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पत्रकारों की प्रतिक्रियाएं पढ़ें- अर्णव ने अतिवादी पत्रकारिता की तो मुंबई पुलिस ने अतिवादी पुलिसिंग!

अर्नब ने टीवी पत्रकारिता का जो स्वरूप बना दिया वैसा दुनिया के किसी समाचार चैनल पर नहीं होता। मर्यादा की सीमा लांघने के दुष्परिणाम तो होते ही हैं। पुलिस और अर्नब दोनों ने लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन किया है। –विनीत नारायण (कालचक्र वीडियो न्यूज़ के माध्यम से 1989 में भारत में स्वतन्त्र हिंदी टीवी पत्रकारिता के संस्थापक)

अर्णब की गिरफ़्तारी निंदनीय है. जब प्रोफ़ेसर्स, डॉक्टर्स, वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को अर्बन नक्सल बता कर गिरफ़्तारी की जा रही थी, उस समय अगर चुप ना रहते तो आज अर्णब भी गिरफ्तार नहीं होते. अगर कन्हैया को गिरफ्तार होने पर खुश होने की बजाए लोकतंत्र और अपने छात्र और नौजवानों के साथ खड़े होते तो यह दिन ना देखना पड़ता. जब विनोद वर्मा को रमन सिंह की पुलिस ग़ाज़ियाबाद से उठा रही थी, सड़कों पर उतरते तो अर्णब आज हिरासत में नहीं होते. अब भी देर नहीं हुई है, ज़ुल्म के ख़िलाफ़ बोलिए, नहीं तो अगला नंबर आपका है. अपना तो पिछले महीने गुजरात में आ चुका है. -श्याम सुंदर

पत्रकारिता के सिद्धांत तो छोड़िये पत्रकारिता के हर नियम की धज्जियां उड़ाने वाले अर्णव गोस्वामी का चैनल और उनके समर्थक अब बाकी मीडिया से उम्मीद कर रहे हैं कि वे इस गिरफ्तारी के खिलाफ आवाज उठाएं। वैसे तो मुंबई पुलिस और अर्णव दोनों ही अतिवादी मोड में हैं इस समय। वैसे अभी अर्णव की गिरफ्तारी बरसों पुराने किसी और मामले में हुई बताई जा रही है। -ममता मल्हार

आप सारी जमात से दुश्मनी नहीं कर सकते हैं, सत्ता का नशा तब आपको नहीं होना चाहिए जब तक सत्ता आपकी अपनी न हो…अर्णव गोस्वामी 2014 से पहले ऐसे नहीं थे…बिल्कुल इसके उलट थे.योगी और मोदी पर उनकी टिप्पणी यूट्ब पर भी सुन सकते है लेकिन जब सत्ता बदली तो अर्णव गोस्वामी भी बदल गए..संवैधानिक पद पर बैठे लोगों को ललकारना बेहद ग़लत बात है…मीडिया में कभी नहीं सिखाया गया कि आप ख़बर बनाते बनाते ख़ुद सबजेक्ट बनिए. – अभिषेक शांडिल्य

अर्णबगोस्वामी को बिना पूर्व नोटिस, सुबह सुबह एक आतंकवादी की तरह गिरफ्तार किया जाना और घसीटकर ले जाया जाना फासिज्म का नमूना है। इस गिरफ्तारी पर वो सारे चुप हैं जो पिछले 6 साल से देश में इमरजेंसी का रोना रो रहे हैं। वो सब चुप रहेंगे क्यूं उनको हूंबोहूंबो करने की आदत है। वो सब चुप रहेंगे जिनको अर्णब की तरक्की पसंद नहीं है और वो सब भी चुप रहेंगे जिन्हें अगर अर्णब कल बुलाकर अपने चैनल में नौकरी दे दें तो चुपचाप गुलगुले खा लें। ये चुप्पी खतरनाक है। सब आएँगे जद में। सरकारों को शर्म आनी चाहिए। –अनुरंजन झा

कर्मदंड सबको भुगतना पड़ेगा और भुगतना चाहिए. पत्रकार पर पुलिस ज़्यादती की हम भी निंदा करते हैं लेकिन पत्रकार की अपत्रकारिता की भी निंदा करनी चाहिए. –समीरात्मज मिश्रा

अर्नब गोस्वामी की अंतत: एक ऐसे केस में गिरफ्तारी हुई, जिसे पुलिस पहले बंद कर चुकी थी और वह भी एकदम गलत तरीके से! एनकाउन्टर विशेषज्ञ जाते हैं और एके ४७ से लैस पुलिस के अधिकारी एक अर्नब को हिरासत में ले लेते हैं. जो दूर यहाँ बैठे हैं, उनमें से अधिकतर प्रसन्न हैं. अभिव्यक्ति की आज़ादी का राग गाने वाले लोग एकदम शांत हैं, वह साथ आ रहे हैं, तो किसी न किसी किन्तु परन्तु के साथ! परन्तु यह किन्तु परन्तु नहीं चलेगा! अर्नब गोस्वामी को पहले एक झूठे टीआरपी घोटाले में फंसाया और फिर आज यह! अर्नब गोस्वामी छूट आएँगे, ऐसा नहीं है कि उन्हें अधिक दिन जेल में रख पाएंगे! परन्तु वह दूसरी बात है! पहली बात यह है कि एक लेखक के रूप में आज मुझे अफ़सोस हो रहा है कि जो आवाजें उठीं वह तब उठीं जब चुप्पी पर प्रश्न चिन्ह लगा. एक लेखक और एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हम सभी अपने अपने शब्दों की ताकत जानते हैं, और उसी के अनुसार कार्य करते हैं. न ही अर्नब ने कुछ ऐसा किया था जिससे देश की अखंडता पर प्रहार हुआ था, क्या पालघर और सुशांत का मुद्दा उठाना इतना बड़ा अपराध है कि उसके लिए पहले झूठा मामला बनाया जाए और फिर उसमें असफल होने पर पुराने बंद मामले में जेल ले जाया जाए! यदि कुछ गलत किया है, तो वह सामने आए न! यदि मेरा लेखन देश तोड़ने वाला है, तो वह संविधान के दायरे में आएगा, यदि मैंने तथ्यों को तोड़ामोड़ा है, तो वह भी दायरे में आएगा, परन्तु अभी कुछ ही दिन पहले हमने देखा कि कैसे दिल्ली दंगों पर लिखी गयी तथ्यपरक पुस्तक को लौंच होने से रोका गया. जबकि उससे कुछ दिन पहले शाहीन बाग़ के महिमामंडन पर एक पुस्तक आ गयी थी, और हमें याद रखना चाहिए कि शाहीन बाग की आलोचना स्वयं उच्चतम न्यायालय ने की है.
परन्तु ऐसा कोई भी मामला अर्नब गोस्वामी के मामले में नहीं है, क्योंकि इसमें पहले के बंद मामले को दोबारा खोला गया है! तरीका गलत है! यह गलत है! और इसके तरीके का विरोध करिए! यह अर्नब का साथ नहीं बल्कि लोकतंत्र और स्वतंत्र आवाज़ का साथ देना है! आपने जो आज गलत किया है, उसके लिए यदि आप कुछ मामला न खोज पाए तो आप पुराने मामलों के आधार पर जेल भेजेंगे! यह दमन है और एक लेखक के रूप में मैं इस दमन के खिलाफ हूँ, मैं इस तरीके के खिलाफ हूँ, मैं आवाज़ दबाने वाली इस दमनात्मक प्रक्रिया के खिलाफ हूँ!
असहमति का अर्थ इस प्रकार की दमनात्मक प्रक्रिया नहीं होती, आज वह है, कल हममें से भी कोई हो सकता है, जो आज हंस रहे हैं, कि ठीक हुआ वह कल अपने साथ नाखून टूटने पर सबसे पहले रोएंगे! अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक तरफ़ा राग नहीं हो सकता है! मैं इन आँखों को कभी नहीं भू सकती हूँ, यह हम सबकी ओर प्रश्न उठाते हुए पूछ रही हैं, कि चुप रहने का प्रश्न नहीं है! –सोमाली मिश्रा

कल जब तुम्हारा नंबर आएगा तो यही पत्रकार बिरादरी विभाजित मिलेगी… पत्रकारिता में अधिनायकवाद की शुरूआत हो चुकी है! पत्रकारों आप अच्छी या बुरी पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा खींचकर आज मंद-मंद मुस्काराओ और “अर्णब को बोलो कि तुम भांड में जाओ”,पर जब कल जब तुम्हारा नंबर आएगा तो यही विभाजित पत्रकार बिरादरी तुम्हारे सामने होगी! अर्णब की पत्रकारिता मुझे पसंद नहीं, पर उसकी गिरफ्तारी का विरोध करता हूं। अगर यह देश “टुकड़ा-टुकड़ा गिरोहबंदी” और सेकुलर गिरहकट पत्रकारिता को बर्दाश्त कर सकता है, तो अर्णब क्या बुरा था! अर्णब को गिरफ्तार कर तुमने पत्रकारिता में अधिनायकवाद को जन्म दिया! अर्णब डरेगा नहीं, क्योंकि उसने पत्रकारिता का डीएनए बदलकर उसके मुताबिक खुद को ढाल लिया है! अब देश का एक बड़ा हिस्सा उसमें नायक तलाशेगा,भलेही तुम उसे विकृत पत्रकारिता की मिसाल समझो! जेल से रिहा अर्णब तुम पर ज्यादा भारी पड़ेगा! प्रतिरोध ! विरोध! –तरुण कुमार तरुण

मूल खबर- अर्णब को पीटते हुए गिरफ्तार कर ले गई पुलिस!

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2 Comments

2 Comments

  1. राहुल सिसौदिया

    November 4, 2020 at 12:19 pm

    पत्रकार अर्णव को गिरफ्तार करना गैर कानूनी हैं। क्योकि जिस केस में अर्णव की गिरफ्तरी हुई हैं बो पहले ही खत्म हो चुका हैं। महाराष्ट्र सरकार पत्रकारों के खिलाप षड्यंत्र रच रही हैं।। आज अर्णव के साथ हुआ हैं ऐसा ही किसी भी पत्रकार के साथ हो सक्ता हैं मेरा मानना हैं सभी पत्रकारों को एक जुट होना चाहिए।।
    राहुल सिसोदिया
    न्यूज वर्ल्ड चैनल मप्र-

  2. अखिलेश कुमार मौर्य

    November 4, 2020 at 12:42 pm

    अर्नब की गिरफ्तारी पर बिरादरी के कुछ लोग खुशी मना रहें हैं। इस बिरादरी में बड़ा-छोटा पत्रकार बनने की होड़ ज्यादा आपसी एकता कम है। पत्रकार पर पुलिस हमेशा हावी रही है वजह भी साफ मीडियाकर्मी के लिए कोई अलग कानून नहीं। पत्रकार कभी गोली खाता है कभी दो कौड़ी सा बन सिपाही दर्शाया धकियाया जाता है। पत्रकारिता के सिध्दांतों की बात करने वाले तथाकथित पत्रकार पहले अपने गिरेबान में झांकें। सबको आज साथ खड़ा होना चाहिए अन्यथा कल तुम्हारे साथ कौन खड़ा होगा।

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