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मजीठिया वेतनमान : जब उम्मीद खत्म हो जाए तब होता है न्याय

यह इंडिया है. यहां न्याय तब मिलता है जब आप न्याय की उम्मीद छोड़ दें। दूसरे शब्दों में कहें तो कानून पूंजीपतियों की रखैल है जो अपने सुविधा अनुसार कानून की परिभाषा बदलवा देते हैं या पैसे के दम पर सुनवाई १० साल से २० तक टलती रहती है। वहीं सरकार की बात करें तो वह आरोपी को विचाराधीन कैदी बनाकर ही फैसले से पहले ही सजा दे दे। कुल मिलाकर कहें तो कानून एक वर्ग के लिए ही हितकारी है। शेष को न्याय मिलते सालों लग जाते हैं। कुछ ऐसा ही हाल मजीठिया वेतनमान को लेकर है। पहले सुप्रीम कोर्ट में इस पर बहस चली कि मजीठिया वेतनमान वैध है या अवैध। ४ सालों की बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्टे नहीं दिया फिर भी अधिकांश प्रेस मालिकों में कोर्ट में मामला बताकर इस संबंध में कोई विचार नहीं किया। जब कोर्ट का फैसला आ गया तो प्रेस मालिकों ने साफ कह दिया हम मजीठिया वेज नहीं देंगे, जो करना है कर लो। अब अधिकांश पत्रकार कोर्ट गए। वहीं भारत सरकार ने इन उद्योगपतियों के आगे घुटने टेक दिया और शिकायत के बाद भी इस संबंध में कोई पहल नहीं की।

यह इंडिया है. यहां न्याय तब मिलता है जब आप न्याय की उम्मीद छोड़ दें। दूसरे शब्दों में कहें तो कानून पूंजीपतियों की रखैल है जो अपने सुविधा अनुसार कानून की परिभाषा बदलवा देते हैं या पैसे के दम पर सुनवाई १० साल से २० तक टलती रहती है। वहीं सरकार की बात करें तो वह आरोपी को विचाराधीन कैदी बनाकर ही फैसले से पहले ही सजा दे दे। कुल मिलाकर कहें तो कानून एक वर्ग के लिए ही हितकारी है। शेष को न्याय मिलते सालों लग जाते हैं। कुछ ऐसा ही हाल मजीठिया वेतनमान को लेकर है। पहले सुप्रीम कोर्ट में इस पर बहस चली कि मजीठिया वेतनमान वैध है या अवैध। ४ सालों की बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्टे नहीं दिया फिर भी अधिकांश प्रेस मालिकों में कोर्ट में मामला बताकर इस संबंध में कोई विचार नहीं किया। जब कोर्ट का फैसला आ गया तो प्रेस मालिकों ने साफ कह दिया हम मजीठिया वेज नहीं देंगे, जो करना है कर लो। अब अधिकांश पत्रकार कोर्ट गए। वहीं भारत सरकार ने इन उद्योगपतियों के आगे घुटने टेक दिया और शिकायत के बाद भी इस संबंध में कोई पहल नहीं की।

कर्मचारियों पर भरोसा नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने सभी को न्याय दिलाने के उद्देश्य से २८ अप्रैल २०१५ को श्रम विभाग को जांच के आदेश दिए जो सराहनीय है लेकिन उक्त मामले में पीड़ित पत्रकार खुद कोर्ट में प्रूफ के साथ खड़ा है। यहां जिसके खिलाफ शिकायत थी, उस पर कार्यवाही होनी चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट किसी को दोषी नहीं माना और लेबर इंस्पेक्टरों से रिपोर्ट मंगाई। अधिकांश प्रदेशों ने तय अवधि में भी जांच रिपोर्ट नहीं दी, जो दी भी उसमें अधिकांश ने गलत जानकारी दी। कुछ ने प्रेस को नोटिस भेजा और प्रेस ने कह दिया हम तो दे रहे हैं। फिर क्या था श्रम विभाग ने यह रिपोर्ट बनाकर दे दी कि अमुक प्रेस मजीठया वेतनमान दे रहा है। कैसे दे रहा है, कितना दे रहा है, किसका कितना बचा है, वो नहीं पता सर, वह मजीठिया वेतनमान दे रहा है।

कहीं दबाव तो नहीं
उक्त मामले को देखकर ऐसा लगता है कि कही उक्त मुद्दे पर दबाव तो नहीं है। केन्द्र सरकार भी कुछ नहीं कर रही है, राज्य सरकारों ने कोई कदम नहीं उठाया। कोर्ट में मामला विचाराधीन है। ऐसे में पत्रकारों को दिल बैठा जा रहा है। खैर कुछ भी हो पत्रकारों को आज नहीं तो कल न्याय देना होगा। लेकिन सबसे ज्यादा दर्द यह होता है कि पीडि़त कर्मचारी खुद कोर्ट के सामने खड़ा है। सैलरी स्लीप दिखा रहा है कि हमें मजीठिया वेतनमान नहीं मिल रहा है। अनावेदक वकील भी स्वीकार रहा है हम मजीठियाा वेतनमान नहीं दे रहे हैं। फिर उसे सजा क्यों नहीं दी जा सकती। वह अवमानना का दोषी क्यों नहीं है। श्रम विभाग के पास तो अधिकांश प्रेसों का पंजीयन भी नहीं है। कई श्रम अधिकारी यह नहीं जानते कि मजीठिया वेतनमान क्या होता है। इसके तहत कितनी सैलरी मिलती है। तो वे क्या जांच करेंगे। ऐसे में कोई कोर्ट के खिलाफ मुंह खोले तो तुरंत अवमानना का मामला बन जाएगा लेकिन कोई हजारों का हक मारकर कोर्ट में खड़ा हो जाए तो वह दोषी नहीं है। पहले झोलाछाप डॉक्टरों से जांच होगी कि वह वास्तव में किसी का हक मारा है या नहीं। समय के साथ श्रमिक के लडऩे का धौर्य टूटते जाता है। ऐसे में फैसला क्या होगा सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

इधर तत्काल फैसला
भले ही सुप्रीम सैलरी स्लीप भी देखकर यह ना समझ पाए कि आपके साथ अन्याय हुआ है या नहीं। लेकिन आवाज उठाने पर प्रेस मालिक तुरंत न्याय कर देंते है। जागरण, भास्कर और पत्रिका आदि प्रेसों ने जिन्होंने हक की मांग की उन्हें तत्काल बर्खास्त कर दिया गया और कह दिया गया कि वे हमारे कर्मचारी नहीं थे। वहीं कोर्ट न्याय दिलाने में वर्षों लगा देता है। पहले आप श्रम विभाग में शिकायत करों की आपको नौकरी से निकाल दिया गया। फिर श्रम विभाग दोनों पक्षों से जबाब तलब करेंगा। यह कार्रवाई भी सिर्फ मजाक होती है लेबर कोर्ट को कोई अधिकार नहीं कि इस मामले में कोई फैसला ले सके। लेकिन लेबर को श्रम विभाग के चक्कर लगाने पड़ेंगे। फिर अंत में मामला राज्य स्तर पर श्रमायुक्त को भेजा जाएगा जहां श्रम विभाग इसे लेबर कोर्ट में भेजेंगा। फिर लेबर कोर्ट में खुद केस लड़ो। ऐसी प्रक्रिया में २ साल से कम नहीं लगते तो श्रमिकों को हक मिलने का नारा किस आधार पर लगाए जाते हैं। आखिर श्रमिकों के हितों मे कानून ही क्यों बनाते हो जिसका पालन नहीं करा सकते। न्यूनतम वेतनमान का कानून बना है लेकिन खुद केन्द्र और राज्य सरकार इसका पालन नहीं करते। शर्म करनी चाहिए कानून बनाने वाले और इसकी रक्षा करने वाले नुमाइंदों को।

महेश्वरी प्रसाद मिश्र
पत्रकार
[email protected]

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3 Comments

3 Comments

  1. Dr. Lns

    March 7, 2016 at 3:25 pm

    कानून और कोर्ट न्याय पैसे वालो की रखैल होगई है कोर्ट और कानून सिर्फ पैसे वालो के लिये है मैं खुद राजस्थान पत्रिका मे काम करता हुँ बस और साथियों की तरह सिर्फ मजिठिया के फ़ैसले का इंतज़ार है फ़ैसला आने के बाद किसी न्यूज पेपर को करमचारी नही मिलेंगे

  2. anu chauhan

    March 8, 2016 at 11:25 am

    varson se kuchle ja rhe mediakarmiyon ko mazithia aayog se bahut aas thi lekin supreme court ne to sari aashayen hi tod di. ab bhagwan hi hai jo press maliko ke dimag ko durust kar sakta hai

  3. Prashant gupta

    March 10, 2016 at 10:47 am

    Ab iss majithiya ke case ka Kuch b nahi hoga.
    Manniye supreem court se ab hame b koi umeed nahi hai.
    Itna pareshan kar rahe hai ye press wale ki ab jayada din tak naukari chalana sambhav nahi raha.
    Main AMARUJALA ka employee ho yaha bahut buri halat hai bas jayada se jayada lgo ko hatane ka tareeka dhundha ja raha hai.

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