाल: यूएनआई में आपकी नियुक्ति के समय इंटरव्यू बोर्ड में कौन लोग थे?

जवाब: मेरा इंटरव्यू लेने वालों में मिस्टर के.पी. कुट्टी भी थे। बाद में पता चला कि उनके पिता भी पत्रकारिता और यूएनआई से जुड़े महत्वपूर्ण लोगों में थे। वहाँ मिस्टर के.के. दुग्गल भी थे। वह बहुत अच्छे राइटर और इम्प्रेशनिस्ट राइटर थे। मिस्टर यू.आर. कलकूर भी थे, जिनके बेटे अशोक कलकूर बाद में ‘द हिंदू’ में काम करते रहे।

इस तरह मुझे यूएनआई में नौकरी मिल गई।

सवाल: उस समय यूएनआई में के.पी. कुट्टी और के.के. दुग्गल की क्या भूमिका थी?

जवाब: उस समय कुट्टी साहब चीफ न्यूज एडिटर थे। दुग्गल साहब एक केबिन में बैठते थे। वह फीचर राइटर थे और कई दूसरे काम भी करते थे। यानी वह एक सीनियर व्यक्ति थे और अक्सर ट्रैवल भी करते थे। मुझे याद है कि उनका एक… [यह प्रसंग आगे की बातचीत में जारी है।]

Older man wearing a turquoise patterned shirt sits on a sofa, looking down, wearing glasses and a smartwatch.

सवाल: आपने जिस दौर में पत्रकारिता शुरू की, उस समय आपके वरिष्ठ पत्रकारों की भूमिका आपके लिए कितनी महत्वपूर्ण रही?

जवाब: कुट्टी साहब, कलकूर साहब और दुग्गल साहब उस जमाने के वेटरन्स थे। वे अपना इल्म अपने जूनियर्स को ट्रांसफर करते थे। मेरे लिए वे बेस्ट गाइड्स और सीनियर्स में से थे।

सबसे बड़ी बदकिस्मती किसी भी युवा पत्रकार के लिए, या किसी भी प्रोफेशन में, यह होती है कि उसे सेकंड-रेट बॉस मिल जाए। क्योंकि सेकंड-रेट बॉस आमतौर पर थर्ड-रेट टैलेंट को ही प्रमोट करेगा। हमारे साथ यह हादसा नहीं हुआ। हमें ऐसे लोग मिले जो अपने प्रोफेशन में बहुत अच्छे थे और जिन्होंने हमें गाइड किया।

कुट्टी साहब तो मास्टर ऑफ न्यूज थे। न्यूज का सीक्रेट जैसे उनके मुँह में लटका रहता था। वह टाइपराइटर पर या हाथ से हमारी कॉपी एडिट करते थे। बहुत फाइन प्रोफेशनल थे। हम जो लिखकर देते थे, वह उसकी झाड़-पोंछ करके उसे बहुत सुंदर बना देते थे।

दुग्गल साहब के बारे में मैंने आपको बताया ही है। इसी तरह कलकूर साहब भी बहुत अच्छे पत्रकार थे।

सवाल: उस समय रिपोर्टिंग करना आज की तुलना में कितना मुश्किल था?

जवाब: बहुत मुश्किल था। एक बार मुरादाबाद में दंगे हो रहे थे। हम दोनों सुबह दिल्ली से मुरादाबाद के लिए निकलते थे और दिनभर वहाँ रहकर रिपोर्टिंग करते थे। फिर या तो वहीं से रात में फोन पर खबर लिखवाते थे या दिल्ली लौटकर अपनी रिपोर्ट फाइल करते थे।

वह ट्विटर या मोबाइल फोन का जमाना नहीं था। आज तो आप एक मोबाइल से मौके से ही खबर भेज सकते हैं। उस समय कभी-कभी ट्रंक कॉल तक नहीं मिलता था। और जब वहाँ से खबर भेजनी होती थी, तो कई बार टेलीग्राम के जरिए खबर भेजते थे।

सवाल: टेलीप्रिंटर उस समय आ चुका था?

जवाब: टेलीप्रिंटर बाद में आया। हमने वह दौर भी देखा। वह पूरा एक ट्रांसफॉर्मेटिव पीरियड था। जब मैं बाद में पाकिस्तान में पोस्टेड था, तब हम अपनी स्टोरी टेलीप्रिंटर पर ही सीधे लिखते थे। वह टेप पंच होकर आता था और फिर उसे चला दिया जाता था।

आज की पत्रकारिता और उस समय की पत्रकारिता में तकनीक के स्तर पर जमीन-आसमान का फर्क है, लेकिन उस दौर में रिपोर्टिंग की अपनी एक अलग मशक्कत थी।

सवाल: यूएनआई में आपने कितने समय तक काम किया?

जवाब: मैं 1982 तक, यानी एशियन गेम्स के समय तक, यूएनआई में रहा। उसके बाद मैंने ‘द वीक’ ज्वाइन कर लिया।

सवाल: ‘द वीक’ में जाना कैसे हुआ?

जवाब: ‘द वीक’ मलयाला मनोरमा ग्रुप का प्रकाशन है। आप मलयाला मनोरमा को जानती ही हैं। यह केरल का बहुत बड़ा और प्रतिष्ठित ग्रुप ऑफ न्यूजपेपर्स है। ‘द वीक’ उनका पहला इंग्लिश पब्लिकेशन था।

मैं वहाँ अपॉइंट होने वाला पहला नॉन-मलयाली पत्रकार था। वहाँ मैंने 1988-89 तक काम किया। इसके बाद मैं हिंदुस्तान टाइम्स में आ गया।

सवाल: आपने कलकूर साहब के साथ रिपोर्टिंग के दौरान का कोई ऐसा अनुभव बताया था, जिसने आपको उनकी लेखनी को समझने में मदद की। उसके बारे में बताइए।

जवाब: एक दिन कलकूर साहब ने कहा कि मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगा। हम दोनों कार से मुरादाबाद जा रहे थे। रास्ते में एक मिडवे पॉइंट आया, शायद गजरौला था। वहाँ रुककर हम कुछ नाश्ता-वाश्ता करने लगे।

मैं पराठा-वाठा खा रहा था। मैं उस समय बहुत यंग था। कलकूर साहब बहुत डेलिकेट और शांत स्वभाव के व्यक्ति थे। उन्होंने दूध का एक गिलास पिया। वह कन्नड़ से अंग्रेजी में साहित्यिक रचनाओं का अनुवाद भी करते थे और बहुत सुंदर लिखते थे। वह एक बहुत अच्छी तरह से स्वीकार की गई साहित्यिक शख्सियत थे।

नाश्ते के बाद वह थोड़ा आगे टहलने चले गए। मैंने देखा कि करीब 50 कदम दूर जाकर वह जमीन की तरफ लगातार देख रहे हैं। उनकी नजर एक ही जगह पर टिकी हुई थी। मैंने अपना नाश्ता खत्म किया और उनके पास चला गया। पीछे से जाकर देखा तो ऊपर किसी चिड़िया के घोंसले से एक अंडा गिर गया था और उसमें से चिड़िया का बच्चा निकलने के लिए संघर्ष कर रहा था।

कलकूर साहब उस पूरे प्रोसेस को बहुत तन्मयता से और बहुत बारीकी से देख रहे थे। उन्होंने भी नोटिस किया कि मैं वहाँ आ गया हूँ। फिर हम वापस गाड़ी में बैठ गए।

थोड़ा आगे जाने के बाद मैंने उनसे कहा- “Now I know where you get your impressionistic writing from.” यानी अब मुझे समझ में आया कि आपकी इम्प्रेशनिस्टिक राइटिंग कहाँ से आती है।

वह उस चीज़ को इतनी बारीकी से देख रहे थे, उस पल में पूरी तरह डूब गए थे। ऐसे लोग कभी-कभी थोड़ा absent-minded भी होते हैं, क्योंकि वे अपने विचारों में खो जाते हैं। तो मैंने उनसे मजाक में कहा कि शायद इसी तरह की चीजों को इतनी बारीकी से देखने से आपकी वह इम्प्रेशनिस्टिक राइटिंग आती है।

सवाल: उनकी लेखनी का कोई ऐसा उदाहरण है, जो आपको आज भी याद है?

जवाब: हाँ। उससे पहले उन्होंने ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ पर एक स्टोरी री-राइट की थी। ये पक्षी उस समय राजस्थान में पाए जाते थे।

वह स्टोरी जयपुर से आई थी और कलकूर साहब ने उसे री-राइट किया था। वह कई अखबारों में बहुत सुंदर तरीके से छपी, खासकर ‘द स्टेट्समैन’ में।

उस जमाने में हम मानते थे कि ‘द स्टेट्समैन’ सबसे अच्छी तरह लिखा जाने वाला अंग्रेजी अखबार था। उसकी भाषा बहुत सुंदर होती थी। कलकूर साहब की लेखनी के दम पर वह स्टोरी ‘द स्टेट्समैन’ के पेज वन पर फोटो के साथ छपी थी।

हम एजेंसी वाले पत्रकारों के लिए किसी खबर का ‘द स्टेट्समैन’ में छपना बहुत बड़ी बात होती थी। अगर हमारी कोई खबर वहाँ छप जाती थी तो लगता था कि “They have arrived.”

उस जमाने में यही हमारे लिए एक तरह की पहचान थी। हम वायर सर्विस के लोग थे और ‘द स्टेट्समैन’ हमारे सब्सक्राइबर्स में से एक था। इसलिए वहाँ आपकी खबर का प्रमुखता से छपना यह बताता था कि एक वायर सर्विस पत्रकार के रूप में आपके काम में इतनी वैल्यू है कि आपका सब्सक्राइबर उसे प्रमुखता देता है।

सवाल: उस समय बाइलाइन का चलन था?

जवाब: नहीं, उस समय बाइलाइन का चलन नहीं था। हम एजेंसी में काम करते थे और खबरें एजेंसी के नाम से जाती थीं। बाइलाइन की परंपरा बाद में आई।

मुझे याद है कि मेरी पहली बाइलाइन मुझे राजस्थान से की गई एक थ्री-पार्ट सीरीज पर मिली थी।

सवाल: वह किस घटना पर आधारित थी?

जवाब: वह एक राजपूत महिला की कहानी थी, जिसे एक मुस्लिम तांगेवाले ने गोद लेकर पाला था। उस महिला के साथ पुलिस स्टेशन में बलात्कार हुआ था। मामला इसलिए भी बहुत संवेदनशील था क्योंकि राजपूत समाज के कुछ लोग इस बात को स्वीकार कर चुके थे कि वह महिला एक मुस्लिम परिवार द्वारा पाली जा रही थी।

मैंने उस पर तीन हिस्सों में एक सीरीज की थी। उस समय जगन्नाथ पहाड़िया की सरकार थी और इस रिपोर्टिंग से सरकार भी हिल गई थी। उसी सीरीज के लिए मुझे पहली बार बाइलाइन मिली थी। मेरे लिए वह पत्रकारिता के सफर में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था।

सवाल: आपने मुरादाबाद की रिपोर्टिंग का जिक्र किया। उस रिपोर्टिंग से जुड़ा कोई अनुभव जो आज भी आपको याद है?

जवाब: हाँ। कलकूर साहब के साथ हम मुरादाबाद गए थे। रात वहीं रुके। रात में हमें लगातार गोलियों की आवाजें और लोगों के चिल्लाने की आवाजें सुनाई दे रही थीं। मुरादाबाद में दंगे हुए थे। यह 70 के दशक के आखिर की बात है, मेरा ख्याल है।

अगले दिन हम वापस लौटे। बाद में कुट्टी साहब ने इस पूरे अनुभव पर एक पीस लिखा। उसमें उन्होंने रात में सुनाई दे रही उन आवाजों की जो इमेजरी बनाई, वह आज भी मुझे याद है। उन्होंने लिखा था कि आधी रात में नींद लेना मुश्किल था, क्योंकि ऐसा लगता था जैसे हिंसा के कदम करीब आते जा रहे हों—“Approaching footsteps of violence.”

अब ‘हिंसा की चहलकदमी’ जैसी इमेजरी लिखने के लिए आपको चीजों को उस तरह महसूस करने और देखने की क्षमता चाहिए। आपको उस दृश्य को अपने दिमाग में conjure करना पड़ता है। हम भाग्यशाली थे कि हमें ऐसे लोगों के साथ काम करने और उनसे सीखने का मौका मिला।

सवाल: यूएनआई में रहते हुए पीटीआई से आपकी प्रतिस्पर्धा भी रहती थी?

जवाब: हाँ, यूएनआई और पीटीआई के बीच बड़ा कंपटीशन होता था। यूएनआई की इज्जत इसलिए भी थी कि उसके संसाधन सीमित थे, लेकिन उन्हीं सीमित संसाधनों के भीतर वह पीटीआई से मजबूती से मुकाबला करती थी।

हम लोगों के बीच भी खबरों को लेकर एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा रहती थी। पीटीआई के एक कॉरेस्पॉन्डेंट ललित जोशी मेरे कंटेंपररी थे और उनसे मेरा बड़ा कंपटीशन चलता था। वह कई साल पहले गुजर चुके हैं।

सवाल: इस प्रतिस्पर्धा का कोई ऐसा किस्सा जो आपको आज भी याद हो?

जवाब: एक बार एक प्लेन हाईजैक हो गया था और बाद में वह लाहौर में रिलीज होकर लैंड हुआ। उस समय खबर भेजना आज जितना आसान नहीं था। फोन मिलना ही अपने आप में एक मशक्कत होती थी।

प्लेन के लैंड करते ही हम खबर भेजने के लिए भागे। वहाँ ड्यूटी रूम में फोन था। मैंने फोन पकड़ा ही था कि पीटीआई के मेरे कंटेंपररी ललित जोशी ने मेरे हाथ से फोन खींच लिया और अपनी खबर भेज दी।

उस समय वायर सर्विसेज में खबर भेजने के लिए ‘फ्लैश’ भेजा जाता था। कुछ लोग उसे बुलेटिन भी कहते थे, लेकिन हम लोग उसे फ्लैश कहते थे।

सवाल: फ्लैश का मतलब ब्रेकिंग न्यूज ही होता था?

जवाब: हाँ। फ्लैश का मतलब था सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण खबर भेजना। आज जिसे हम ब्रेकिंग न्यूज कहते हैं, उस समय वायर सर्विस में फ्लैश उसका शुरुआती रूप था। उसमें एक-एक मिनट की कीमत होती थी।

ललित जोशी ने उस मौके पर मुझसे पहले फोन पकड़ लिया और उनका फ्लैश पहले चला गया। हमारा फ्लैश देर से गया। एजेंसी पत्रकारिता में यही प्रतिस्पर्धा थी, कई बार खबर के लिए एक-एक मिनट की लड़ाई होती थी।

सवाल: इस हाईजैक की कहानी में बाद में कोई और महत्वपूर्ण पहलू भी सामने आया था?

जवाब: हाँ। बाद में मुझे पता चला कि उस समय पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल जियाउल हक ने भारत को एक बेहद गोपनीय मदद दी थी। भारतीय कमांडो को पाकिस्तानी जमीन पर जाकर हाईजैकर्स को काबू करने की अनुमति दी गई थी।

यह बात मुझे कई साल बाद प्रणव मुखर्जी ने बताई थी। उनका आशय यही था कि डिप्लोमेसी में बहुत-सी चीजें ऐसी होती हैं, जिन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा सकता और उन्हें चुप रखना पड़ता है।

अगर उस समय यह बात सामने आ जाती कि जियाउल हक ने भारतीय कमांडो को अपनी जमीन पर ऑपरेशन करने की अनुमति दी थी, तो पाकिस्तान के लिए भी यह एक बड़ा समझौता या राजनीतिक असहजता का विषय बन सकता था।

तो इस पूरी कहानी के कई दूसरे पहलू भी हैं, जो बाद में सामने आए। पत्रकारिता में हम अक्सर किसी घटना का सिर्फ एक हिस्सा देखते हैं, लेकिन उसके पीछे कूटनीति और राजनीतिक स्तर पर बहुत कुछ चल रहा होता है।

सवाल: हाईजैक किए गए विमान की खबर को लेकर यूएनआई और पीटीआई के बीच किस तरह की प्रतिस्पर्धा हुई थी?

जवाब: जब प्लेन लैंड कर गया और यात्री बाहर निकले, तो हमने उनसे बात की और फिर वापस टेलीफोन बूथ की तरफ भागे। मैं उस वक्त प्लेन को कवर कर रहा था। इस बार मैं पहले बूथ में घुस गया। वहाँ सिर्फ एक फोन चल रहा था, बाकी दो काम नहीं कर रहे थे।

हमने यात्रियों से जो जानकारी मिली थी, वह पूरी अपने ऑफिस को बतानी शुरू की, कौन यात्री है, क्या हुआ, कहाँ से आए हैं, पूरी कहानी क्या है। ऑफिस में कुट्टी साहब और दूसरे सीनियर लोग उन जानकारियों के आधार पर स्टोरी तैयार कर रहे थे और उसे आगे भेज रहे थे।

जब मैंने पूरी कहानी फोन पर सुना दी, तब ललित जोशी, जिन्होंने पहले मेरा फोन खींच लिया था, बाहर खड़े होकर कह रहे थे—“जल्दी कर, जल्दी कर।” मैंने फोन नीचे खींच लिया और कहा—“कर ले।”

यह उस समय की प्रतिस्पर्धा का एक अलग ही स्तर था।

सवाल: क्या खबर को पहले भेजने के लिए पत्रकार उस दौर में ऐसी तरकीबें भी अपनाते थे?

जवाब: हाँ। हम किसी सोर्स को फोन करते थे और अगर हमें पता होता था कि पीटीआई ने अभी उससे बात नहीं की है, तो हम फोन काटते नहीं थे। अगर आपने दूसरे नंबर पर कॉल किया और उसे कट नहीं किया, तो लाइन होल्ड पर रहती थी।

हम कभी-कभी दस मिनट तक लाइन होल्ड पर रखते थे और उतनी देर में अपनी खबर लिख लेते थे। ये उस दौर की कुछ लेजिट ट्रिक्स थीं—ट्रेड के हिस्से की चीजें थीं। आज की तरह न मोबाइल था, न इंटरनेट और न ही तुरंत खबर भेजने की सुविधा।

सवाल: यूएनआई के बाद आपका अगला पड़ाव ‘द वीक’ रहा?

जवाब: हाँ। यूएनआई छोड़कर मैं ‘द वीक’ में चला गया। ‘द वीक’ उस समय मलयाला मनोरमा द्वारा लॉन्च की गई नई मैगज़ीन थी। एशियन गेम्स 1982 के आसपास यह शुरू हुई थी। मैं 1982 से 1988 तक ‘द वीक’ में रहा और उसके बाद हिंदुस्तान टाइम्स में चला गया।

सवाल: ‘द वीक’ में आपका अनुभव कैसा रहा?

जवाब: हम खुशकिस्मत थे कि वहाँ हमारे एडिटर मिस्टर टी.वी.आर. शेनॉय थे। वह दक्षिणपंथी विचारधारा के व्यक्ति थे, लेकिन उन्होंने अपनी विचारधारा कभी हम पर नहीं थोपी।

और सच कहूँ तो उस दौर का वह दक्षिणपंथ आज के दक्षिणपंथ से कहीं ज्यादा उदार और बेहतर था। वह कहते थे—“ये खबर लिखो।” और साथ में एक किताब देते थे—“ये किताब भी पढ़ लेना।”

यानी वह सिर्फ खबर लिखने को नहीं कहते थे, बल्कि पढ़ने के लिए भी प्रेरित करते थे।

सवाल: अपने जूनियर पत्रकारों के साथ उनका व्यवहार कैसा था?

जवाब: हर दूसरे शनिवार वह हमें लंच के लिए बाहर ले जाते थे। उस समय चाणक्यपुरी में एंबेसडर होटल का एक बहुत अच्छा रेस्टोरेंट हुआ करता था। वह एक हाई-एंड जगह थी।

हम कभी कहते थे- “आप खर्च कर रहे हैं, एक दिन हम भी खर्च करेंगे।”

वह कहते थे- “No, no, don’t worry. This is my news-gathering allowance, and you are my best news sources.”

वह कहते थे- “मेरे तुमसे बढ़िया न्यूज सोर्स कौन है? You people are collecting news and telling me what’s happening.”

यह उनकी सोच थी। वह समझते थे कि उनके पत्रकार ही उनके सबसे अच्छे न्यूज सोर्स हैं।

सवाल: शेनॉय खुद भी अच्छे लेखक थे?

जवाब: बहुत अच्छे। वह बहुत learned man थे और बहुत quick writer थे। उस समय पीआईबी से जो प्रेस नोट आते थे, उनके पीछे जो खाली कागज होता था, उस पर वह लिखते थे। उस समय कागज को बचाकर इस्तेमाल करने की आदत भी थी।

वह बहुत अच्छे राइटर थे।

इसी तरह हिंदुस्तान टाइम्स में वीर सांघवी थे। वह भी बहुत quick और बहुत अच्छे राइटर थे। कुछ मायनों में तो शेनॉय साहब से भी बेहतर।

वीर सांघवी की भाषा में एक खास बात थी। वह बहुत ज्यादा scholarly English नहीं लिखते थे। उनकी भाषा बातचीत की तरह होती थी- conversational English। जो लिखते थे, वह ऐसा लगता था जैसे बोल रहे हों। यह प्रतिभा बहुत कम लोगों के पास होती है।

सवाल: ऐसे वरिष्ठों के साथ काम करने से आपके अपने लेखन पर भी असर पड़ा?

जवाब: बिल्कुल। हमने इन सब लोगों के साथ काम किया और उसके चलते हमारे जो rough edges थे, वे refine हुए। हमारे formative years में हमें सही guidance मिली।

दुर्भाग्य से आज वह चीज बहुत कम दिखाई देती है।

मेरे हिसाब से पत्रकारिता में यह एक relay race की तरह होता है। एक धावक अपना स्ट्रेच दौड़ता है और फिर बैटन अगले धावक को पकड़ा देता है। हमारे समय में सीनियर पत्रकार अपना अनुभव और इल्म जूनियर्स को देते थे। आज वह बैटन पकड़ाने वाला सीनियर ही बहुत कम दिखाई देता है।

सवाल: इसके बाद आप पाकिस्तान गए। उस समय का पाकिस्तान कैसा था और वहाँ काम करने का आपका अनुभव कैसा रहा?

जवाब: पाकिस्तान में मैं 1991 से 1994 तक रहा। उस समय का पाकिस्तान आज के पाकिस्तान से काफी अलग था। वह बहुत पहले की बात है, लेकिन मेरे पत्रकारिता के सफर में पाकिस्तान में बिताया गया वह दौर बहुत महत्वपूर्ण रहा।

सवाल: जब आप 1991 में पाकिस्तान गए, उस समय भारत-पाकिस्तान के रिश्ते और वहाँ का राजनीतिक माहौल कैसा था?

जवाब: भारत और पाकिस्तान के रिश्ते उस समय बहुत टेंस्ड थे। कश्मीर में उफान था और पाकिस्तान में भी कोई खास स्टेबिलिटी नहीं थी। मैं 1991 से 1994 तक वहाँ रहा। जब मैं गया, उस समय नवाज शरीफ की सरकार थी।

फिर नवाज शरीफ का तत्कालीन राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान से झगड़ा हो गया। पाकिस्तान में उस समय प्रेसिडेंसी एक तरह से पैरेलल सेंटर ऑफ पावर बन जाती थी। राष्ट्रपति सिविल-मिलिट्री एस्टैब्लिशमेंट का प्रतिनिधि होता था और उसका एक काम जम्हूरियत को चेक में रखना भी माना जाता था।

सवाल: यानी राष्ट्रपति सिर्फ संवैधानिक पद नहीं था?

जवाब: नहीं। वहाँ राष्ट्रपति की भूमिका काफी प्रभावशाली थी। गुलाम इशाक खान खुद पूर्व सिविल सर्वेंट थे और बाद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने। उन्हें सिविल-मिलिट्री एस्टैब्लिशमेंट, खासकर मिलिट्री एस्टैब्लिशमेंट का समर्थन हासिल था। वह सिविल प्रशासन पर नजर रखने वाले एक महत्वपूर्ण शक्ति-केंद्र के रूप में देखे जाते थे।

नवाज शरीफ भी शुरू में उसी मिलिट्री एस्टैब्लिशमेंट की देन थे। लेकिन जब उन्हें जम्हूरियत का चस्का लगा और उनकी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बेनजीर भुट्टो से होने लगी, तो उन्होंने बेनजीर की राजनीतिक शैली का कुछ हिस्सा अपनाया और राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान से टकराव मोल ले लिया।

उन्होंने साफ तौर पर कहा कि प्रधानमंत्री के रूप में वह राष्ट्रपति से डिक्टेशन नहीं लेंगे। उन्होंने राष्ट्र के नाम संबोधन में भी यही बात कही कि वह राष्ट्रपति से डिक्टेशन नहीं लेंगे।

सवाल: इसके बाद क्या हुआ?

जवाब: गुलाम इशाक खान ने नवाज शरीफ की सरकार को बर्खास्त कर दिया। उसके बाद बलख शेर मजारी की सरकार बनी।

नवाज शरीफ इस फैसले को लेकर कोर्ट चले गए और उस पूरे मामले की मैंने वहाँ रहते हुए रिपोर्टिंग की। केस था—State of Pakistan versus Nawaz Sharif and Others.

सवाल: उस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में हुई थी?

जवाब: हाँ। उस समय पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस नसीम हसन शाह थे और वह उस बेंच का हिस्सा थे, जिसने नवाज शरीफ के मामले की सुनवाई की थी।

पूछा- “आयतें पढ़ रहे हो, विनोद?”

मैंने कहा, “जी नहीं, आयतें नहीं पढ़ रहा हूँ। मैं तो यह गिन रहा हूँ कि सुनवाई को कितने दिन हो गए हैं।”

मैंने उस पूरी कार्यवाही को कवर किया। एक बात जो मुझे विशेष रूप से याद है, वह यह कि उस सुनवाई में भारतीय अदालतों के फैसलों का भी हवाला दिया जा रहा था। हमारे सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट्स वहाँ पढ़े और उद्धृत किए जा रहे थे।

यह उस समय भारतीय न्यायपालिका के रुतबे को दिखाता था कि पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण कार्यवाही में भारतीय सुप्रीम कोर्ट के फैसले संदर्भ के तौर पर रखे जा रहे थे।

सवाल: आखिरकार नवाज शरीफ को कोर्ट से राहत मिली?

जवाब: हाँ। कोर्ट ने नवाज शरीफ को बहाल कर दिया। बलख शेर मजारी की जो अंतरिम सरकार उनके हटाए जाने के बाद बनी थी, उसकी प्रधानमंत्री के रूप में स्थिति को कोर्ट ने “non-est” माना।

‘Non-est’ एक न्यायिक अभिव्यक्ति है, जिसका अर्थ है- अस्तित्वहीन, यानी जिसका कानूनी अस्तित्व ही नहीं है। अदालत का कहना था कि अगर किसी कार्रवाई का आधार असंवैधानिक था, तो उसके आधार पर बनी स्थिति को कानूनी अस्तित्व नहीं माना जा सकता।

इस तरह इतिहास में बलख शेर मजारी के उस कार्यकाल को ही अदालत ने प्रभावी रूप से अस्तित्वहीन कर दिया।

सवाल: उस दौरान बलख शेर मजारी से भी आपकी मुलाकात हुई थी?

जवाब: हाँ। उस समय मैं, पीटीआई और टाइम्स ऑफ इंडिया के कुछ पत्रकार वहाँ थे। वह हमसे विशेष रूप से मिले थे। उन्होंने हमसे कहा था कि वह प्रधानमंत्री बने हैं, लेकिन भारत की तरफ से उन्हें कांग्रेस या भारत सरकार की ओर से कोई संदेश तक नहीं मिला।

यह अपने आप में बहुत दिलचस्प था। एक व्यक्ति जो पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बना था, वह भारत से अपनी मान्यता या कम से कम एक औपचारिक संदेश की अपेक्षा कर रहा था। इससे उस समय भारत की लोकतांत्रिक हैसियत और उसकी राजनीतिक अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है।

बाद में नवाज शरीफ बहाल होकर फिर प्रधानमंत्री बन गए। उनकी बहाली के बाद उन्होंने अपने घर पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की। हम भी वहाँ मौजूद थे। वह अपने काम और सरकार के बारे में बातें कर रहे थे। उसी दौरान मैंने उनसे एक सवाल किया…

सवाल: नवाज शरीफ की बहाली के बाद आपकी उनसे हुई बातचीत में आपने उनसे क्या पूछा था?

जवाब: नवाज शरीफ और राष्ट्रपति दोनों बार-बार कहते थे कि वे “मुल्क के मुफाद” यानी देश के हित में काम करना चाहते हैं।

मैंने नवाज शरीफ से कहा- “आप दोनों मिलकर देश के हित में काम क्यों नहीं करते? दिक्कत क्या है?”

उन्होंने कहा कि कुछ राजनीतिक मसले होते हैं। मैंने कहा—“क्या राजनीतिक मसले होते हैं, मियां साहब? आप अपनी कार उठाइए, राष्ट्रपति भवन जाइए और राष्ट्रपति साहब से कहिए कि Let bygones be bygones. Let’s work together for the country.”

वह इसका जवाब देने ही वाले थे कि उस समय उनके सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहे मुशाहिद हुसैन ने उन्हें रोक दिया। शायद उन्हें लगा कि वह इस सवाल का जो जवाब देने जा रहे हैं, वह राजनीतिक रूप से उनके लिए ठीक नहीं होगा।

सवाल: उसके बाद क्या हुआ?

जवाब: प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होने के बाद नवाज शरीफ बाहर निकल रहे थे। वहाँ एक परंपरा थी कि जब प्रेस जा रही होती थी तो पत्रकार मेजबान को विदा करते थे।

मैं उनके बगल से निकलकर थोड़ा आगे गया तो उन्होंने आवाज लगाई- “ए इंडियन!”

मैं मुड़ा। उन्होंने कहा, “तुम्हारी बात में दम था।”

मुझे लगा कि वह समझ रहे थे कि मैंने जो सवाल पूछा था, वह सीधा था, लेकिन उसके पीछे एक राजनीतिक सवाल भी था।

नवाज शरीफ उस समय अपनी राजनीतिक पहचान को एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे, जो सैन्य प्रतिष्ठान से अलग अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जगह बना सके। इसमें कुछ हद तक बेनजीर भुट्टो जैसी राजनीति की छाप भी दिखाई देती थी।

सवाल: लेकिन उनका राष्ट्रपति और सेना से टकराव आगे भी चलता रहा?

जवाब: हाँ। उनके और राष्ट्रपति के बीच टकराव चलता रहा। पाकिस्तान में उस समय राजनीतिक अस्थिरता बहुत ज्यादा थी।

बाद में नवाज शरीफ फिर सत्ता से बाहर हुए।

उस समय जनरल अब्दुल वहीद काकर सेना प्रमुख थे। उन्होंने राजनीतिक नेतृत्व पर दबाव डाला कि चुनाव कराए जाएँ। इसके बाद अंतरिम सरकार बनी और मोईनुद्दीन अहमद कुरैशी, जो वर्ल्ड बैंक से आए थे, अंतरिम प्रधानमंत्री बने। फिर दोबारा चुनाव हुए।

उस चुनाव में नवाज शरीफ हार गए और बेनजीर भुट्टो सत्ता में वापस आ गईं।

सवाल: यानी आपके पाकिस्तान में रहने के दौरान वहाँ लगातार सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक अस्थिरता चलती रही?

जवाब: बिल्कुल। मेरे 1991 से 1994 के पाकिस्तान प्रवास में मैंने वहाँ बहुत ज्यादा उथल-पुथल देखी। सरकारें बनती थीं, गिरती थीं, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच टकराव होता था और सेना की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण बनी रहती थी।

उस समय कश्मीर का मुद्दा भी बहुत गर्म था। कश्मीर में उफान था और पाकिस्तान में भी कश्मीर को लेकर भावनाएँ बहुत तीखी थीं। वहाँ एक मजबूत प्रो-पाकिस्तान सेंटीमेंट था और यह धारणा भी थी कि भारतीय राज्य कश्मीरियों को दबा रहा है।

आज परिस्थितियाँ काफी बदल चुकी हैं, लेकिन वह बिल्कुल अलग दौर था। उस समय पाकिस्तान के भीतर भी कश्मीर को लेकर राजनीतिक और सामाजिक माहौल बहुत ज्यादा सक्रिय था।

सवाल: बेनजीर भुट्टो के दूसरे कार्यकाल में भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर क्या कोई महत्वपूर्ण पहल हुई?

जवाब: हाँ। बेनजीर भुट्टो के दौर में भारत और पाकिस्तान के बीच विदेश सचिव स्तर की बातचीत का एक महत्वपूर्ण दौर हुआ। उस समय भारत की तरफ से जे.एन. दीक्षित विदेश सचिव थे।

मेरे पाकिस्तान में रहने के दौरान यह पूरा घटनाक्रम मेरे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि एक पत्रकार के तौर पर मैं सिर्फ पाकिस्तान की घरेलू राजनीति नहीं, बल्कि भारत-पाकिस्तान संबंधों और कश्मीर के सवाल को भी बहुत करीब से देख रहा था।

वह एक ऐसा दौर था, जब पाकिस्तान की घरेलू राजनीति, सेना की भूमिका, कश्मीर और भारत के साथ रिश्ते—ये सब एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए थे।

सवाल: आपने भारत-पाकिस्तान के बीच विदेश सचिव स्तर की बातचीत को भी कवर किया। उस दौरान बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना भी हुई। पाकिस्तान में रहते हुए आपने उस दौर को कैसे देखा?

जवाब: हाँ, मैंने भारत और पाकिस्तान के बीच हुई विदेश सचिव स्तर की दो-दो दौर की बातचीत को कवर किया था। लेकिन तब तक बाबरी मस्जिद गिर चुकी थी। मैं उस समय पाकिस्तान में ही था, जब बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ।

मैं हिंदू हूँ और उस घटना के बाद पाकिस्तान में रहते हुए मैंने पहली बार एक बहुत गहरा sense of insecurity महसूस किया। इस्लामाबाद में मेरे पास हिंदुस्तान टाइम्स की तरफ से एक बहुत बड़ा बंगला था, लेकिन मैं उसमें अकेले एक कमरे में रहता था। ऊपर के बाकी कमरे खाली रहते थे। सर्वेंट क्वार्टर्स में मेरा खानसामा मकबूल, उसकी पत्नी कौसर और उसका बेटा शाकिब रहते थे। मेरे घर में मैं अकेला हिंदुस्तानी था।

सवाल: उस माहौल में आपको किस तरह की चिंता महसूस होती थी?

जवाब: बाबरी मस्जिद की घटना के बाद स्वाभाविक रूप से एक असुरक्षा का भाव पैदा हुआ था।

सवाल: हाई कमीशन पहुँचने पर कोई ऐसी मुलाकात हुई, जो आपको आज भी याद है?

जवाब: हाँ। हाई कमीशन के गेट पर लियाकत बलोच खड़े थे। वह जमात-ए-इस्लामी के पार्लियामेंट्री पार्टी लीडर थे। वह मुझे जानते थे और हमारी बातचीत भी होती थी।

उन्होंने मुझे देखते ही कहा—“क्या करवा दिया शर्मा?”

मैंने उनसे कहा—“बलोच साहब, जो हुआ है उसका मेरे पास कोई intellectual या moral defence नहीं है। लेकिन एक बात मैं आपको बताना चाहता हूँ—यह हिंदू-मुसलमान का झगड़ा नहीं है। यह secular और non-secular India की लड़ाई है।”

वह इस बात से सहमत नहीं थे। मैंने उनसे कहा—“बकवास तो मैं नहीं कर रहा हूँ। आप मेरे मुल्क की तरफ देखिए। मेरे मुल्क की खूबसूरती यह है कि वहाँ अल्पसंख्यकों का trust उन नेताओं के पास भी है, जो हिंदू हैं।”

सवाल: आपने इसके उदाहरण भी दिए थे?

जवाब: हाँ। मैंने उस समय जो नाम मेरे दिमाग में आए, वे बताए—चंद्रशेखर, मुलायम सिंह यादव और दूसरे ऐसे नेता, जो हिंदू होते हुए भी अल्पसंख्यकों के बीच भरोसे की राजनीतिक जगह रखते थे।

मेरा कहना यह था कि भारत की खूबसूरती उसकी विविधता और उस भरोसे में है, जहाँ किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान ही यह तय नहीं करती कि वह अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधि या उनका भरोसेमंद नेता हो सकता है या नहीं।

सवाल: उसके बाद क्या हुआ?

जवाब: हम अंदर चले गए। थोड़ी देर बाद हाई कमीशन के भीतर से किसी ने कहा कि बाहर लियाकत बलोच खड़े हैं और उन्हें किसी से ज्ञापन दिलवा दिया जाए।

वह बाबरी मस्जिद के विध्वंस के विरोध में ज्ञापन देने आए थे। उन्होंने ज्ञापन दिया और बात वहीं खत्म हो गई।

सर्दियों के दिन थे। लेकिन उस घटना ने मुझे यह जरूर महसूस कराया कि विदेश में रहकर, खासकर भारत-पाकिस्तान जैसे तनावपूर्ण रिश्तों के बीच, एक पत्रकार की अपनी पहचान भी कभी-कभी उसके अनुभव का हिस्सा बन जाती है।

सवाल: बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हाई कमीशन की उस घटना के अगले दिन क्या हुआ?

जवाब: हम वहाँ से लौटकर सो गए। सुबह-सुबह मेरे एक पुराने दोस्त तारिक साहब का फोन आया। जब मैं पाकिस्तान गया था, शुरू-शुरू में, घर किराए पर लेने से पहले मैं उनके गेस्ट हाउस में ही रहता था। उस समय मेरा वेतन भी आरबीआई से फॉरेन एक्सचेंज में रिलीज होता था और उसमें देर हो रही थी। इसलिए चार-पाँच महीने मैं उनके यहाँ उधार पर रहा। उन्हें पता था कि मैं इंडियन कॉरेस्पॉन्डेंट हूँ, इसलिए उन्होंने मेरे साथ बहुत generous व्यवहार किया था।

सुबह उनका फोन आया। बोले—“शर्मा साहब, कमाल करते हो तुसी!”

मैंने कहा—“मैं की करता है?”

वह बोले—“क्या जबरदस्त तुहाडा बयान छपा है!”

मैंने कहा—“मेरा बयान? मैं आपके मुल्क की सियासत थोड़े ही करता हूँ। मैं तो पत्रकार हूँ। मेरा बयान कहाँ छप गया?”

उन्होंने कहा—“जंग अखबार के पहले सफे पर छपा है तुहाडा बयान।”

सवाल: आप उस समय उर्दू नहीं पढ़ पाते थे?

जवाब: नहीं, मैं उर्दू पढ़ नहीं पाता था। इसलिए मैंने अपने खानसामा मकबूल से कहा—“यार, जरा जाकर अखबार ले आ।”

मकबूल मैट्रिक पास था। वह भागकर अखबार ले आया। वह मेरे सामने कुर्सी पर नहीं बैठता था, हमेशा जमीन पर ही बैठता था।

उस दिन भी वह जमीन पर बैठ गया और उसने अखबार पढ़ना शुरू किया।

मैं अपने बिस्तर पर रजाई ओढ़कर बैठा था। अखबार में लियाकत बलोच के साथ मेरी जो बातचीत हुई थी, वह पूरी की पूरी छपी हुई थी। यानी हाई कमीशन के बाहर हमारी जो बातचीत हुई थी, उसका पूरा ब्यौरा ‘जंग’ में आ गया था। जाहिर है, वहाँ का कोई रिपोर्टर हमारे आसपास रहा होगा और उसने पूरी बातचीत रिपोर्ट कर दी थी।

मकबूल ने जब वह बातचीत पढ़ी तो वह अचानक खड़ा हो गया। वह छोटा-सा, दुबला-पतला आदमी था। उसने मुझे गले लगा लिया और कहा—“साहब जी, तू सचमुच बड़ा चंगा बयान देता है।”

उस पल का मेरे लिए बहुत महत्व था। क्योंकि जो व्यक्ति अब तक मुझे सिर्फ अपना साहब समझता था, उसने पहली बार मेरे सामने इस तरह की आत्मीयता दिखाई।

सवाल: इस घटना से आपको पाकिस्तान में रह रहे एक अल्पसंख्यक के मन की स्थिति को समझने में मदद मिली?

जवाब: बिल्कुल। मेरे पड़ोस में एक सूफी नाम का आदमी रहता था। मकबूल मुझे बताता था कि वह उसका मजाक उड़ाता था और कहता था—“जिन्होंने हमारी मस्जिद शहीद की है, तू उनकी रोटियाँ सेंकना है।”

अब आप कल्पना कीजिए—एक बेहद तनावपूर्ण माहौल में अगर मुझे यह पता चले कि मेरे पड़ोसी मेरे खानसामा से मेरे बारे में क्या कह रहे हैं और उसके मन में मेरे प्रति क्या भाव पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं, तो यह मेरे लिए अल्पसंख्यक होने का पहला वास्तविक अनुभव था।

यह शायद थोड़ा अजीब तरीके से हुआ, लेकिन इसी अनुभव ने मेरे भीतर अपने देश के अल्पसंख्यकों के डर और उनकी असुरक्षा को लेकर एक संवेदनशीलता पैदा की।

मैं कहता हूँ कि माइनॉरिटीज्म आंकड़ों का आतंक है। जब आप किसी समुदाय को सिर्फ उसके धार्मिक या संख्यात्मक बहुमत-अल्पमत के आधार पर देखने लगते हैं, तो वही आंकड़े उसके लिए डर का कारण बन जाते हैं। पाकिस्तान में मुझे पहली बार उस डर को बहुत करीब से महसूस करने का मौका मिला।

सवाल: क्या उस घटना के बाद भारतीय हाई कमीशन ने आपकी सुरक्षा बढ़ा दी थी?

जवाब: हाँ। सतीश डंबा का फोन आया। उन्होंने कहा—“You know, I have given instructions that one or two police constables will be posted outside your gate, by way of precaution. And my request is that you people should not go out.”

मैंने कहा—“सर, यह कैसे हो सकता है? हम जिस काम के लिए यहाँ आए हैं, वह काम ही नहीं करेंगे तो कैसे चलेगा?”

मैंने कहा—“बाकी आपने जो करना है, कीजिए। जहाँ तक हमारे घर के बाहर पुलिस की बात है, तो हमारे घर के बाहर वैसे भी आईएसआई वाले खड़े रहते हैं। Plain-clothes वाले तो रहते ही हैं। अब पुलिस की यूनिफॉर्म वाले भी लग जाएँगे तो क्या फर्क पड़ता है?”

Older man with glasses in a light blue shirt sitting on a gray sofa, leaning back, with framed photos on the wall behind him.

सवाल: इतने तनावपूर्ण माहौल में आपको डर नहीं लगता था?

जवाब: डर आदमी को अपने लिए नहीं लगता। परिवार के लिए लगता है। और पाकिस्तान मेरे लिए एक non-family station था।

मैं वहाँ अकेला था, परिवार मेरे साथ नहीं रहता था।

हाँ, एक बार मेरी पत्नी, बेटा और बेटी मुझसे मिलने आए थे। उस दौरान उन्हें prank calls आने लगे। कभी-कभी वे बदतमीजी वाली कॉल होती थीं।

मैं उन्हें कहता था—“यार, वो तुम्हारा voice test कर रहे होंगे, छोड़ो। Shrug it off. This happens.”

मैं कोशिश करता था कि वे उस माहौल से डरें नहीं।

लेकिन ऐसी घटनाएँ वहाँ हो रही थीं। एक बार किसी एंबेसी कर्मचारी का स्कूटर रात में किसी ने जला दिया। वह उस समय छुट्टी पर गया हुआ था। हम ऐसी घटनाओं के बारे में सुनते रहते थे।

इसलिए उस दौर ने मुझे यह समझाया कि तनावपूर्ण राजनीतिक माहौल सिर्फ सरकारों और कूटनीति को प्रभावित नहीं करता, बल्कि उसका असर आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी और उसके भीतर बैठे डर पर भी पड़ता है।

सवाल: पाकिस्तान में रहते हुए उस दौर का सबसे बड़ा अनुभव क्या रहा?

जवाब: वह एक ऐसा दौर था, जब हमें सचमुच महसूस हुआ कि हम अल्पसंख्यक हैं। अपने देश में मैं जिस समुदाय का हिस्सा हूँ, वहाँ बहुसंख्यक था, लेकिन पाकिस्तान में हिंदुस्तान टाइम्स के रेजिडेंट कॉरेस्पॉन्डेंट के रूप में मेरी स्थिति एक अल्पसंख्यक की थी।

हालाँकि ये बहुत बड़ी घटनाएँ नहीं थीं। ये professional hazards थे। हम पाकिस्तान में कोई बहुत भव्य स्वागत की उम्मीद लेकर तो गए नहीं थे। लेकिन उस अनुभव से जो समझ मिली, वह आपको कहीं और से नहीं मिल सकती।

इसी बीच बेनजीर भुट्टो की सरकार बनी। उससे पहले भारत और पाकिस्तान के बीच विदेश सचिव स्तर की बातचीत चल रही थी।

उस समय जयंत दीक्षित साहब पाकिस्तान में भारत के हाई कमिश्नर रह चुके थे और बाद में भारत के विदेश सचिव तथा फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइज़र बने। वह बहुत तेज और कुशल डिप्लोमैट थे।

बाबरी मस्जिद विध्वंस से पहले, जब वह पाकिस्तान में भारत के हाई कमिश्नर थे, उनसे किसी ने पूछा था कि अगर बाबरी मस्जिद गिरा दी गई तो क्या होगा? उन्होंने कहा था कि भारत में ऐसा नहीं हो सकता और अगर ऐसा हुआ तो भारत के भीतर गंभीर संकट पैदा हो सकता है।

लेकिन जब बाबरी मस्जिद गिर चुकी थी और बाद में उनसे पूछा गया कि अब आप इस घटना के बारे में क्या कहेंगे, तो उन्होंने कहा—“No, it has not happened because of the resilience of the Indian people.”

उनका कहना था कि भारतीय समाज की जो सहनशीलता और लोगों में प्रेम की क्षमता है, उसकी वजह से भारत उस तरह नहीं टूटा, जैसा आशंका जताई जा रही थी।

उस समय हमारी कोशिश थी कि भारत-पाकिस्तान के बीच बातचीत किसी तरह जारी रहे। लेकिन इसके लिए पहले एक “conducive climate” बनाने की बात कही जा रही थी—यानी बातचीत के लिए अनुकूल माहौल बनाना जरूरी था।

वह बहुत कठिन दौर था। उसी दौरान हमारे एक आरएंडएडब्ल्यू अधिकारी राजेश मित्तल, जो पाकिस्तान में पोस्टेड थे, उनका अपहरण हो गया। बाद में उन्हें रिहा कराया गया। भारत उन्हें वापस लाने के लिए आर्मी प्लेन भेजना चाहता था, लेकिन पाकिस्तान इसके लिए तैयार नहीं था। ऐसे अधिकारियों की पोस्टिंग अक्सर अंडरकवर होती है।

एक दिन इसी मामले को लेकर हम सतीश लांबा साहब के कमरे में बैठे थे। वह उस समय हमारे हाई कमिश्नर थे। मेरे साथ सुदीप चटर्जी भी था। तभी उनके फोन पर जयंत दीक्षित साहब का फोन आया।

उन्होंने कहा—“जी, सर।”

कुछ देर बात करने के बाद फोन रखा और बोले—“कमाल का आदमी है ये दीक्षित!”

सवाल: आपने कहा कि जयंत दीक्षित ने कहा था—“कमाल का आदमी है।” आखिर उन्होंने ऐसा क्या किया था?

जवाब: सतीश लांबा साहब ने फोन रखने के बाद कहा—“कमाल का आदमी है ये दीक्षित!”

मैंने पूछा—“क्यों?”

उन्होंने बताया कि दीक्षित साहब को पता था कि हमारी बातचीत पाकिस्तानी सुन रहे हैं। उन्होंने कहा था कि अगर पाकिस्तान राजेश मित्तल को वापस लाने के लिए भारतीय सेना का विमान स्वीकार नहीं करता, तो उनसे कहो कि हम बीएसएफ का विमान भेज रहे हैं। और अगर वे उसे भी स्वीकार नहीं करते, तो वे उसे गोली मार सकते हैं।

यानी उन्होंने अपनी सीमा बिल्कुल साफ कर दी थी—हम यहाँ तक जाएंगे, इसके आगे नहीं।

सवाल: बीएसएफ का विमान भेजने की नौबत क्यों आई थी?

जवाब: राजेश मित्तल को आईएसआई ने किडनैप कर लिया था। वह अपने परिवार के साथ पाकिस्तान में पोस्टेड थे। जब उन्हें रिहा किया गया तो भारत उन्हें वापस लाना चाहता था। हमारी कोशिश थी कि उन्हें भारतीय सेना के विमान से वापस लाया जाए और इस मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठाया जाए।

आखिरकार बीएसएफ का विमान गया। लेकिन पाकिस्तानियों ने उन्हें सिर्फ दो जोड़ी कपड़ों में विमान पर चढ़ने दिया। उनका परिवार अलग से गया, उन्हें उसी विमान में नहीं जाने दिया गया। यहाँ तक कि हमारे डिप्टी हाई कमिश्नर को भी उन्हें विदा करने के लिए विमान के भीतर जाने की अनुमति नहीं दी गई।

उन्होंने अपना डिप्लोमैटिक कार्ड दिखाया, लेकिन वहाँ के गार्ड ने उसे भी इस तरह फेंक दिया।

उस समय दोनों देशों के बीच जिस तरह का तनाव था, उसमें इस तरह की घटनाएँ भी हो रही थीं। हमने वह दौर बहुत करीब से देखा।

सवाल: इसी दौरान पाकिस्तान में भारतीय पत्रकारों की संख्या भी कम कर दी गई थी?

जवाब: हाँ। पहले वहाँ भारतीय पत्रकारों की संख्या ज्यादा थी। बाद में उन्हें घटाकर तीन किया गया। उसके बाद मेरा, ऑल इंडिया रेडियो के संवाददाता का और टाइम्स ऑफ इंडिया के संवाददाता का वीज़ा एक्सटेंड नहीं किया गया। हमें वापस लौटना पड़ा।

पाकिस्तान की तरफ से कहा गया कि मैं हवाई जहाज से चला जाऊँ। मैंने कहा—“By air तो मैं नहीं जाऊँगा। मैं वाघा बॉर्डर से जाऊँगा।”

सवाल: ऐसा क्यों?

जवाब: क्योंकि मेरे पास वहाँ कई वर्षों का जमा किया हुआ रिकॉर्ड था। उस समय इंटरनेट आज जैसा नहीं था। मैं रोज सात अखबार खरीदता था और उन अखबारों में महत्वपूर्ण खबरों और संदर्भों को मार्क करके रखता था। वह मेरे लिए बैकग्राउंड मटेरियल नहीं, बल्कि मेरे पत्रकारिता रिकॉर्ड का हिस्सा था। मैं उसे छोड़कर नहीं आना चाहता था।

इसीलिए मैंने तय किया कि सारा सामान लेकर सड़क मार्ग से ही लौटूँगा।

सवाल: लेकिन इसके लिए आपको पाकिस्तान सरकार से अनुमति लेनी पड़ी?

जवाब: हाँ। वहाँ की एक बहुत तेज-तर्रार पत्रकार मारियाना बाबर थीं। उनके अंकल नसीरुल्लाह बाबर उस समय पाकिस्तान के इंटीरियर मिनिस्टर थे। मैंने मारियाना से कहा कि मेरा उनसे अपॉइंटमेंट करा दें। उन्होंने मुलाकात करा दी।

मैं नसीरुल्लाह बाबर से मिला और कहा—“सर, आपको सब पता है, फिर आप ऐसे क्यों कह रहे हैं कि आपको पता नहीं?”

उन्होंने कहा कि उन्हें इस बारे में जानकारी नहीं है। फिर उन्होंने इंटीरियर मिनिस्ट्री के एक ज्वाइंट सेक्रेटरी के पास मुझे भेज दिया।

उन्होंने मुझसे कहा—“शर्मा साहब, गुस्ताखी माफ़, इस बार तो नहीं।”

यानी साफ था कि मेरा वीज़ा अब एक्सटेंड नहीं किया जा रहा था।

मैंने कहा—“ठीक है सर, लेकिन मैं by air नहीं जाऊँगा। मैं वाघा से जाऊँगा। और अगर आप मुझे वाघा से जाने की अनुमति नहीं देते, तो मुझे PNG—Persona Non Grata घोषित कर दीजिए।”

सवाल: यानी आपने जानबूझकर एक तरह का calculated risk लिया?

जवाब: बिल्कुल। मैंने calculated risk लिया था। मेरा कहना था कि अगर आप मुझे यहाँ नहीं रखना चाहते तो ठीक है, लेकिन मैं अपने तरीके से वापस जाऊँगा।

मेरे हाई कमिश्नर ने मुझे एक चिट्ठी भी दी थी कि मिस्टर शर्मा पाकिस्तान में अपनी पोस्टिंग पूरी करके अब भारत लौट रहे हैं।

जब मैं वाघा बॉर्डर पहुँचा तो कस्टम अधिकारी ने पूछा—“क्या-क्या सामान है?”

मैंने कहा—“अखबार हैं।”

वह बोला—“और?”

मैंने कहा—“कुछ व्हिस्की भी है।”

उसने पूछा—“कितनी?”

मैंने कहा—“कुछ दस-बारह बोतल होंगी।”

वह थोड़ा हैरान हुआ। मैंने कहा—“जिसके सहारे वहाँ जिंदा थे, वही लेकर वापस आ रहे हैं।”

आखिरकार उन्होंने मेरा सामान जाने दिया।

उस दौर की पत्रकारिता में यही सब था—खबर जुटाना, रिकॉर्ड संभालकर रखना और कभी-कभी अपनी रिपोर्टिंग के लिए ऐसे जोखिम भी उठाना।

सवाल: आपने पाकिस्तान से लौटते समय व्हिस्की की बोतलों का भी जिक्र किया। क्या इसे लेकर कोई परेशानी हुई?

जवाब: नहीं, इसमें कोई खास बात नहीं थी। हम व्हिस्की पीते हैं और वहाँ हमें यह नियमित रूप से मिलती थी। उस समय नॉन-हिंदू और नॉन-मुस्लिम लोगों को बॉन्डेड वेयरहाउस से व्हिस्की लेने की अनुमति थी। मुस्लिमों के लिए उस समय यह व्यवस्था नहीं थी। हमें वहाँ इसे लेकर कभी कोई परेशानी नहीं हुई। वापसी के समय कुछ बोतलें भी साथ ले आए थे।

इसके बाद भी पाकिस्तान जाना होता रहा। 1994 के बाद कुछ समय तक वीज़ा नहीं मिला, लेकिन 1997 में मुझे चुनाव कवर करने के लिए फिर पाकिस्तान जाने का मौका मिला। उस चुनाव में नवाज शरीफ दोबारा सत्ता में लौटे थे।

सवाल: उस दौरान नवाज शरीफ से आपकी फिर मुलाकात हुई?

जवाब: हाँ। उन दिनों रमजान चल रहा था। नवाज शरीफ ने भारतीय पत्रकारों को अपने रायविंड फार्महाउस पर इफ्तारी के लिए बुलाया था। मैं और ‘द हिंदू’ की मालिनी पार्थसारथी भी वहाँ थे।

इफ्तारी के बाद हम वापस जाना चाहते थे, क्योंकि हमें काम करना था और रायविंड लाहौर से काफी बाहर है। लेकिन नवाज शरीफ ने कहा—“नहीं, मैं आप लोगों से डिनर टेबल पर बात करूँगा। अगर मैंने अभी बात कर ली तो आप लोग खाना खाए बिना ही चले जाएंगे।”

इसलिए हम वहीं रुके और उनके साथ खाना खाया।

वह खुद खाने के बहुत शौकीन थे। खाना परोसा जा रहा था तो उन्होंने मुझसे कहा—“इंडियन, कम से कम दो पीस लेना। ये देसी मुर्गी के हैं।”

उनकी यह बात आज भी याद है, क्योंकि वह खुद खाने-पीने के काफी शौकीन थे।

सवाल: नवाज शरीफ के साथ आपकी बातचीत में उस समय भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर क्या सोच सामने आती थी?

जवाब: वह काफी व्यावहारिक ढंग से सोचते थे। वह कहते थे कि मैं भारत के साथ अमन चाहता हूँ। बाद के दौर में वह पाकिस्तानी सेना की भूमिका को लेकर भी खुलकर आलोचनात्मक बातें करने लगे थे।

वह मुझसे कहते थे कि अगर भारत और पाकिस्तान के रिश्ते अच्छे हो जाएँ तो दोनों देशों को फायदा होगा। उनकी सोच में बिजनेस और इकोनॉमी का पक्ष बहुत स्पष्ट था।

एक बार उन्होंने मुझसे कहा था—“देखो, हमारे-आपके ताल्लुकात अच्छे हो जाएँगे तो मैं अपने मुल्क में फॉरेन इन्वेस्टमेंट ला सकता हूँ। मेरे पास कारीगर हैं, बनाने वाले लोग हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि मेरे बगल में इतनी बड़ी मार्केट है—इंडिया।”

यानी वह भारत को सिर्फ पड़ोसी देश के रूप में नहीं, बल्कि एक बहुत बड़े बाजार के रूप में भी देखते थे। उनकी सोच में कारोबारी दृष्टिकोण साफ दिखाई देता था।

सवाल: आपके पाकिस्तान प्रवास के आखिरी दौर में क्या माहौल फिर बदलने लगा था?

जवाब: हाँ। जब मेरा वहाँ का टेन्योर खत्म होने लगा तो हमारे पीछे आईएसआई के लोग भी लगे रहते थे। उनमें एक कामरान नाम का व्यक्ति था। वह लगातार हमारी गतिविधियों पर नजर रखता था।

उस समय तक मुझे यह साफ समझ आ गया था कि पाकिस्तान में एक भारतीय पत्रकार के रूप में काम करना सिर्फ खबरें जुटाने का काम नहीं है। वहाँ आपको लगातार यह भी देखना पड़ता है कि कौन आपको देख रहा है, कौन आपसे बात कर रहा है और आपकी रिपोर्टिंग का असर किस पर पड़ रहा है।

सवाल: जब आपका पाकिस्तान में कार्यकाल खत्म हुआ और आप भारत लौट रहे थे, तब आपके लिए वहाँ का अनुभव कैसा रहा?

जवाब: जब मैं वापस आ रहा था तो मेरा खानसामा मकबूल, उसकी पत्नी कौसर और उनका बेटा साकिब—तीनों खड़े होकर रो रहे थे। कामरान भी वहीं खड़ा था, जो हमारी गतिविधियों पर नजर रखता था। मैंने उससे कहा—“जरूर अपनी रिपोर्ट में लिखना कि जब एक ‘काफिर हिंदुस्तानी’ अपने वतन वापस जा रहा था, तो तीन पाकिस्तानी उससे जुदाई पर रो रहे थे।”

मेरे लिए वह बहुत भावुक क्षण था। मैंने पाकिस्तान में बहुत से दोस्त बनाए थे और वहाँ रहते हुए जो रिश्ते बने, वे सिर्फ पेशेवर नहीं थे।

बाद में हमने भारत-पाकिस्तान के बीच पीसमेकिंग की कई कोशिशें भी कीं। इसी सिलसिले में हमने South Asia Free Media Association (SAFMA) बनाई, जिसमें दक्षिण एशिया के सातों देशों के पत्रकारों को जोड़ा गया। संगठन ने काफी काम किया, लेकिन बाद में ब्यूरोक्रेसी ने उसमें अड़चनें डाल दीं और वह अपनी मूल भावना के मुताबिक आगे नहीं चल सका।

सवाल: पाकिस्तान में आपकी पत्रकारिता की पहचान के कारण भारतीय नेताओं से भी आपकी बातचीत होती रही?

जवाब: हाँ। जब लालकृष्ण आडवाणी पाकिस्तान जाने वाले थे, तब सुधींद्र कुलकर्णी ने मुझे फोन किया कि आडवाणी जी आपसे मिलना चाहते हैं। मैं पाकिस्तान को काफी करीब से जानता था, इसलिए उनसे मुलाकात हुई।

मैंने उनसे कहा कि पाकिस्तान में अटल बिहारी वाजपेयी की छवि एक peacemaker की है, खासकर मुशर्रफ के साथ आगरा वार्ता के बाद। लेकिन वहाँ आडवाणी की छवि उसके उलट थी। मैंने उनसे साफ कहा—“आपको वहाँ लोग पीस के विलेन के रूप में देखते हैं। यह यात्रा उस छवि को बदलने का मौका हो सकती है।”

बाद में जब आडवाणी पाकिस्तान गए तो मैंने वहाँ कई टीवी स्टूडियो में उस यात्रा पर बात की। जिन्ना के बारे में उनके बयान और उनकी पाकिस्तान यात्रा ने वहाँ काफी चर्चा पैदा की।

सवाल: जिन्ना के बारे में आपकी अपनी समझ क्या है?

जवाब: जिन्ना के बारे में एक बात अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती है। पाकिस्तान बनने के बाद उनका वह भाषण बहुत महत्वपूर्ण है, जिसमें उन्होंने कहा था कि नागरिकों को अपनी धार्मिक पहचान के आधार पर भेदभाव का सामना नहीं करना चाहिए और हर व्यक्ति को अपनी इबादतगाह में जाने की पूरी आजादी है।

स्टैनली वोलपर्ट की किताब Jinnah of Pakistan में भी जिन्ना के उस दृष्टिकोण पर चर्चा है। इसलिए जिन्ना की राजनीतिक विरासत को सिर्फ एक धार्मिक राष्ट्र की अवधारणा तक सीमित करके देखना सही नहीं है। उनके अपने सार्वजनिक वक्तव्यों में एक ऐसे पाकिस्तान की कल्पना भी दिखाई देती है, जहाँ नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता हासिल हो।

सवाल: आज आप खुद को किस राजनीतिक विचारधारा के करीब मानते हैं?

जवाब: मैं कांग्रेस पार्टी का सदस्य या समर्थक होने की बात नहीं कर रहा, लेकिन कांग्रेस के जो foundational principles हैं, मैं उन पर विश्वास करता हूँ। दरअसल, वे भारत के भी बुनियादी सिद्धांत हैं। उनसे अलग होना या उनका परित्याग करना आत्मघात होगा।

140 करोड़ लोगों के देश में आप सबकी विचारधारा को एक जैसा नहीं बना सकते। विचारधारा को निक्कर नहीं पहना सकते। वह अलग-अलग रूपों और अलग-अलग आवाज़ों में सामने आएगी। भारत की खूबसूरती ही उसकी विविधता है। आप कोई मौसम, फल, सब्जी, भाषा, चेहरे-मोहरे या विचारधारा का नाम लीजिए—भारत में आपको उसकी विविधता मिल जाएगी। यही हमारी ताकत है।

सवाल: तो क्या आप खुद को कांग्रेस का समर्थक मानते हैं?

जवाब: नहीं। इस समय मैं खुद को free thinker मानता हूँ। मैं कांग्रेस के उन बुनियादी सिद्धांतों में विश्वास करता हूँ, भले ही आज कांग्रेस खुद उन सिद्धांतों पर उतना विश्वास करती हो या नहीं। लेकिन एक बात साफ है—मैं कभी बीजेपी का समर्थक नहीं हो सकता।

सवाल: तो वोट किसे देते हैं?

जवाब: मैं anti-BJP हूँ। बीजेपी के खिलाफ जो सबसे सक्षम पार्टी होगी, मैं उसे वोट दूँगा। मैं उस पार्टी को वोट दूँगा जो हिंदू-मुसलमान के नाम पर राजनीति न करे, जो श्मशान-कब्रिस्तान और पाकिस्तान के नाम पर लोगों को न बाँटे।

आप मुझे democratic liberal कह सकते हैं।

सवाल: आपने वह दौर भी देखा है, जब संपादक की अपनी साख होती थी और पत्रकार नेता से बराबरी की हैसियत से बात करता था। आज मीडिया को ‘गोदी मीडिया’ और ‘दरबारी मीडिया’ कहा जाता है। एक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में आपके भीतर इस बदलाव को लेकर क्या भड़ास है?

जवाब: मेरे भीतर भड़ास नहीं निकलती, आह निकलती है।

हमारे दौर में पत्रकार और नेता बराबरी की हैसियत से मिलते थे। पत्रकार को यह एहसास नहीं होता था कि वह किसी सत्ता के सामने खड़ा है। संपादक की अपनी साख होती थी और पत्रकार की अपनी स्वतंत्र पहचान।

आज जब पत्रकारिता सत्ता के बहुत करीब चली जाती है, तो सबसे बड़ा नुकसान पत्रकार का नहीं, पत्रकारिता की विश्वसनीयता का होता है। पत्रकारिता का काम सत्ता के साथ खड़ा होना नहीं, सत्ता से सवाल पूछना है। यही फर्क हमारे दौर की पत्रकारिता और आज के दौर के बीच सबसे ज्यादा महसूस होता है।

सवाल: आपने अपने शुरुआती पत्रकारिता दौर में संपादकों और संस्थानों की जो भूमिका देखी, उसमें और आज के दौर में कितना फर्क महसूस करते हैं?

जवाब: बहुत बड़ा फर्क है। उस समय संपादक और वरिष्ठ पत्रकार अपनी स्वतंत्रता को लेकर बहुत सजग थे। मैं आपको एक घटना बताता हूँ। हम बहुत युवा रिपोर्टर थे। मैंने एक स्टोरी की कि इंटर-स्टेट बस टर्मिनस में कुछ दुकानें नियमों के खिलाफ चल रही हैं और उन्हें राजनीतिक संरक्षण हासिल है। उस समय ज्ञानी जैल सिंह गृह मंत्री थे और उनके कुछ सहयोगियों का नाम भी इस मामले में आ रहा था।

खबर प्रमुखता से छपी। उसके बाद गृह मंत्री के दफ्तर से हमारे वरिष्ठ पत्रकार जी.जी. मीरचंदानी को फोन आया। उन्होंने जवाब दिया—“You speak to my reporter. I can’t interfere in this.”

यही संपादकीय स्वतंत्रता थी। आज गृह मंत्री के दफ्तर से फोन आ जाए तो पूरा संस्थान दबाव में आ जाता है। तब वरिष्ठ संपादक अपने रिपोर्टर के पीछे खड़े होते थे।

सवाल: आज मीडिया को लेकर जो ‘गोदी मीडिया’ जैसी बातें कही जाती हैं, क्या आप उससे सहमत हैं?

जवाब: काफी हद तक समस्या है। लेकिन इसकी एक वजह मीडिया का बिजनेस मॉडल भी है। लोकतंत्र में कहा जाता है—“You get the government you deserve”—क्योंकि आपने उसे वोट दिया है। उसी तरह मैं कहता हूँ, “You get the media you deserve.”

हमारे पाठक और दर्शक खबर के लिए पैसा खर्च नहीं करना चाहते। उन्हें पाँच रुपये का अखबार चाहिए या मुफ्त टीवी चैनल।

जबकि वे भूल गए हैं कि information is power—जिसके पास सूचना है, उसी के पास शक्ति है।

जब समाज सूचना के लिए भुगतान नहीं करना चाहता, तो मीडिया की आर्थिक स्वतंत्रता कमजोर होती है।

सवाल: क्या कॉरपोरेटाइजेशन भी इसके लिए जिम्मेदार है?

जवाब: बिल्कुल। मीडिया पहले भी उद्योगपतियों के हाथ में था, लेकिन तब एक एडिटर का संस्थान होता था और मालिक भी संपादकीय मर्यादा का लिहाज करते थे। टाटा, बिरला, बजाज जैसे पुराने उद्योगपति अलग किस्म के लोग थे। उनका कारोबार मजबूत था, उनकी सामाजिक साख थी और वे संस्थानों की प्रतिष्ठा समझते थे।

आज मीडिया में कॉरपोरेट हित कहीं ज्यादा हावी हैं। मालिकाना नियंत्रण बढ़ा है और संपादक की स्वतंत्र भूमिका लगातार कमजोर हुई है। संपादक कई जगह सिर्फ पदनाम बनकर रह गया है। यही बदलाव पत्रकारिता की आत्मा को नुकसान पहुँचा रहा है।

सवाल: आपने कहा कि पहले संपादकों का रुतबा अलग था। क्या कोई उदाहरण है, जो आज के दौर से उस फर्क को साफ करता हो?

जवाब: बिल्कुल। राजीव गांधी के स्पेशल असिस्टेंट भी ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ के दफ्तर में जाकर संपादक गिरिलाल जैन को सरकार का पक्ष समझाते थे। वह संपादक का रुतबा था। आज तो बहुत से लोगों को अपने बड़े अखबार के संपादक का नाम तक पता नहीं होता। पूरी संपादकीय संरचना ही बदल गई है।

सवाल: Hindustan Times जैसे बड़े कॉरपोरेट अखबार में पॉलिटिकल एडिटर रहने के बाद क्या आपको लगता है कि मुख्यधारा के बड़े अखबार अब मुनाफे और सत्ता के दबाव के बीच अपनी स्वतंत्रता खो चुके हैं?

जवाब: काफी हद तक। समस्या हमारे बिजनेस मॉडल में है। जिस अखबार की उत्पादन लागत लगभग 25 रुपये है, वह पाठक तक 5 रुपये में पहुँचता है। बाकी पैसा विज्ञापन से आता है। बड़े विज्ञापनदाता उद्योगपति हैं और सरकारें भी। आज सरकारों के मीडिया बजट बहुत बड़े हैं। ऐसे में स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए जगह लगातार कम होती गई है।

सवाल: लेकिन विज्ञापन पर निर्भरता तो पहले भी थी। फिर पहले पत्रकारिता ज्यादा स्वतंत्र कैसे रह पाती थी?

जवाब: फर्क सिर्फ विज्ञापन का नहीं, संपादकीय संस्थान की ताकत का था। पहले मालिक और संपादक के बीच एक स्पष्ट सीमा होती थी। संपादक अपनी विश्वसनीयता और अखबार की प्रतिष्ठा के लिए खड़ा होता था। आज कई संस्थानों में वह स्वतंत्रता कमजोर हो गई है। The media has been tamed.

कुछ अंतरराष्ट्रीय अखबारों ने इसका अलग मॉडल बनाया है। The Guardian इसका उदाहरण है। उसकी विचारधारा स्पष्ट है, लेकिन उसकी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए फाउंडेशन और निवेश से आय का ऐसा ढाँचा बनाया गया कि अखबार को हर समय विज्ञापनदाता या सरकार के सामने निर्भर न रहना पड़े।

सवाल: तो क्या भारत में प्रेस की स्वतंत्रता संवैधानिक अधिकार नहीं है?

जवाब: संविधान में ‘Freedom of Press’ शब्द अलग से नहीं लिखा है। प्रेस की स्वतंत्रता, Article 19(1)(a) में दिए गए Freedom of Speech and Expression से निकली हुई स्वतंत्रता है। इसलिए जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दबाव बढ़ता है, तो उसका सीधा असर पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर भी पड़ता है।

सवाल: आपने कहा कि स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र के लिए जरूरी है। आज सरकारें सूचना के प्रवाह को नियंत्रित करने की कोशिश करती दिखती हैं। इसे आप किस तरह देखते हैं?

जवाब: स्वतंत्र मीडिया के जरिए सूचना का मुक्त प्रवाह जनता को सशक्त करता है। Empowered public opinion makes democracy robust. यही प्रेस की स्वतंत्रता का मूल उद्देश्य है।

आज स्थिति यह है कि आरटीआई कमजोर हुई है, सोशल मीडिया अकाउंट और हैंडल ब्लॉक किए जाते हैं, पत्रकारों पर मुकदमे होते हैं। कोशिश यही दिखती है कि ऐसी सूचना बाहर न आए, जो सत्ता के हित में न हो। यह दरअसल public discourse को नियंत्रित करने की कोशिश है।

और जब अहम मुद्दों पर देश में सिर्फ एक ही तरह की राय बनाने की कोशिश हो—मसलन लगातार हिंदू-मुसलमान के सवाल को केंद्र में रखना—तो लोकतांत्रिक बहस कमजोर होती है।

Smiling elderly man with glasses sitting on a sofa, wearing a light blue patterned shirt.

सवाल: क्या आपको लगता है कि 2014 के बाद मीडिया की स्थिति ज्यादा खराब हुई है?

जवाब: दबाव मीडिया पर हमेशा रहा है। लेकिन आज उसका स्वरूप ज्यादा व्यापक है। जो लोग इमरजेंसी की सेंसरशिप के खिलाफ बोलकर सत्ता में आए, उन्होंने उससे सबक लेने के बजाय कई मामलों में उसी तरीके को और आगे बढ़ाया है।

मुद्दा सिर्फ मीडिया को नियंत्रित करने का नहीं है। मुद्दा जनता की विचार करने की क्षमता को कमजोर करने का है। लोकतंत्र में नागरिक को सवाल पूछने और अलग राय रखने की आजादी होनी चाहिए।

सवाल: आपने लुटियंस दिल्ली के राजनीतिक गलियारों को बहुत करीब से देखा है। सत्ता, मीडिया और लॉबिंग के उस दौर को कैसे देखते हैं?

जवाब: उस दौर में भी सत्ता और मीडिया के बीच संबंध थे, लेकिन पत्रकारिता में सत्ता को चुनौती देने की क्षमता थी। बोफोर्स इसका बड़ा उदाहरण है। राजीव गांधी की सरकार पर इतना बड़ा राजनीतिक दबाव बना कि सरकार लगभग हिल गई। वी.पी. सिंह लगातार सवाल उठा रहे थे, अरुण शौरी जैसे पत्रकार और लेखक सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे थे। अमिताभ बच्चन का नाम भी इस विवाद में आया, लेकिन उनके खिलाफ आरोप साबित नहीं हुए।

यह सब मुक्त प्रेस के कारण संभव हुआ था।

सवाल: आज Indian Express को आप किस नजर से देखते हैं?

जवाब: आज भी दूसरे अखबारों की तुलना में Indian Express मुझे अपेक्षाकृत बेहतर लगता है। लेकिन यह वह Indian Express नहीं है, जिसने कभी अरुण शौरी के दौर में इंदिरा गांधी पर इतनी तीखी पत्रकारिता की थी। उस दौर की संपादकीय निर्भीकता और आज की पत्रकारिता में फर्क साफ दिखाई देता है।

आज जवाबदेही का संकट कहीं ज्यादा गहरा है। सीबीआई जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों के राजनीतिक इस्तेमाल का इतिहास पुराना है। इंदिरा गांधी के दौर से ही इन एजेंसियों का इस्तेमाल होता रहा, लेकिन आज उसका पैमाना कहीं अधिक बढ़ गया है।

“फर्क सिर्फ डिग्री का है। पहले बीमारी के कुछ मामले थे, आज यह महामारी की तरह फैल गई है।”

सवाल: क्या ऐसे माहौल में ईमानदार और किसी खेमे से न जुड़ा पत्रकार दिल्ली में टिक सकता है?

जवाब: पत्रकारिता कई बार कमांडो ऑपरेशन जैसी होती है—आपको वार करना आता हो, लेकिन साथ ही पीछे हटने की अपनी राह भी सुरक्षित रखनी चाहिए। “आपके पास अपनी लाइन ऑफ रिट्रीट होनी चाहिए। आज पत्रकारों ने वह रास्ता ही छोड़ दिया है।”

स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए सिर्फ साहस काफी नहीं, आत्मनिर्भरता भी जरूरी है। सत्ता से सवाल पूछने की कीमत चुकानी पड़ सकती है, इसलिए पत्रकार को अपना वैकल्पिक रास्ता भी तैयार रखना चाहिए। यही वह चीज है, जो आज की पत्रकारिता में सबसे ज्यादा कमजोर हुई है।

सवाल: आपने पत्रकारिता को ही अपना पेशा क्यों चुना? क्या लिखने की रुचि आपको परिवार से मिली?

जवाब: देखिए, लाइफ एक कंडक्टेड टूर है। बहुत कुछ पूर्व-निर्धारित होता है। इसलिए न किसी बड़ी जीत पर मुझे अपार खुशी होती है, न बड़ी हार पर मैं बहुत हतोत्साहित होता हूँ। मेरे भीतर एक तरह का contentment है।

पत्रकारिता की तरफ मेरा झुकाव शुरू से था। छात्र जीवन में ही हमने इंडियन काउंसिल ऑफ यंग जर्नलिस्ट्स बनाई और उसका हाउस जर्नल ICYJ Mirror निकाला। मुझे लिखने का शौक था और मैं हिंदी में भी लिखता था।

मेरे पिता उर्दू के शायर थे। उनका तखल्लुस ‘आशुफ्ता’ था, जिसका अर्थ है—a self-respecting romanticist। मुझे उर्दू का अच्छा दखल है, लेकिन सबसे बड़ा अफसोस यही है कि मैंने उनसे उर्दू लिखना नहीं सीखा। वे शायरी के साथ-साथ मिडिल ईस्ट के लिए एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट का कारोबार करते थे और उनकी छोटी-सी यूटेंसिल्स की फैक्ट्री भी थी।

विभाजन के बाद वे Evacuee Property से जुड़े और पाकिस्तान से आए मुसलमानों की छोड़ी संपत्तियों में हिंदुओं को बसाने के काम में भी रहे। पाकिस्तान में उनके कई करीबी दोस्त थे, जिनसे हमारे परिवार के रिश्ते भी बहुत आत्मीय थे। शायद उसी माहौल ने मुझे उर्दू और हिंदुस्तानी तहज़ीब के साझा स्वरूप से जोड़ा।

सवाल: आज के ध्रुवीकृत माहौल में खुद को सेक्युलर और डेमोक्रेटिक लिबरल मानते हुए क्या आपके लिए निष्पक्ष रहना संभव है?

जवाब: मैं सिर्फ न्यूट्रल नहीं हूँ, मैं डेमोक्रेटिक लिबरल और खाँटी सेक्युलर हूँ। हिंदू-मुसलमान के आधार पर राजनीति में मेरा विश्वास नहीं है। मैंने पत्रकारिता में जो सीखा है, उसे अब unlearn नहीं कर सकता। मेरी बुनियाद पक्की है और मैं उसी पर कायम हूँ।

मेरे लिए भारत की प्रगति को समझने के लिए गांधी, अंबेडकर और नेहरू जैसे लोगों के योगदान को स्वीकार करना जरूरी है।

अगर नेहरू ने IIT और AIIMS जैसी संस्थाएँ न बनाई होतीं, तो आज की पीढ़ी के सामने शिक्षा और अवसरों का जो आधार है, वह शायद नहीं होता। जो लोग इल्म और तालीम की अहमियत समझते हैं, उन्हें इतिहास को उसके पूरे संदर्भ में देखना चाहिए।

सवाल: आप कहते हैं कि आज के ध्रुवीकृत माहौल में कुछ मुद्दों पर न्यूट्रल रहना संभव नहीं है। पत्रकार के लिए ऑब्जेक्टिविटी की आपकी परिभाषा क्या है?

जवाब: हम post-truth world में रह रहे हैं, जहाँ एक झूठ को लगातार दोहराकर सच बनाने की कोशिश होती है। लेकिन कुछ मुद्दों पर आपको स्पष्ट पक्ष लेना ही पड़ता है। अगर मेरे सामने किसी की हत्या हुई है, तो मैं यह कहकर objective नहीं हो सकता कि पहले देखता हूँ किसने मारा। मेरी पहली जिम्मेदारी यह कहना है कि हत्या गलत हुई है।

दुनिया भर में पत्रकार और बुद्धिजीवी अपनी विचारधारा या world view के साथ पहचाने जाते हैं—कोई रिपब्लिकन है, कोई डेमोक्रेट, कोई कंजर्वेटिव या लेबर समर्थक। उनके पास अपना दृष्टिकोण होता है। मेरे पास भी है। इसलिए मुझे लगता है कि बिना किसी विचार के भेड़चाल चलने से बेहतर है कि पत्रकार अपना स्वतंत्र दृष्टिकोण रखे।

सवाल: लेकिन जब लोकतंत्र के संस्थानों पर लगातार दबाव की बात होती है, तो क्या आपको आज के दौर को लेकर डर नहीं लगता?

जवाब: संस्थाएँ कमजोर हुई हैं। न्यायपालिका पर सवाल हैं, कार्यपालिका और संसद पर दबाव है और फोर्थ एस्टेट का बड़ा हिस्सा रियल एस्टेट में बदल गया है। लेकिन डरने के बजाय जरूरी है कि लोग एक-दूसरे को सुनें और संवाद करें।

मैं आपसे इतने समय से बात कर रहा हूँ, मेरी कोशिश भी यही है कि जो कुछ मैंने अपने गुरुओं से सीखा, उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचा सकूँ। ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह आगे ट्रांसमिट हो। पत्रकारिता में भी यही निरंतरता जरूरी है।

सवाल: क्या आपको लगता है कि आज नीतियों में भी वह निरंतरता खत्म हो रही है?

जवाब: बिल्कुल। सरकारें बदलती हैं, लेकिन राष्ट्रीय नीतियों में निरंतरता रहनी चाहिए। अगर किसी नीति पर national consensus नहीं है, तो सरकार बदलते ही वह नीति भी बदल जाती है। ऐसी नीति स्थायी नीति नहीं हो सकती।

सवाल: जैसे वंदेमातरम् को लेकर विवाद?

जवाब: संविधान सभा ने जिस रूप में इसे स्वीकार किया, उसके पीछे उस समय के राष्ट्रीय नेतृत्व की व्यापक सहमति थी। इसलिए आज किसी अलग राजनीतिक बहुमत के आधार पर उस ऐतिहासिक सहमति को बदलने की कोशिश को उसी संदर्भ में देखना चाहिए। सवाल सिर्फ गीत का नहीं, राष्ट्रीय सहमति और संवैधानिक परंपरा का है।

सवाल: मौजूदा सरकार की मीडिया नीति और विपक्ष के बिखराव पर आपकी निजी भड़ास क्या है? क्या मीडिया सचमुच विपक्ष की भूमिका निभा रहा है या सरकार का लाउडस्पीकर बन चुका है?

जवाब: विपक्ष बिखरा हुआ हो सकता है, मरा हुआ नहीं है। लेकिन उसकी आवाज़ जिस तरह इंदिरा गांधी के दौर में, खासकर इमरजेंसी से पहले और बाद में दिखाई जाती थी, आज नहीं दिखाई जा रही। उस समय विपक्ष के नेताओं की अपनी अहमियत और इज्जत थी, आज वह अहमियत स्वीकार नहीं की जाती।

मीडिया उद्योगपतियों की जेब में है और उद्योगपति सरकार की जेब में। ऐसे में सवाल है कि शिकायत लेकर जाएँ तो कहाँ जाएँ? लोकतंत्र के असली गार्डरेल्स न्यायपालिका, चुनाव आयोग और दूसरे संवैधानिक आयोग हैं, लेकिन उनकी भूमिका भी कमजोर हुई है। मैं तीन साल राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का सदस्य रहा हूँ। आज आयोगों की आवाज़ कहाँ सुनाई देती है? मणिपुर जैसी गंभीर घटना पर भी संबंधित आयोगों की प्रभावी आवाज़ नहीं सुनाई दी।

सवाल: पत्रकारिता में कभी यह माना जाता था कि सत्ता के साथ पत्रकार का adversarial relationship होना चाहिए। क्या वह रिश्ता खत्म हो गया है?

जवाब: बिल्कुल। Adversarial का मतलब दुश्मनी नहीं, बल्कि सरकार पर निगरानी रखने वाला विरोधी रिश्ता है। आज वह रिश्ता लगभग खत्म हो गया है। विरोधी मीडिया की जगह गोदी मीडिया ने ले ली है।

सवाल: आप आज सत्य हिंदी, नई परख और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर दिखाई देते हैं। क्या डिजिटल मीडिया उस पत्रकारिता को जिंदा रख सकता है, जो बड़े टीवी चैनलों और अखबारों में कमजोर पड़ गई है?

जवाब: काफी हद तक। डिजिटल और YouTube ने स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए जगह बनाई है, हालांकि वहाँ भी विकृतियाँ आई हैं।

लेकिन अभी भी वहाँ ऐसी बातें कही जा सकती हैं, जिन्हें मुख्यधारा के मीडिया में जगह नहीं मिलती।

सवाल: नए दौर के पत्रकारों को देखकर आपको सबसे ज्यादा गुस्सा या तरस किस बात पर आता है?

जवाब: मुझे तरस इस बात पर आता है कि बहुत से युवा पत्रकारों को देखकर लगता है कि इनकी रीढ़ की हड्डी नहीं है।

एक अंग्रेज़ी की लाइन है—“Sometimes with secret pride I sigh, that how patient am I, and then wonder what is really mine.” पत्रकारिता में धैर्य जरूरी है, लेकिन उसके साथ रीढ़ भी चाहिए। आज patient पत्रकार तो बहुत हैं, लेकिन rubber spine वाले भी बहुत हैं।

शिवा, तुम्हारा नाम शिवा है, इसलिए कह रहा हूँ—पत्रकारिता का तीसरा नेत्र सिर्फ देखने के लिए नहीं है। पत्रकारिता को कभी-कभी रौद्र रूप भी धारण करना पड़ता है। जब आँखों के सामने बेइंसाफी हो रही हो, अन्याय हो रहा हो, गरीबों को दबाया जा रहा हो, आवाज़ों को कुचला जा रहा हो, तब पत्रकार को खड़ा होना चाहिए।

आज पत्रकारिता gasping for breath है। उसकी साँस उखड़ी हुई है, जैसे ICU में पड़ी हो। वह वहाँ से बाहर आएगी या नहीं, मैं नहीं जानता।

सवाल: आपने 2002 में नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू भी किया था, जब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे। उस दौर की कोई बात आज भी याद है?

जवाब: हाँ। दंगे चल रहे थे। मैं 28 फरवरी के बाद वहाँ पहुँचा था और मार्च में उनका इंटरव्यू किया। बातचीत के बाद उन्होंने मुझसे कहा, “विनोद, मैं जानता हूँ कि तुम मेरी पार्टी की विचारधारा के विरोध में हो, फिर भी मैंने तुमसे बात की है।”

मैंने कहा, “नरेंद्र भाई, इसी को लोकतंत्र कहते हैं। स्नेह आप बनाए रखें।”

फिर उन्होंने मुझे एक डायरी आइटम सुनाया। उन्होंने बताया कि दंगों के बाद शबाना आजमी और सीताराम येचुरी का एक संसदीय प्रतिनिधिमंडल गुजरात आया था। लौटते समय उनकी गाड़ी खराब हो गई। शबाना बाहर निकलीं तो एक बुजुर्ग महिला ने उन्हें पहचान लिया और अपनी चप्पल उतारकर उन्हें मार दिया।

मोदी ने कहा, “विनोद, तुम्हें एक डायरी आइटम देता हूँ।”

मैंने कहा, “नहीं भैया, जितना उपकार आपने मुझ पर कर लिया, उतना ही काफी है।”

उस मुलाकात के बाद मैंने उनके बारे में अपना एक आकलन बना लिया था—“I have a good assessment of the man. He knows me, I know him.”

सवाल: आपने नरेंद्र मोदी को करीब से देखा है। व्यक्तिगत तौर पर आपको वे कैसे लगे? क्या कभी आपको लगा कि वे आपके लिए कोई आदर्श हो सकते हैं?

जवाब: किसी व्यक्ति को देखकर उसका व्यक्तित्व आपको अपनी ओर खींचना चाहिए। लेकिन वे कभी ऐसे व्यक्ति नहीं रहे, जिन्हें मैं अपना role model मानूँ। जब वे प्रधानमंत्री बने तो मैंने सोचा कि अब उनके फैसलों को परखा जा सकता है। लेकिन जिस तरह उन्होंने अपने वरिष्ठों और मार्गदर्शकों को किनारे किया, वह मेरे लिए महत्वपूर्ण था। जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे लोग उनकी सरकार में नहीं थे।

मैंने उस समय कहा था—“This is not a selection process. This government has not been formed through a selection process; it has been formed through an exclusion process.”

सवाल: आपके करियर में ऐसा कोई वाकया, जब किसी बड़ी राजनीतिक खबर को रोकने के लिए आप पर सीधे कॉरपोरेट या सरकारी दबाव आया हो और आपने झुकने से इनकार किया हो?

जवाब: हाँ। जब स्वर्ण मंदिर में अकाल तख्त की मरम्मत कार सेवा के जरिए हो रही थी, तब विपक्ष का आरोप था कि यह कार सेवा नहीं, सरकार सेवा है। मुझे जानकारी मिली कि एनबीसीसी के इंजीनियरों को राजा सांसी एयरपोर्ट की मरम्मत के नाम पर वहाँ लगाया गया है। मैंने इस पर स्टोरी लिखी—“It is Sarkar Seva.”

मैं उस समय वीक मैगज़ीन में स्पेशल कॉरेस्पॉन्डेंट था। सरकार को खबर की जानकारी मिली तो मैगज़ीन के मैनेजमेंट पर दबाव डाला गया कि स्टोरी रुकवा दी जाए। मामला मेरे एडिटर टी.वी.आर. शिनॉय तक पहुँचा। उन्होंने साफ मना कर दिया—“I can’t ask him to stop this story.”

स्टोरी प्रकाशित हुई। यह मेरे एडिटर की वजह से संभव हुआ। इसलिए मैं मानता हूँ कि एडिटर का संस्थान किसी भी काम कर रहे पत्रकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

सवाल: टी.वी.आर. शिनॉय जैसे दिग्गज के नाम पर अवॉर्ड पाने वाले आप पहले पत्रकार हैं। आज जब अवॉर्ड की निष्पक्षता पर भी सवाल उठते हैं, पत्रकारों की साख बचाने का आखिरी रास्ता क्या है? टी.वी.आर. शिनॉय अवॉर्ड के बारे में आप कुछ बताना चाहेंगे? आपको यह सम्मान किस काम के लिए मिला था?

जवाब: टी.वी.आर. शिनॉय अवॉर्ड बिकता नहीं है। मुझे यह अवॉर्ड पाने वाला पहला पत्रकार होने का सम्मान मिला था। बाद में राजदीप सरदेसाई और कुछ दूसरे पत्रकारों को भी मिला। मुझे यह पार्लियामेंट्री रिपोर्टिंग के लिए मिला था। उस दौर में हमारी कुछ रिपोर्टों को तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्रियों ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी उद्धृत किया।

हमने उस दौर के बहुत अच्छे सांसद देखे—मधु लिमये, पीलू मोदी, मधु दंडवते, सोमनाथ चटर्जी, इंद्रजीत गुप्ता, अटल बिहारी वाजपेयी, सुषमा स्वराज, यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह, अरुण शौरी और अरुण जेटली। वे सभी बहुत अच्छे पार्लियामेंटेरियन थे।

चंद्रशेखर भी बड़े मुद्दों पर स्पष्ट रुख लेने वाले नेता थे।

सवाल: उस दौर की पत्रकारिता में नेताओं से डाँट भी खानी पड़ती थी?

जवाब: बिल्कुल। हमने ई.एम.एस. नंबूदरीपाद से भी डाँट खाई है। चंद्रशेखर की भारत यात्रा की तुलना मैंने मजाक में Mao’s Long March से कर दी थी। उन्होंने मुझे खूब डाँटा—“What sense of history do you have?” मेरा सवाल शरारती था और तुलना भी गलत थी, इसलिए उनकी डाँट चुपचाप सुन ली।

जगजीवन राम से भी एक बार डाँट खाई। दंगों के दौरान वे राहत व्यवस्था पर बात कर रहे थे। मैंने सवाल किया तो उन्होंने कहा, “You have come late.” मैंने जवाब दिया, “Sir, you can’t ask me the same question in different language and get an answer from me.” उन्होंने फिर डाँटा और हमने चुपचाप सुन लिया।

Older man seated indoors, wearing a turquoise patterned shirt and glasses hanging from his chest, looking at the camera.

सवाल: तो क्या आपको लगता है कि वह पत्रकारिता का बिल्कुल अलग दौर था?

जवाब: बिल्कुल। That was the age of innocence. Today is the age of deceit. उस समय अगर हेराफेरी होती थी तो उसके बारे में बोल सकते थे, सवाल पूछ सकते थे। आज हेराफेरी का दौर है।

सवाल: आपके लंबे पत्रकारिता जीवन का कोई ऐसा इंटरव्यू, जो आज भी आपको खास तौर पर याद हो?

जवाब: बेनज़ीर भुट्टो का एक इंटरव्यू मैंने पढ़ा था, जिसमें उन्होंने अपने तीन रोल मॉडल बताए थे- जुल्फिकार अली भुट्टो, जोन ऑफ आर्क और इंदिरा गांधी। उस समय मैं पाकिस्तान में था और बेनज़ीर विपक्ष में थीं। मैंने उनसे इंटरव्यू माँगा और पूछा- “जुल्फिकार अली भुट्टो और जोन ऑफ आर्क तो समझ में आते हैं, लेकिन इंदिरा गांधी आपकी रोल मॉडल कैसे हैं?”

मैंने उनसे कहा कि इंदिरा गांधी ने सार्वजनिक रूप से कभी अपनी भावनाओं को इस तरह नहीं दिखाया, जबकि आप और आपकी अम्मा सार्वजनिक रूप से रोती हैं। उन्होंने जवाब दिया कि एक नेता को त्रासदी के बीच भी मजबूत दिखाई देना चाहिए, क्योंकि जनता अपने नेता में आश्वासन और ताकत देखना चाहती है। उनका तर्क था कि नेता के आँसू जनता को यह भरोसा नहीं देते कि वह संकट संभाल सकता है।

बेनज़ीर भुट्टो कहती थीं कि क्रिश्चियनिटी के मुकाबले इस्लाम एक युवा धर्म है और इसलिए उसमें युवाओं जैसी भावनाएँ भी हैं। उनकी आवाम उन्हें रोते हुए देखकर उनके दुख में शरीक होती है। लेकिन व्यक्तिगत रूप से वह बहुत मजबूत और निडर महिला थीं।

निडरता की बात करें तो राहुल गांधी भी डरते नहीं हैं। “जो डर गया, सो मर गया।” मेरे हिसाब से मोदी और शाह के व्यक्तित्व में एक चीज़ नहीं है- वह है निडरता।

धन्यवाद सर! इतना बेहतरीन तरीके से समझाने के लिए कि किस प्रकार देश बदला है, देश की पत्रकारिता बदली है और किस प्रकार ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह आगे भी बढ़ाया जाए! साथ ही, हमें रबर की स्पाइन नहीं चाहिए। कभी-कभी गलत को गलत कहने के लिए अपना तीसरा नेत्र भी खोलना चाहिए।

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