आज की कुछ दिलचस्प खबरें : 1) हाईकोर्ट कह रही है आपजेन जी नहीं हैं – समझना मुश्किल है कि इसका ऐसा क्या महत्व है कि यह शीर्षक है। 2) हवा बिगड़ी : दिल्ली में ग्रैप-1 लागू – खबर यह होती कि सरकार ने दिल्ली की हवा ठीक करने के लिए क्या किया 3) बिना पीयूसी दिल्ली में नहीं चलेंगे वाहन – हवा ठीक करने के लिए सारा जोर वाहनों पर ही है। बाकी कसर पंजाब में पराली जलाने पर। सरकारी, सेना और पुलिस की तमाम पुरानी गाड़ियां चल रही हैं जो आम जनता की होती तो कंडम कर दी जाती। आम जनता की गाड़ियां तो पहले भी बिना PUC नहीं चलती हैं। पता नहीं अब सेना की नहीं चलेगी या पुलिस की। 4) दिसंबर 2029 तक देश नशे से मुक्त होगा – अभी तक नशे में क्यों था यह बताना चाहिए और यह भी कि 2029 में क्यों 2047 में क्यों नहीं? चुनाव है इसलिए?
संजय कुमार सिंह
अमेरिका के साथ भारत के व्यापार करार की खबर लगातार तीन दिन से पहले पन्ने पर है। मंगलवार, 20 अक्तूबर को दि इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक था, दौरे से ठीक पहले, रुबियो ने रूस पर लगे प्रतिबंधों में ढील को भारत-अमेरिका समझौते से जोड़ा। खबर थी कि अमेरिकी विदेश मंत्री का यह दौरा वीजा पाबंदियों और टैरिफ को लेकर बढ़े तनाव के बीच हो रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने तब कहा था, भारत के साथ व्यापार करार को इसी समय अंतिम रूप देने की कोशिश कर रहा हूं… हम बेहद करीब हैं। अगले दिन यानी कल टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक था, भारत और अमेरिका रक्षा व ऊर्जा संबंधों को मजबूत करेंगे; रुबियो ने कहा व्यापार समझौता होने वाला है। आज टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ दि इंडियन एक्सप्रेस की भी लीड इसी करार की खबर ट्रम्प के हवाले से है। खबर के अनुसार, ट्रम्प ने कहा है, भारत के साथ करार पर्याप्त करीब है, अलग (खास) होगा।
इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक भी लगभग यही है। पांच कॉलम के शीर्षक में बताया गया है कि भारत के साथ व्यापार करार पर ट्रम्प बोल रहे हैं। भारत की ओर से कुछ खास नहीं है और यह समझना मुश्किल है कि तीन दिन की ये खबरें सामान्य है या कुछ खास। भारत के साथ करार के लिए अमेरिकी विदेश मंत्री आए हुए हैं लेकिन मुंबई में और अंबानी की मेजबानी में हैं। भारत सरकार इसमें कहां है या कहीं दिख ही नहीं रही है। भिन्न दलों में रहे एक पूर्व सांसद ने लिखा है, दुनिया के सबसे ताक़तवर देश का विदेश मंत्री भारत के एक उद्योगपति से मिलने उसके दरवाज़े पर आता है। यह अमेरिका की क्षीण होती शक्ति और भारत की बढ़ती ताक़त का सबूत है। एलॉन मस्क आज और कुंठित होंगे। उनकी कुंठा बढ़ाने के लिए यह ख़बर काफी है कि अमेरिका को टेक्सास रिफ़ाइनरी के लिए पूंजी और टेक्नोलॉजी चाहिए और उसे यह मुहैया कराने की ज़िम्मेदारी रिलायंस ने ली है। ये नया भारत है!
तथ्य यह भी है कि भारत में नया निवेश नहीं है, बेरोजगारी के साथ अर्थव्यवस्था की स्थिति भी खराब है। एलन मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भारत में अपनी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा ‘स्टारलिंक’ को लाइसेंस मिलने में हो रही देरी और व्यावसायिक बाधाओं को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी थी। अपने पोस्ट में आरोप लगाया था कि भारत के बाजार में स्टारलिंक की एंट्री को कुछ खास लोगों द्वारा जानबूझकर रोका जा रहा है, ताकि वे अपना एकाधिकार बनाए रखें। उन्होंने इस देरी को “भारत के लोगों के खिलाफ अपराध” करार दिया था। भारतीय नीतियों पर अपनी इस टिप्पणी के बाद भारत में स्टारलिंक की एंट्री और लाइसेंसिंग में हो रही देरी को लेकर भी लिखा था। इसमें उन्होंने परोक्ष रूप से मुकेश अंबानी और उनकी कंपनी जियो पर निशाना साधा था। अंग्रेजी में उन्होंने जो लिखा वह मोटे तौर पर इस प्रकार था, प्रिय प्रधानमंत्री अंबानी, कृपया मेरी विनम्र माफी स्वीकार करें कि मुझे यह अहसास ही नहीं हुआ कि आप भारत के असली बॉस हैं।
इस लिहाज से भारत के साथ अमेरिका के व्यापार करार के लिए अमेरिकी विदेश मंत्री का मुंबई में होना अटपटा है। स्टारलिंक को अनुमति में देरी और अमेरिकी प्रयासों की प्रशंसा में भारत और यहां के लोगों के हित कहां हैं? खासकर तब जब भारती एयरटेल के चेयरमैन सुनील भारती मित्तल ने एलन मस्क के आरोपों पर स्पष्ट किया है कि सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं की मंजूरी के मामले में उनकी कंपनी कतार में एलन मस्क से काफी आगे है। उन्होंने बताया कि उनकी कंपनी ने इसके लिए 5 साल पहले आवेदन किया था, उनका ग्राउंड नेटवर्क पिछले 3 साल से तैयार है और उनके सैटेलाइट्स भी पिछले 5 वर्षों से भारत के ऊपर चक्कर लगा रहे हैं। मित्तल ने कहा था कि जब वे खुद इतने लंबे समय से सरकारी मंजूरियों का इंतजार कर रहे हैं, तो एलन मस्क को किस बात की जल्दी है। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि उन्हें स्टारलिंक से कुछ दिन पहले भी अनुमति मिल जाती है, तो उन्हें बहुत खुशी होगी। इस तरह सुनील मित्तल ने यह साफ किया था कि भारत में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड बाजार में एंट्री के लिए केवल स्टारलिंक ही नहीं, बल्कि भारतीय कंपनियां भी पूरी तरह तैयार हैं और सभी को तय नियामक प्रक्रियाओं और सुरक्षा जांचों से गुजरना पड़ रहा है।
स्पष्ट है कि देरी भारत सरकार के कारण हो रही है। एलन मस्क सरकार की आलोचना कर सकते थे कर दी। सुनील मित्तल ने मौके का फायदा उठाया और अपना दावा भी ठोंक दिया। इससे यह बात तो सार्वजनिक हो ही गई कि भारत में काम करने के लिए विदेशी कंपनियों को ही नहीं, देसी कंपनियों को भी परेशानी होती है और यह ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के बाद है। अगर अनुमति देनी है तो दी जाए नहीं तो मना कर दिया जाए। पांच साल से ज्यादा आवेदन लटका कर रखने का कोई मतलब नहीं है और इससे उद्योग जगत में भारत को लेकर खराब संदेश जाएगा। भारत पहले भी लाल फीताशाही के लिए बदनाम रहा है और इन उदाहरणों से साफ है कि स्थिति में कोई सुधार नहीं है और यह देश हित में तो नहीं ही हो सकता है लेकिन खबरें स्पष्ट नहीं होती हैं। आपको पूरी बात नहीं बताती हैं। सरकार परेशानी में है तो वह भी खबर तो है ही।
लगातार तीन दिनों तक अमेरिकी सूत्रों से एक ही बात (समझौता ‘बेहद करीब’ है) छपना इस बात का संकेत हो सकता है कि अमेरिका भारत सरकार के खिलाफ घरेलू स्तर पर या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खास तरह का माहौल बनाना चाहता है। अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा इसी समय केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी और जेफ्री एप्सटीन की अकेले में मुलाकात की पुरानी फोटो जारी करना मामले को और संदिग्ध बनाता है लेकिन इसपर जैसी खबर होनी चाहिए, नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि इसका मकसद भारत सरकार पर या भारतीय पक्ष पर मनोवैज्ञानिक दबाव और सौदेबाजी के लिए अनुकूल स्थिति बनाना हो सकता है। सरकारी खेमे में चुप्पी या बयानबाजी न होना सौदे में देरी का संकेत है लेकिन जल्दी निर्णय लेने के लिए मजबूर करने के इरादे से इस तरह की खबरें छपवाई जा रही हो सकती है।
भारत सरकार अभी तक हेडलाइन मैनेजमेंट में उस्ताद मानी जाती रही है लेकिन अब लग रहा है कि सरकार पिछड़ रही है। आज की इस एक खबर से भारत सरकार की साख पर भारी असर पड़ेगा। इसके अलावा जो खबरें हैं उससे लगता है कि सरकार के पास नया कुछ नहीं है। द हिन्दू की लीड जरूर बताती है कि खास उद्योगों का विकास ऐतिहासिक तौर पर ज्यादा है और यह 7.9% है। लेकिन विरोधियों को परेशान करने की भाजपाई कोशिशें जारी हैं। अब सुप्रीम कोर्ट से स्टे मिल गया वह खासतौर पर रेखांकित करने लायक है। शीर्षक है, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ रिश्वत की शिकायत को सुप्रीम कोर्ट ने सप्ताह भर के लिए स्टे कर दिया। यही नहीं, एक खबर बताती है कि दिमाग लगाए बगैर पीएसए के तहत डिटेंशन आदेश जारी करने वाले श्रीनगर के डीजी को हाईकोर्ट ने समन किया है।
हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड लगभग वही है जो अमर उजाला की है। चार कॉलम की लीड का शीर्षक है, तापमान गिरते ही दिल्ली एनसीआर में खराब हवा का दौर शुरू, ग्रैप-1 लागू। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, प्रदूषित हवा का मौसम शुरू : दशहरा के बाद प्रदूषण बढ़ने से एक्यूआई ‘पुअर’ (खराब) की श्रेणी में पहुंचा। अंग्रेजी अखबारों में दि एशियन एज की लीड ट्रम्प की अमेरिकी खबर है जबकि पहले पन्ने की दो और खबरें उल्लेखनीय है। अखबार में आज सेबी का आधे पन्ने का विज्ञापन है इसलिए खबरें कम हैं। एक खबर का शीर्षक है, राहुल गांधी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को “सिर्फ पुरुषों का संगठन” कहा, भाजपा ने उनकी टिप्पणी को बचकाना कहा। कहने की जरूरत नहीं है कि कोई भी जानता है कि इसमें सच क्या है। यह भी दिलचस्प है कि प्रधानमंत्री ने सेंगोल बनाने वाले जौहरी के निधन पर शोक जताया है। नरेन्द्र मोदी ने सेंगोल को महत्व दिया था तो उसके जौहरी के निधन पर शोक जताना बनता है। लेकिन पहले पन्ने की खबर दिलचस्प है।
द टेलीग्राफ की लीड पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के बाद की पहली दुर्गा पूजा पर मुख्यमंत्री के नए आदेश की खबर है। खबर के अनुसार उन्होंने पुलिस से कहा है कि देवी मां (की मूर्ति विसर्जन के लिए) ले जाने वालों के नाम नोट किए जाएं और मूर्ति को वही छू सकते हैं जो सनातनी हैं या सनातन धर्म को मानते हैं। अव्वल तो यह सब मुख्यमंत्री का काम नहीं होना चाहिए पर मुख्यमंत्री ने कहा है तो खबर है ही। हिन्दी अखबारों में नवोदय टाइम्स की लीड अमेरिकी विदेश मंत्री का कहा ही है लेकिन भारत के मतलब का है। शीर्षक है, भारत की कीमत पर पाक-चीन से रिश्ते नहीं। दैनिक भास्कर की लीड जियो का आईपीओ 35 मिनट में पूरा हो जाने की खबर है। अमर उजाला ने 100 मिनट में ही पूरा सब्सक्राइब होने की खबर दी है। देशबन्धु में सौरव और आशुतोष रांका को जमानत मिलने की खबर है लीड है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



