Connect with us

Hi, what are you looking for?

सुख-दुख

टाइम्स ग्रुप का ‘सांध्य टाइम्स’ अख़बार आज शाम आख़िरी बार छपा!

सूनी हो गईं दिल्ली की शामें..सान्ध्य टाइम्स का जानाऽऽऽ..

अमिताभ एस-

आज मेरी उदास शाम है। सान्ध्य टाइम्स बंद हो गया है। आज आखिरी बार छपा। मेरा इससे नाता इसके जन्म के पहले साल से है। इसीलिए मेरे लेखन जीवन में इसका बड़ा योगदान रहा है। मैं आज जिस भी काबिल हूं, सब सान्ध्य टाइम्स की देन है। जितना मान- सम्मान मुझ सान्ध्य टाइम्स की बदौलत मिला, उतना मुझ जैसे मामूली लिखने वालों को कम ही अख़बारों में मिलता होगा।

मुझे कल की तरह याद है – मैं सान्ध्य टाइम्स के ऑफिस टाइम्स हाउस, 7, बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग पहली बार 1980 में दो- दो सीढ़ियां एक साथ लांघ कर उत्साह से लबरेज़ हो कर गया था।
तब मैं स्कूल में पढ़ता था। वहां मेरी पहली मुलाक़ात एडिटर आदरणीय सत सोनी जी से हुई, और मैं हमेशा के लिए उनका छात्र बन गया।

‘क्या सान्ध्य टाइम्स का फिर से छप सकता है ?,’ कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन के बाहर ज़मीन पर अख़बार सजाए एक बुजुर्ग विक्रेता से मैंने आज जानना चाहा, तो वह तपाक से बोला, ‘अपना मोबाइल फेंक दो, तो सान्ध्य टाइम्स फिर शुरू हो जाएगा..’ वाकई बात तो सही है। कलाई घड़ी, कैलकुलेटर, ट्रांजिस्टर जैसी हमारी ज़िंदगी की कभी कई ज़रूरी चीज़ें मोबाइल पहले ही निगल चुका है, लेकिन सोचा न था कि एक शाम सान्ध्य टाइम्स की बारी आ जाएगी।

17 दिसंबर 1979 में पहली बार हाथ में आया था, तो दिल्ली वालों ने सिर आँखों पर बैठा लिया। इसकी पहली संपादकीय टीम में, प्रधान संपादक नवभारत टाइम्स के साथ ही आनंद जैन जी थे। समाचार संपादक सत सोनी जी थे, और इब्बार रब्बी जी, विष्णु नागर जी, पंकज शर्मा जी, चेतन जैन जी, आदित्य अवस्थी जी समेत कुछ और सदस्य भी थे। सत सोनी जी सबसे लंबे समय तक संपादन किया।

दोपहर ढाई बजे टाइम्स हाउस के पीछे की गली से साइकिलों के आगे- पीछे सान्ध्य टाइम्स के बंडल रखे हॉकर्स दिल्ली की चारों दिशाओं की सड़कों पर तेज रफ़्तार से दौड़ पड़ते। और अखबार शहर भर में फैलते देर नहीं लगती। अखबार की इतनी ललक दिल्ली के इतिहास में किसी सुबह या शाम की अखबार के लिए नहीं रही।

इन गौरवमय 46 साल 8 महीनों में कई दिन ऐसे भी आए, जब संजय गांधी की हवाई हादसे में मृत्यु जैसी ख़बरों की गंभीरता के मद्देनज़र एक ही दिन में सुबह 11 से शाम 4 बजे के बीच सान्ध्य टाइम्स के दो- तीन एडिशन छापने पड़े। इंदिरा गांधी की हत्या वाली सुबह 11 बजे ही 4 पेजों का सान्ध्य टाइम्स और नवभारत टाइम्स का साझा एडिशन बाज़ारों में आ गया था। ऐसा साझा एडिशन फिर कभी नहीं छपा। संयोग ही है कि अब तो नवभारत टाइम्स में ही समाहित हो गया है। कुछ दशक पहले 1990 के सालों में, दिनमान टाइम्स बंद होने के बाद सान्ध्य टाइम्स में समा गया था।

बेशक आना और जाना तो जीवन का दस्तूर है। लेकिन अब से दिल्ली की शामें ज़रूर सूनी- सूनी हो जाएंगी। संडे नवभारत टाइम्स के पूर्व संपादक और 1988 से सान्ध्य टाइम्स से मिले मित्र प्रिय राजेश मित्तल ने शाम मैसेज किया- ‘देख लो आज हमको जी भरके..’

Collage of Hindi newspaper clippings with a man riding a bicycle and reading a newspaper in the foreground; a celebratory front-page headline dominates the center.

फोटो: 17 दिसंबर 2024, सान्ध्य टाइम्स के 45 वें जन्म दिन पर मेरी यात्रा रिपोर्ट..

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन