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आज के अखबार : अमर उजाला और हिन्दुस्तान टाइम्स में बिहार के विशेष सघन पुनरीक्षण पर कुछ नहीं है

संजय कुमार सिंह

बिहार में मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण 2025 को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किये जाने और उस पर 10 जुलाई को सुनवाई की खबर आज मेरे नौ में सात अखबारों में लीड या सेकेंड लीड हैं। सिर्फ दो अखबार ऐसे हैं जिनके पहले पन्ने पर आज यह खबर लीड या सेकेंड लीड नहीं है। ये अखबार हैं, हिन्दी में अमर उजाला और अंग्रेजी में हिन्दुस्तान टाइम्स। अमर उजाला में यह खबर सिंगल कॉलम में दो लाइन के शीर्षक के साथ कुल सवा चार लाइनों में है। नौ अखबारों में आठ दिल्ली के हैं और एक, द टेलीग्राफ कोलकाता का। आज द टेलीग्राफ की लीड विशेष सघन पुनरीक्षण पर 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की खबर है। अमर उजाला में आधे पन्ने का विज्ञापन है और आधे पन्ने के दो पन्ने पहले पन्ने जैसे हैं। पहले आधे पन्ने पर यह छोटी सी खबर है। हिन्दुस्तान टाइम्स में भी यह पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम की खबर है। हालांकि अमर उजाला से कुछ ज्याद जगह में थोड़ी बड़ी। बिहार चुनाव या मतदाता सूची पुनरीक्षण से संबंधित कोई दूसरी खबर भी नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि बिहार में विशेष सघन पुनरीक्षण 2025 अपनी तरह का पहला और अनूठा कार्यक्रम है और आशंका है कि बिहार में कामयाब रहा तो देश भर में लागू किया जायेगा।

इंडियन एक्सप्रेस रोज बिहार के गांवों और जिलों से खबरें छाप रहा है। आज सुप्रीम कोर्ट में 10 जुलाई को सुनवाई की खबर लीड है। उसके साथ छपी खबर में बताया गया है कि राज्य में इन दिनों डोमिसाइल सर्टिफिकेट की मांग सबसे ज्यादा है और लांखों मांग लंबित हैं। इसका कारण यह बताया गया है कि डोमिसाइल सर्टिफिकेट के लिए सिर्फ आधार कार्ड की जरूरत है और दिलचस्प यह है कि आधार कार्ड चुनाव आयोग द्वारा मांगे गये 10 दस्तावेजों में नहीं है। मीडिया का काम ऐसी ही विसंगतयों, विडंबनाओं और मनमानियों को सामने लाना है। पर इन दिनों दिल्ली के अखबारों में यह काम सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस कर रहा है। बाकी ने भले सुप्रीम कोर्ट में याचिका स्वीकार होने जैसी दिल्ली को खबर को पहले पन्ने पर रखा है लेकिन दो अखबार ऐसे भी हैं जिनने इस महत्वपूर्ण खबर को सिंगल कॉलम में निपटा दिया है। नवोदय टाइम्स में यह खबर सुप्रीम कोर्ट की आधे कॉलम की फोटो के साथ दो कॉलम में छोटी सी है पर अमर उजाला के दोनों पहले या आधे पन्नों में बिहार की एक भी खबर नहीं है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर सेकेंड लीड है और शीर्षक है, बिहार में विशेष सघन पुनरीक्षण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विपक्ष एकजुट। अखबार ने इस खबर के साथ जो बातें हाईलाइट की हैं उसका शीर्षक है, साबित करने का बोझ आम लोगों पर डाल दिया गया। इसके अलावा याचिका में यह भी कहा गया है कि चुनाव आयोग ने अपनी विशेष सघन पुनरीक्षण योजना के लिए जो टाइमलाइन तैयार किया है वह बहुत कम है। इसके अलावा, मतदाता होने की योग्यता साबित करने की जिम्मेदारी गैर कानूनी रूप से मतदाताओं पर डाल दी गई है। इसमें भी आधार कार्ड और राशन कार्ड को अलग कर दिया गया है जबकि आमतौर पर इन्हें स्वीकार किया जाता है। द हिन्दू में सुप्रीम कोर्ट की खबर लीड है। उपशीर्षक है, कई विपक्षी दलों, गैर सरकारी संगठनों और ऐक्टिविस्ट्स इस अभियान की वैधता को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं; इनका कहना है कि चुनावी राज्य में करोड़ों लोगों को मतदाता सूची से बाहर कर दिये जाने का खतरा है। देशबन्धु में यह खबर लीड है। शीर्षक है, वोटर लिस्ट मामले में 10 को ‘सुप्रीम’ सुनवाई। इसका उपशीर्षक है, एडीआर के वकील (कपिल) सिब्बल व (अभिषेक मनु) सिंघवी ने जल्द सुनवाई की मांग की थी। 

इंडियन एक्सप्रेस की खबरों, सुप्रीम कोर्ट में लगाये गये आरोपों, चुनाव आयोग के रवैये और अभी तक जो सब होता रहा है उससे साफ है कि इस बार मनमानी चल रही है और आशंका है कि इसे दूसरे राज्यों में भी दोहराया जायेगा। यह किसी भी तरह सत्ता में बने रहने की भाजपा की कोशिशों का सबसे नया रूप या प्रयास है और खुलकर चुनाव आयोग के जरिये लागू किया जा रहा है। इसे रोकने के लिए मीडिया की सक्रियता जरूरी थी पर ऐसा कुछ है नहीं और वास्तविक स्थिति का पता सोमवार, 7 जुलाई की रिपोर्टर्स कलेक्टिव की रिपोर्ट से चलता है। रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने कहा है कि बिहार की मतदाता सूची तैयार थी और फिर अचानक सघन पुनरीक्षण का आदेश आ गया। ऐसा देश में पहले कभी नहीं हुआ है। बिहार में इससे पहले सघन पुनरीक्षण एक साल से ज्यादा समय में हुआ था और चुनाव से पहले काफी समय था न कि ठीक पहले। नितिन सेठी और आयुशी कर के मुताबिक रिकार्ड से यह खुलासा हुआ है कि जनवरी 2025 तक बिहार की मतदाता सूची का विस्तृत परीक्षण और अद्यतन करने का काम पूरा हो चुका था और ठीक था। अचानक चुनाव आयोग ने इसे दोषपूर्ण कहकर खारिज कर दिया। इसके बाद एसआईआर की घोषणा हुई और विवाद चल रहा है। पुरानी रिपोर्ट में ऐसी कोई गड़बड़ी नहीं मिली कि इतने बड़े पैमाने पर पुनरीक्षण हो। रिपोर्ट में लिखा है कि केंद्रीय चुनाव आयोग ने रिपोर्टर्स कलेक्टिव के सवालों का जवाब नहीं दिया है और देगा तो रिपोर्ट को अद्यतन कर दिया जायेागा। रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2025 में मतदाता सूची को अंतिम रूप दिया जा चुका था। इसके अनुसार बिहार में 7 करोड़ 80 लाख 22 हजार 933 वोटर हैं।

इस खबर के अनुसार, पूर्वी चंपारण जिले के मेघुआ गांव के तबरेज आलम ने 11 जून 2024 को संबंधित बीएलओ को फॉर्म देकर मतदाता सूची से हुसैन शेख का नाम डिलीट करने के लिए कहा। उनका निधन हो चुका था। नवंबर तक चुनाव अधिकारियों ने तबरेज की पहचान की पुष्टि कर ली थी जनवरी 2025 में हुसैन का नाम मतदाता सूची से हट गया था। यह तबरेज के आवेदन पर हुआ था। पांच महीने बाद चुनाव आयोग उसी तबरेज से दस्तावेजी सबूत मांग रहा है जिससे इस बात की पुष्टि हो सके कि वह जिन्दा है, भारत का नागरिक है और नियमित रूप से अपने गांव में रहता है ताकि आगामी बिहार विधान सभा चुनाव में मतदान कर सके। रिकार्ड की समीक्षा करके रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने पाया कि ईसीआई का निर्णय अचानक लिया गया यूटर्न है और राज्य की चुनाव मशीनरी इससे चकित है। 24 जून के ईसीआई के आदेश से पहले राज्य के अधिकारी  नियमित रूप से मतदाता सूची को अपडेट कर रहे थे और इसके लिए वही पुराने तथा व्यवहार में लाये जाने वाले तरीके अपनाये जा रहे थे। बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी के पास जो रिकार्ड है उससे पता चलता है कि जनवरी 2025 में यह काम पूरा हो चुका था। इसके बावजूद, बिहार के अखबारों में स्थानीय चुनाव आयोग के स्पष्ट विज्ञापन से भ्रम फैलने का मामला बनाकर वही सब करने की पुष्टि की गई जो पहले गलत या चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं था। ऐसे में यह बुनियादी सवाल है कि चुनाव आयोग आखिर ऐसा क्यों कर रहा है और कर रहा है तो किसलिये। पर यह सवाल किसी अखबार में प्रमुखता से नहीं है।

आज की दूसरी बड़ी खबर है, टैरिफ युद्ध फिर शुरू। अमर उजाला की लीड है, सात देशों पर 25 से 40 फीसदी शुल्क, ब्रिक्स देशों को भी धमकी। आज यह अमर उजाला का शीर्षक है। इसके साथ दो कॉलम में खबर छपी है, भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स को मिलेगी नई पहचान : मोदी। जाहिर है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रम्प जो बोल रहे हैं वह एक दूसरे के लिए नहीं है या ठीक नहीं है। अमर उजाला की लीड का उपशीर्षक है, राष्ट्रपति ट्रम्प ने ब्रिक्स की अमेरिका विरोधी नीतियों के समर्थक देशों के भी अतिरिक्त 10 शुल्क लगाने की चेतावनी दी। ऐसे में जाहिर है कि अबकी बार ट्रम्प सरकार का नारा लगवा चुके मोदी हाउडी मोदी का कोई जवाब नहीं दे रहे हैं। लगता नहीं है कि वे इस मामले को संभाल पायेंगे फिर भी चुनाव आयोग बिहार में विशेष सघन पुनरीक्षण करवा रहा है और आज इसपर खबर नहीं के बराबर है। रिपोर्टर्स कलेक्टिव की रिपोर्ट का हवाला भी नहीं है। अंग्रेजी अखबारों में तो फिर भी लेख, विचार और संपादकीय छप रहे हैं। हिन्दी का सन्नाटा कान फाड़ू है। वहां निशिकांत दुबे जैसे लोग पटक-पटक कर मारने की चेतावनी दे रहे हैं। यह खबर भी अंग्रेजी अखबार दि एशियन एज में तीन कॉलम में है। आप जानते हैं (इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा था) कि जो काम बाल ठाकरे नहीं कर सके वह देवेन्द्र फडणविस ने करा दिया। अब निशिकांत दुबे जो कर रहे हैं उससे देवेन्द्र फडणविस का किया पक्का ही होगा। जवाब में उद्धव ठाकरे ने कहा है कि कुछ लोग लकड़बग्घे की तरह राज्य में शांति और सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने बीजेपी पर ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति पर चलने, राजनीतिक लाभ हासिल करने की कोशिश करने का आरोप लगाया। उद्धव ने कहा कि राजनीति की यह शैली अब अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है। मुंबई में हमारी रैली की सफलता से बीजेपी बेचैन है।

दूसरी प्रमुख खबर बंगाल में मतदाताओं की संख्या बढ़ने पर पुनर्मतगणना की चर्चा है। आप जानते हैं कि महाराष्ट्र और दिल्ली के पिछले विधानसभा चुनावों में मतगणना सूची में गड़बड़ी, मोटे तौर पर मतदाताओं की संख्या में भारी वृद्धि के आरोप थे और मतगणना सूची की मांग की जाती रही पर चुनाव आयोग के कान पर जूं तक नहीं रेंगा। राहुल गांधी मशाीन से पढ़ने योग्य सूची की मांग करते रहे और आयोग व उसके प्रचारक झूठे-सच्चे बहाने बनाते रहे। बाद में नियम ही बदल दिये गये और अब चुनाव आयोग वीडियो रिकार्ड और डाटा देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन पहले नहीं किया गया है और इस तरह चुनाव आयोग अपनी मनमानी चलाने में कामयाब है और इस बार भी बिहार में वही हो रहा है। पहले मतदाताओं की संख्या में भारी वृद्धि और अब कथित घुसपैठियों के नाम पर मतदाता पहचान पत्र बनाने के लिए अपने ही आधार कार्ड को नहीं मानना और दूसरे दस्तावेज बनवाने के लिए कम  समय दिये जाने जैसी शिकायतें हैं। चर्चा रही है कि ऐसा दूसरे राज्यों में भी होगा और आज टेलीग्राफ में बंगाल की खबर से सारी आशंकाएं सच होती लग रही है। लेकिन जिन्हें खबर नहीं करना है वो नहीं करेंगे।

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