Connect with us

Hi, what are you looking for?

सुख-दुख

संपादकों के कर्तव्य पर अपनी टिप्पणी में संजय सिन्हा भूल गये कि संपादक नाम की संस्था प्रभाष जोशी के बाद से ही विदा होने लगी थी!

शंभुनाथ शुक्ला-

कल अपने पुराने साथी Sanjay Sinha ने संपादकों के कर्त्तव्य बताये और लिखा कि अब संपादक नहीं होते। पर वे भूल गये कि संपादक नाम की संस्था प्रभाष जोशी के बाद से ही विदा होने लगी थी। यानी 1995 से ही। तब तक राजेंद्र माथुर भी दिवंगत हो चुके थे। रघुबीर सहाय भी नहीं रहे थे। धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी जैसी हस्तियां च्युत हो चुकी थीं। तब ही लगने लगा था कि पत्रकारिता का पतन शुरू हो गया है। संपादक प्रबंधन के आगे लाचार था और जो संपादक बने भी, वे अपना ही पेपर नहीं पढ़ते थे। उनका काम था किसी तरह अखबार से जुड़े पत्रकारों की चेतना को कुचलना। उनका समाचारों की क्वालिटी या उनमें वैल्यू ऐड करने से कोई वास्ता नहीं था। कितने संपादकों ने तो अगले दिन पिछले रोज का संपादकीय छाप दिया। क्योंकि उनको संपादकीय लिखना आता ही नहीं था।

मालिक और प्रबंधन के समक्ष नत संपादकों से किस तरह की निष्पक्ष पत्रकारिता की उम्मीद की जा रही है। यूँ मन बहलाने के लिए यह ख़याल अच्छा है कि हम भी कभी संपादक थे। राजनीतिकों के घर हाज़िरी देने का क्रम तो 1990 के बाद से ही शुरू हो गया था।

मेरे विचार से एक अच्छा संपादक वह नहीं है जो अपने ही अखबार में धुंधाधार लिखता रहे। संपादक को अपना ही लेखन पढ़ाने की जरूरत नहीं पढ़ती और उसके विचारों की अभिव्यक्ति के लिए संपादकीय तो हैं ही, एक अच्छा संपादक वह है जो अच्छे लेखक तैयार करे। जो लोगों को लिखने के लिए विवश करे। प्रभाष जी के समय के जनसत्ता का योगदान यही है कि उसने लिखने और पढ़ने वालों की एक पूरी पीढ़ी तैयार की। आज भी तमाम जगह मुझे ऐसे आईएएस और आईपीएस मिल जाते हैं जो अब विभिन्न सरकारी विभागों में सचिव या इसके ऊपर के स्तर के अधिकारी हैं अथवा पीएसयू में ईडी, सीएमडी हैं। वे बताते हैं कि उन्होंने अपनी परीक्षा की तैयारी जनसत्ता पढ़कर की थी। मगर अब हिंदी और बहुत हद तक अंग्रेजी के अखबार भी ऐसा वर्ग नहीं तैयार कर पा रहे। यह एक दुखद अध्याय है। ठीक इसी तरह न्यूज चैनलों का एक अच्छा एंकर वह है जो खुद कम बोले अपने अतिथियों को बोलने का मौका ज्यादा दे। पर कम से पत्रकारों को बुलाये। संघ, बीजेपी, कांग्रेस के पेड वर्करों को बतौर पत्रकार न प्रस्तुत करे। मूर्खों में तो काना भी राजा होता है!


देवप्रिय अवस्थी-

संजय के पोस्ट पर मैंने टिप्पणी की थी – इस पोस्ट में इस बात का भी उल्लेख होना चाहिए कि संपादक बनता कौन है, संपादक बनाता कौन है और बनाया क्यों जाता है?

मैंने ऐसे संपादक भी देखे हैं जो सिर्फ बड़ा नाम होने के कारण संपादक बनाए गए. उनके संस्थान को सिर्फ उनका नाम चाहिए था, काम तो दूसरों से लेना था या दूसरों को करना था. इस व्यवस्था से उन संपादक महोदय को भी कोई दिक्कत नहीं थी. उन्हें अपने नाम के इस्तेमाल के एवज में ठीक-ठाक रकम जो मिल रही थी. वह संस्थान दैनिक भास्कर समूह था जिसने अपना जयपुर संस्करण शुरू करने के समय कमलेश्वर जी को संपादक बनाया था. वे महीने में सिर्फ चार-पांच दिन के लिए जयपुर जातें थे. भास्कर प्रबंधन को कमलेश्वर जी का चार-पांच दिन के लिए जयपुर जाना भी भारी पड़ता था क्योंकि उनके आने -जाने और ठहरने की व्यवस्था उसे करनी होती थीं.

नामवर सिंह का राष्ट्रीय सहारा और विद्यानिवास मिश्र का नवभारत टाइम्स का संपादक बनना भी कुछ ऐसा ही था. कमलेश्वर, नामवर सिंह और विद्यानिवास मिश्र की विद्वता पर मुझे किंचित भी संदेह नहीं है, लेकिन दैनिक अखबार के संपादक में जो मूलभूत योग्यता/गुण जरूरी होते हैं, वे योग्यता/गुण उनमें नहीं थे.

वरिष्ठ पत्रकार संजय सिन्हा की टिप्पणी पढ़ें-

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन