दिवाकर झा-
प्रिंट मीडिया के लिए आघात पहुंचाने वाली खबर… जरा सोचिए.. भविष्य का क्या होगा?
अख़बारों के लिए ये संक्रमण काल है. डिजिटल युग में उंगलियों की ज़ुम्बिश पर सारी दुनिया की ख़बरें हैं. अख़बार ख़रीद कर शायद ही अब कोई GenZ पढ़ता हो. न ही वो न्यूज़ चैनल्स देखते हैं. बस पुरानी पीढ़ी के कम ही लोग हैं जिनकी अख़बार पढ़ने की आदत छूटी नहीं हैं. लेकिन सिर्फ़ उनके दम पर ही कब तक अख़बार छापे जाएंगे. सांध्य टाइम्स का हमेशा के लिए संध्यावसान दिल को दु:खा गया…
17 दिसंबर 1979 से 31 अगस्त 2026…दिल्ली से छपने वाले और कभी ‘दुनिया के सबसे बड़े डेली इवनिंग न्यूज़ पेपर के रूप में मशहूर रहे ‘सांध्य टाइम्स’ पर हमेशा के लिए पर्दा गिर गया है. आज ये आख़िरी बार छपा. इस अख़बार का सफ़र 46 साल 8 महीने चला…
जब ये छपना शुरू हुआ था तो कुछ ही महीनों में इसकी दीवानगी लोगों के सिर चढ़ कर बोलने लगी. मैं उन दिनों में मेरठ में स्कूली छात्र था. अख़बार दिल्ली से छपता था लेकिन तब मेरठ में भी शाम को इसका बेसब्री से इंतज़ार रहता था…
‘सांध्य टाइम्स’ की सफ़लता के कारणों में इसका टेबलॉयड शक्ल में होना, फ्रंट पेज पर उत्सुकता जगाने वाली ऐसी दिलचस्प हैडिंग लगाना, जिसे पढ़ते ही लोग खरीद लें, लोगों की बात, लतीफ़े, फिल्मों का कॉलम, हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा की ओर से सवालों के चटपटे जवाब आदि…
सांध्य टाइम्स को कामयाबी की ऊंचाइयों पर पहुंचाने में इसके समाचार संपादक से संपादक बने दिवंगत सत सोनी का अहम योगदान रहा. दोपहर होते ही दिल्ली में लोगों को हॉकर्स का सांध्य टाइम्स के लिए इंतज़ार रहता था. शुरू शुरू में हॉकर्स को भी ख़ास ट्रेनिंग दी गई कि किस तरह आवाज़ लगा कर लोगों को सांध्य टाइम्स खरीदने के लिए मजबूर किया जाए…
46 वर्षों के बाद टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप का ‘सांध्य टाइम्स ‘आज बंद हो गया । सवाल ये है कि क्या अब बड़े अखबारों के छोटे और जिलेवार संस्करण भी इसी राह पर चल निकलेंगे। चिन्ता इस बात की भी है कि कम पूंजी वाले छोटे अखबारों का क्या होगा। क्या वो एक-एककर बंद हो जाएंगे। क्या इसे प्रिंट मीडिया के बुरे दिनों की शुरुआत मानना चाहिए।
-एके लारी

नवेद शिकोह-
लखनऊ में 35 साल पहले बंद हुआ था “सांध्य टाइम्स”
दिल्ली में आज 45 वर्ष पुराने इस अखबारी इतिहास का हुआ अंत
अखबार की दुनियां आज गमगीन है। 45 वर्षों से दिल्ली की शाम की रौनक “सांध्य टाइम्स” बंद हो गया। टाइम्स ऑफ इंडिया का ये सांध्य समाचार 1980 के दशक में लखनऊ भी इसकी लोकप्रियता का गवाह रहा है। उस जमाने में ये अखबार शाम-ए-अवध की रौनक बनता था। नवभारत टाइम्स के साथ आगे-पीछे उसका सांध्य टाइम्स भी बंद हो गया था। लखनऊ में जागरण चौराहे के पास भार्गव होटल के सामने टाइम्स ऑफ इंडिया के पुराने आफिस में ही नवभारत टाइम्स और साध्य टाइम्स का आफिस था। टैबलेट साइज़ का आठ पेज ब्लेक एंड व्हाइट सांध्य टाइम्स की कीमत पचास पैसे थी। शाम को हर चाय के होटल से लेकर साइकिल पंचर की दुकान में ये अखबार दिखता था। शाम की खबरों का राजा कहलाने वाले इस साध्य समाचार की खबरों पर खूब चर्चाएं होती थी।
इसके संपादक घनश्याम पंकज थे। उस जमाने में अखबार की दुनिया के शोमैन कहे जाने वाले घनश्याम पंकज सांध्य टाइम्स के संपादक थे। इसके बंद होने के बाद पंकज जी स्वतंत्र भारत चले गए थे। और उस जमाने के चर्चित अखबार स्वतंत्र भारत को उन्होंने एक मॉर्डन सूरत दी और अखबार के साथ साप्ताहिक परिशिष्ट “उपहार” का चलन शुरू किया था।
सांध्य टाइम्स अखबार बंद होने के बाद नवभारत टाइम्स भी बंद हो गया। और फिर यहां के कर्मचारियों/पत्रकारों ने अपने हक के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी।
फिर करीब ढाई दशक के बाद लखनऊ से पुन: नवभारत टाइम्स का प्रकाशन प्रारंभ हुआ।


