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अर्नब मामले में एक नया कुतर्क

-संजय कुमार सिंह-

बात-बात पर हत्या करवाने वाले आत्महत्या के लिए मजबूर किए जाने के मामले में कार्रवाई से हिल गए लगते हैं। कुछ भक्त मित्र दलील दे रहे हैं कि एक बार बंद कर दिए गए मामले को पुलिस दोबारा नहीं खोल सकती है। इसके लिए अदालत की अनुमति चाहिए। मुझे नहीं पता वास्तविक कानूनी स्थिति क्या है लेकिन उसके बिना इसे ऐसे देखिए कि पुलिस ने किसी मामले को दबाव में या लापरवाही या नालायकी में या रिश्वत लेकर बंद कर दिया तो उसकी जांच होगी ही नहीं? या अदालत से अनुमति कैसे मिलेगी? अदालत को क्यों अनुमति देना चाहिए? जाहिर है, अगर ऐसा नियम है तो गलत है और उसे ठीक किया जाना चाहिए। लेकिन इन दिनों ना अपनी ना जनहित की फिकर है।

मुझे लगता है कि नियम यह होगा कि पुलिस को अदालत को यह बताना होगा कि वह मामले को क्यों शुरू कर रही है। और यह होना ही चाहिए। मजाक नहीं है कि पुलिस मामले को बंद कर दे और फिर खोल दे। इसलिए अदालत का आदेश जरूरी है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पुलिस बंद मामले की जांच कर ही नहीं सकती है। नई शिकायत पर कार्रवाई कौन करेगा? अदालत, पुलिस या सरकार? जाहिर है, बंद किए जा चुके मामले में पीड़ित के अदालत जाने का कोई मतलब नहीं है। शिकायत सरकार औऱ पुलिस से ही की जाएगी और पुलिस ही देखेगी कि मामला फिर खोलने का आधार है कि नहीं। लेकिन भक्ति और भक्त मीडिया …. ।

इस मामले में उल्लेखनीय है कि पीड़ित की बेटी ने महाराष्ट्र के मौजूदा गृहमंत्री से शिकायत की थी और संभव है उसकी बातों में मंत्री को दम लगा हो और जांच के आदेश दिए गए हों। इसके लिए मंत्री की प्रशंसा की जानी चाहिए। टीवी एंकर या सरकार का समर्थक लोगों के पैसे मार ले यह तो नहीं ही होना चाहिए। और जांच से क्यों भागना। पर्याप्त सबूत मिल जाएंगे तो अनुमति ली जाएगी। पर बिना गिरफ्तारी जांच कैसे होगी और आधार है तो गिरफ्तारी क्यों अनुचित है।

इन सबसे ऊपर, ये सारी बातें अदालत में रखी जा सकती हैं और उसके फैसले का इंतजार किया जाना चाहिए। 24 घंटे में ही सारे तर्क तर्क-कुतर्क रख देना क्यों जरूरी है? हो सकता है यह सब लोगों के दिमाग में यह भरने के लिए किया जा रहा हो कि शिवसेना की सरकार मनमानी कर रही है ताकि उसके खिलाफ राज्यपाल को नीन्द से जगाकर नया आदेश जारी करवाने का माहौल बनाया जा सके। आखिर राज्यपाल से भी तो अनुमति लेनी होगी। और वह बिना खबर, बिना माहौल कहां संभव है?

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