
संजय कुमार सिंह
आज मेरे सभी अखबारों में, “एक देश, एक चुनाव” की खबर लीड है। इसमें खबर क्या है और क्यों यह लीड है, समझना मुश्किल नहीं है। बहुत आसान है यह समझना कि यह सरकारी हेडलाइन मैनेजमेंट का भाग है। उसपर आने से पहले आज की कुछ दूसरी खबरें बताता हूं जो लीड हो सकती थीं। इनमें कश्मीर में मतदान, करोलबाग में बिल्डिंग गिरने से 4 मरे, 14 घायल, हरियाणा के घोषणापत्र में कांग्रेस ने एमएसपी की गारंटी दी। ट्रम्प ने कहा है कि अगले हफ्ते वे मोदी से मिलेंगे, उग्रवादियों ने मणिपुर के गांव में गोली चलाई, सिंधु जल समीक्षा के लिए पाकिस्तान को भारत का नोटिस, आतिशी 21 को शपथ लेंगी, हफ्ते भर में बहुमत साबित करेंगी। इस तरह, जाहिर है, आज लीड बनाने के लायक कई खबरों को छोड़ कर इसे लीड बनाया गया है जबकि इसमें खबर कुछ है ही नहीं। जो है वह शीर्षक से पता चल जायेगा। लीजिये, पढ़िये और समझिये।
इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर चार कॉलम में लीड है। एक लाइन का फ्लैग शीर्षक है, “कैबिनेट ने कोविन्द पैनल की सिफारिशों को मंजूर किया”। मुख्य शीर्षक है, “एक देश, एक चुनाव को गति में लाया गया, दो चरणों में होगा”। उपशीर्षक है, “देशव्यापी सलाह मश्विरा होगी, एक साथ चुनाव कराने के लिए समिति बनाई जायेगी : सरकार”। सिंगल कॉलम की एक खबर से पता चलता है कि विपक्ष ने इस कदम की आलोचना की है और कहा है कि यह व्यावहारिक नहीं है, संघीय ढांचे के लिए खतरा और सस्ता स्टंट है।
टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह खबर चाल कॉलम में है। शीर्षक है, मंत्रिमंडल ने एक देश एक चुनाव को ओके किया, पर क्या सरकार इसे पूरा कर सकती है। इससे संबंधित संशोधन शीतकालीन सत्र में लाये जा सकते हैं।
हिन्दुस्तान टाइम्स में भी यह खबर चाल कॉलम में है। दो लाइन का इसका शीर्षक है, मंत्रिमंडल ने एक साथ चुनाव कराने की योजना को मंजूरी दी। इसके साथ मंत्रिमंडल के प्रमुख निर्णय में बताया गया है, एक देश एक चुनाव की रिपोर्ट को मंजूरी मिल गई।
द हिन्दू में भी यह खबर चार कॉलम की लीड है। शीर्षक है, एक साथ चुनाव को केंद्रीय मंत्रिमंडल की सहमति मिली।
द टेलीग्राफ में भी यह खबर चार कॉलम में है। शीर्षक है, एक चुनाव को मंत्रिमंडल की सहमति, पर कोई टाइमलाइन नहीं। फ्लैग शीर्षक है, सरकार ने बाधाओं और पुलिस की सहूलियत का उल्लेख किया, विपक्ष को जुमला नजर आया। टेलीग्राफ का आज का कोट भी इसी पर है। तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरिक ओ ब्रायन ने कहा है, आप एक साथ तीन राज्यों में चुनाव नहीं करा सकते हैं और एक देश एक चुनाव की बात करते हैं।
अमर उजाला में यह खबर पांच और चार कॉलम में है। फ्लैग शीर्षक है, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कोविंद समिति की सिफारिशों को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार किया। मुख्य शीर्षक है, एक देश एक चुनाव पर कैबिनेट की मुहर, व्यापक चर्चा के बाद बनेगा कानून। उपशीर्षक है, पहले चरण में लोकसभा व विधानसभा चुनाव एक साथ।
नवोदय टाइम्स में यह चार कॉलम में है और इसका शीर्षक है, “एक राष्ट्र, एक चुनाव : एक और कदम”। इसके साथ बताया गया है, मंत्रिमंडल ने कोविंद समिति की सिफारिश स्वीकार की। 32 दल समर्थन में, 15 दल विरोध में। दो संशोधन जरूरी है।
आप जानते हैं कि मामला इतना ही नहीं है। तीन राज्य तो छोड़िये एक राज्य के चुनाव सात और आठ चरण में हुए हैं और प्रधानमंत्री के भाषण के खिलाफ चुनाव आयोग से शिकायत पर कार्रवाई में कई दिन लगे हैं। यही नहीं, 15 लाख रुपये की रिश्वत का जुमला ऐसा था कि चुनाव नतीजे बिल्कुल पलट सकते हैं। अब हम यह भी जानते हैं कि इस उम्मीद में लोगों ने वोट तो दिये ही, 15 लाख नहीं मिले तो कोई नाराजगी नहीं है। यही नहीं, आप कह सकते हैं कि इसकी कोई उम्मीद नहीं कर रहा होगा पर स्विस बैंक से पैसे भी तो वापस नहीं आये। लोगों को यह भी चिन्ता नहीं है कि पैसे थे ही नहीं या थे, वापस नहीं लाये गये। अगर थे ही नहीं तो आरोप झूठे थे और वापस नहीं लाये मतलब काले धन के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। नोटबंदी का भी लाभ नहीं मिला है।
प्रचारकों के दम पर लोगों को यकीन दिला दिया गया है कि जनधन खातों से गरीबों का बहुत भला हुआ पर न्यूनतम बैलेंस नहीं मेनटेन करने पर करोड़ों का जुर्माना वसूला गया है और यह चाहे जिससे वसूला गया हो, बैंकों की हालत ठीक होती तो जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिये थी। कहने की जरूरत नहीं है कि जब नोटबंदी, जीएसटी आदि के अपेक्षित परिणाम नहीं आये तो इसके भी नहीं आयेंगे और यह अगर बदनीयत से नहीं किया जा रहा है तो एक प्रयोग ही है और जिसके कई प्रयोग नाकाम और बेमतलब साबित हो चुके हैं उसे और प्रयोग करने का नैतिक अधिकार तो नहीं ही है। यही हाल शेल कंपनियों का है। विदेशी चंदे लेना रोकने का मकसद देश सुरक्षा भले कहा गया हो पर देश में गरीबी का यह हाल है कि लोग किसी भी तरह का काम ढूंढ़ रहे हैं ताकि घर चले और सरकार की चिन्ता सिर्फ चुनाव है।
ऐसे में यह इतनी बड़ी खबर नहीं है कि सभी अखबार इसे लीड बनाते। ऊपर लिखी खबरों में किसी को भी लीड बनाकर इसे सिंगल कॉलम में भी छापा जा सकता था। इस योजना का सच भी बताया जा सकता था लेकिन मीडिया सरकार का ऐसा ही समर्थन करता आया है और यह 2014 के बाद से नहीं, पहले से है। ऐसा नहीं है कि खबरें थी ही नहीं, जनसत्ता में छपी हैं। किसी भी तरह चुनाव जीतने की भाजपा की कोशिशों का आलम यह है कि विपक्ष के प्रमुख नेता, राहुल गांधी को पप्पू कहकर बदनाम किया गया। इसके लिए झूठे और संपादित वीडियो का उपयोग किया गया। फिर भी राहुल गांधी लोकसभा में पर्याप्त नुकसान कर पाये तो अब उन्हें जान से मारने की धमकी दादी का हाल करने के रूप में दी गई।

टेलीविजन चैनलों ने इस पर बहस नहीं चलाई कि इसका मतलब सुरक्षा गार्ड से हत्या करवाना होगा या नहीं और होगा तो गार्ड धर्म विशेष के होंगे या नहीं और होंगे तो यह सब कैसे संभव होगा? क्या राहुल गांधी भी दादी जैसे ही हैं और अगर हों तो क्या हत्या के बाद अब दंगे नहीं होंगे और क्या दंगे होंगे तो उसकी परवाह हत्यारों को नहीं होगी आदि आदि। जो हालात हैं उसमें इसपर भी चर्चा हो सकती थी, करवाई जानी चाहिये थी और टीआरपी के लिए या सरकार की सेवा में कुछ भी करेगा तो इस तरह सवाल-जवाब अंदेशे आदि जताये जा सकते थे। वो तो नहीं ही हुआ। कार्रवाई भी नहीं हुई। बढ़ते हुए बात जीभ दाग देने तक पहुंच गई है। एफआईआर हुई है पर कार्रवाई नहीं हो रही है। खबर भी नहीं छप रही है। मेरे अंग्रेजी अखबारों में तो नहीं ही है, अमर उजाला में भी नहीं है। आज दो पहले पन्ने हैं, दोनों पर नहीं। मेरे पास नवभारत टाइम्स का जो एडिशन है उसमें भी राहुल गांधी की जीभ दागने और इसके खिलाफ एफआईआर की नहीं है जबकि नवोदय टाइम्स और जनसत्ता दोनों में है।
पहलवान बेटियों की शिकायत पर कार्रवाई नहीं हुई तो हरियाणा में भाजपा का जो हाल है वह राहुल गांधी से संबंधित शिकायत पर नहीं होगा क्या? पर ना तो कार्रवाई हो रही है और ना चर्चा हो रही है। यह स्थिति तब है जब कन्हैया से लेकर पी चिदंबरम, रॉबर्ट वाड्रा और नेशनल हेराल्ड तक के मामलों में कई साल से कुछ नहीं हुआ है। केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को जमानत मिलने के बाद दिल्ली दंगे में बंद लोगों को जमानत की भी बात हो रही है और उसपर अदालतों की भूमिका भी चर्चा में है पर वह सब अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है और उसके लिए एक देश एक चुनाव जैसी खबरें हैं।



