
संजय कुमार सिंह
बिहार में एसआईआर और उससे संबंधित खुलासे पर एफआईआर कई दिनों से चर्चा में है। आज देशबन्धु की लीड तेजस्वी यादव का यह आरोप है कि चुनाव आयोग भाजपा का प्रकोष्ठ बन गया है। इसके साथ राहुल गांधी के ट्वीट की खबर, ‘राहुल ने उठाये चुनाव आयोग पर सवाल’ भी है। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि एसआईआर के नाम पर वोट की चोरी हो रही है। देशबन्धु ने इसे प्रमुखता से छापा है। आप जानते हैं कि बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं और वहां मतदाता सूची का विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) चल रहा है। उससे संबंधित गड़बड़ियों का मामला सुप्रीम कोर्ट में है। यूट्यूब पर इसका खुलासा करने वाले पत्रकार, अजीत अंजुम के खिलाफ एफआईआर है और ‘सूत्रों’ के हवाले से अखबारों में छपवाया जा चुका है कि बिहार की मतदाता सूची में विदेशी यानी नेपाल, बांग्लादेश और म्यामार के लोग भी हैं। यह सवाल कहीं नहीं है कि ऐसा कैसे और केंद्र व राज्य की डबल इंजन सरकारें क्या करती रहीं। अगर ऐसा है तो कैसे, और कबसे है – यह भी नहीं बताया गया है। पूछा तो जाता ही नहीं है। साथ ही, सवाल यह भी है कि, इनलोगों के नाम मतदाता सूची में हैं तो इन्होंने लोकसभा चुनाव में भी वोट दिये होंगे और उसके लिए क्या कार्रवाई हो रही है। दैनिक जागरण में खबर छप चुकी है कि कितने मतदाताओं के नाम किसलिये कटेंगे। इससे पता चलता है कि चुनाव आयोग पहले से तय किये बैठा है कि उसे क्या करना है और एसआईआर सिर्फ बहाना है। एसआईआर में कायदे-कानूनों के उल्लंघन की शिकायत और सबूत पेश करने वाले पर एफआईआर से एसआईआर की पूरी कवायद शक के घेरे में है। खासकर महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में हुई गड़बड़ी के आरोपों के आलोक में।
ऐसे में, बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने अगर कुछ आरोप लगाया है तो वह 2008 में जमीन खरीद कर 2012 में बेचने और इसमें 50 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई करने के 2018 के आरोप पर अब चार्जशीट दायर किये जाने से ‘बड़ी’ खबर है। भले इस मामले में आरोपी लोकसभा में विपक्ष के नेता, राहुल गांधी के बहनोई रॉबर्ट वाड्रा हैं। संभव है कि इस लिहाज से इस खबर को ज्यादा पढ़ा जाये लेकिन इसका कारण इसके पीछे की राजनीति होगी जबकि बिहार मामले में चुनाव आयोग की निष्पक्षता या राजनीति दांव पर है। पूछने को पूछा जा सकता है कि चुनाव आयोग इसमें क्यों या कैसे राजनीति करेगा? पर समझना मुश्किल तब होता जब आज अखबारों में यह खबर छपी होती। हेडलाइन मैनेजमेंट के कारण अगर यह खबर और एक्स पर राहुल गांधी की पोस्ट आज खबर नहीं है तो इसका कारण चुनाव आयोग की राजनीति ही हो सकती है। अगर तेजस्वी यादव यह आरोप लगा रहे हैं कि चुनाव आयोग भाजपा का प्रकोष्ठ बन गया है तो ईडी पर यह आरोप पहले से है और उसके पूर्व निदेशक को सेवा विस्तार दे-देकर इसे साबित किया जा चुका है। फिर भी अपराध के छह साल बाद एफआईआर और उसके सात साल बाद चार्जशीट की खबर लीड है तो राजनीतिक कारणों से ही। जहां तक बिहार की हालत और खबरों की बात है, तेजस्वी ने यह आरोप भी लगाया है कि राज्य में भय का माहौल है तथा कोई भी सुरक्षित नहीं है।
सम्राट चौधरी का इंटरव्यू
दूसरी ओर, एसआईआर की जरूरत और उसे जायज बताने के लिए बिहार के उप मुख्यमंत्री और भाजपा नेता सम्राट चौधरी ने कहा है, डोमिसाइल पेपर की मांग में वृद्धि से लगता है कि (राज्य में) कई अप्रवासी मौजूद हैं (इंडियन एक्सप्रेस)। कहने की जरूरत नहीं है कि यह भाजपा की लाइन है और चुनाव आयोग इसी लाइन पर चल रहा है जिसका पता सूत्रों की ‘खबर’ और ‘लीक’ से चल रहा है। इसके आधार पर चुनाव आयोग की योजना कुछ नाम काटने की ही लगती है और यह कवायद इसीलिए हो रही दिखती है। शिकायतों से लगता है कि इसके लिए जबरन ऐसे कागज मांगे जा रहे हैं जो लोगों के पास आम तौर पर उपलब्ध नहीं हैं और इंडियन एक्सप्रेस पहले लिख चुका है कि डोमिसाइल सर्टिफिकेट की भारी मांग है क्योंकि आधार कार्ड मांगे गये दस्तावेजों में नहीं है और आधार से डोमिसाइल सर्टिफिकेट बन सकता है। ऐसे में भाजपा नेता सम्राट चौधरी अपनी बात कह ही सकते हैं जबकि डोमिसाइल सर्टिफिकेट मांगने का कारण आधार को नहीं मानना भी हो सकता है। वैसे भी, मतदाता सूची में नाम के लिए डोमिसाइल सर्फिकेट की जरूरत नहीं है क्योंकि यह सर्टिफिकेट उस व्यक्ति को मिलेगा जो एक निश्चित समय से खास पते पर रह रहा है जबकि मतदाता सूची में उसका नाम भी हो सकता है जो किसी पते पर सामान्य तौर पर रहने के लिए उन्हीं दिनों आया हो। यानी किसी ने तबादले पर या नई नौकरी के लिए कहीं रहने का निर्णय किया, किराये पर मकान लिया तो किराये के करार पर भी मतदाता सूची में नाम लिखा जा सकता है। बशर्ते आप विदेशी नहीं हों। और कोई विदेशी होगा तो उसके पास पासपोर्ट होगा वह सामान्य तौर पर कहीं रहने या नौकरी करने के लिए मकान या नौकरी भी कैसे प्राप्त कर सकेगा? यही नहीं, किसी विदेशी के पास आधार कार्ड भी क्यों होना चाहिये?
जंगल राज का ताज
द टेलीग्राफ ने पटना के एक निजी अस्पताल में कल हुई हत्या की खबर को आज पांच कॉलम में सेकेंड लीड बनाया है और शीर्षक है, नीतिश कुमार के सिर पर जंगल राज का ताज ठोंक दिया गया। दरअसल खबर यह है कि कल सुबह पांच बंदूकधारियों ने एक निजी अस्पताल के कमरे में घुसकर, सीसीटीवी की निगरानी में एक मरीज को गोली मार दी जो खुद एक कुख्यात अपराधी है। वारदात के बाद किसी मुकाबले या चुनौती के बिना बंदूकधारी वापस निकल गये। अमर उजाला में यह खबर फोटो के साथ सिंगल कॉलम में है। टेलीग्राफ के अनुसार पांचो अपराधी पहचान लिये गये हैं और अमर उजाला का फोटो कैप्शन है, सीसीटीवी फुटेज में दिखे पांचों अपराधी। टेलीग्राफ ने सीसीटीवी की तीन तस्वीरें चार कॉलम में छापी है। वाड्रा के खिलाफ चार्जशीट – आरोप और अपराध के लिहाज भले पहले पन्ने की खबर न हो, प्रधानमंत्री की घोषणा – ‘ना खाउंगा, ना खाने दूंगा’ – के ‘देर है, अंधेर नहीं’ में बदलने के कारण तो है ही। हर चुनाव से पहले वाड्रा से पूछताछ करने वाली सरकार के विभाग ने भाजपा अध्यक्ष के चुनाव से पहले यह कार्रवाई की है तो खबर है ही। पाठकों को शायद मैंने कल यह नहीं बताया था कि द टेलीग्राफ में कल इन दोनों खबरों की जगह भाजपा अध्यक्ष का चुनाव नहीं होने से संबंधित खबर छपी थी जिसमें बताया गया था कि दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी अपने पिछले अध्यक्ष का कार्यकाल खत्म होने के दो साल बाद भी अध्यक्ष का चुनाव नहीं कर पा रही है और भाजपा का पितृसंगठन आरएसएस चाहता है कि नया अध्यक्ष गुजरात लॉबी का न हो।
भाजपा अध्यक्ष दो साल में नहीं मिले
भाजपा अध्यक्ष के चुनाव से संबंधित तथ्य भी हेडलाइन मैनेजमेंट में खबर नहीं हैं और इसलिए आपको शायद पता न हो कि भाजपा को अध्यक्ष ढूंढ़ने में तो समय लग ही रहा है कोषाध्यक्ष का उसका पद भी लंबे समय तक खाली रहा है। पीयूष गोयल को अचानक कोषाध्यक्ष पद से हटाकर केंद्रीय मंत्री बना दिया गया था और महीनों यह पद खाली रहा। तब भाजपा के वेबसाइट पर यह पद खाली दिखाया जाता था। लेकिन कल मैंने देखा कार्यकाल खत्म होने के बावजूद भाजपा के अध्यक्ष के रूप में जेपी नड्डा का ही नाम लिखा है। भले ही यह पार्टी का विशेषाधिकार और विवेक का मामला हो लेकिन अध्यक्ष का केंद्रीय मंत्री होना उतना अनैतिक नहीं है जितना कोषाध्यक्ष होगा। गैर कानूनी तो खैर, बिल्कुल नहीं है और इसीलिए तथ्य है कि भाजपा के मौजूदा कोषाध्यक्ष उत्तर प्रदेश के पूर्व वित्त मंत्री हैं और पार्टी ने एक अनुभवी व्यक्ति का उपयोग कोषाध्यक्ष के रूप में किया है। खबरों के अनुसार उम्मीद थी कि दो साल से खाली अध्यक्ष का पद लोकसभा के मानसून सत्र से पहले भर जायेगा लेकिन अब इसकी संभावना कम लगती है हालांकि नामुमकिन मुमकिन होते रहते हैं।
दिल्ली सरकार की मितव्ययिता
अनुभवी कोषाध्यक्ष की बात चली है तो नवोदय टाइम्स में दिल्ली की मुख्यमंत्री के हवाले से छपी खबर का ध्यान आया। रेखा गुप्ता ने कहा है कि दिल्ली की बसों में मुफ्त सफर का लाभ सिर्फ दिल्ली की महिलाओं को मिलेगा। आपको याद होगा कि दिल्ली की अरविन्द केजरीवाल सरकार जब मुफ्त बिजली-पानी देती थी तो उसे ‘रेवड़ी’ कहा जाता था। सरकार तो जीएसटी (गब्बर सिंह टैक्स) वसूलती थी। दिल्ली के नागरिकों को ‘मुफ्तखोर’ और आम आदमी पार्टी को ‘मुफ्तखोरी’ बढ़ाने या मुफ्तखोरी की आदत डालने वाला कहा जाता था। दिल्ली में महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा की सुविधा शुरू हुई तो कुछेक महिलाओं को इसका लाभ उठाना बुरा लगा। एक वीडियो में मैंने किसी को कहते सुना था कि हम अच्छा कमाते हैं, किराया दे सकते हैं तो मुफ्त क्यों चलें? बात सही है और वे महिला होने के बावजूद बसों में मुफ्त चलने के पक्ष में नहीं थीं और यह सही भी है कि ऐसी सुविधायें सिर्फ गरीबों के लिए होनी चाहिये। पर मुद्दा यह है कि गरीब कौन है? सिर्फ मुफ्त राशन लेने वाला या स्कूटी भी नहीं खरीद सकने वाली वो महिला जो बसों से दफ्तर जाने के लिए मजबूर हैं। जो भी हो, दिल्ली सरकार ने तय कर दिया है कि गरीब महिलायें सिर्फ दिल्ली में हैं। एनसीआर की ऐसी महिलायें गरीब नहीं हैं या हों भी तो उन्हें मुफ्त बस यात्रा की जरूरत नहीं है। भले ही एनसीआर में भी डबल इंजन की सरकार है और सभी सांसद भाजपा के ही हैं। मुझे नहीं पता कि इससे दिल्ली सरकार कितने पैसे बचा लेगी या मकसद पैसे बचाना है भी कि नहीं। हो सकता है एनसीआर की महिलाओं और दिल्ली की महिलाओं में कोई विशेष अंतर हो जिसे स्पष्ट करना हो। फूट डालो, राज करो ऐसे मामलों में तो लागू भी नहीं किया जा सकता है। खबर के अनुसार दिल्ली की महिलाओं को अब पिंक टिकट लेने की आवश्यकता नहीं होगी। उन्हें सहेली स्मार्ट कार्ड दिया जायेगा जो पूरी तरह डिजिटल होगा, कार्ड पर नाम और तस्वीर होगी। जयश्रीराम तो कह ही सकते हैं।
भारत से पंगा
दि एशियन एज में एक खबर का शीर्षक है – अमित शाह ने कहा, मोदी जी ने दिखाया कि भारत से कोई पंगा नहीं ले सकता है। उपशीर्षक है, जो भारतीयों को निशाना बनायेगा उसे परिणाम भुगतना होगा। इस पढ़कर, मुझे बेड़ियों में बांधकर सेना के विमान से अमृतसर भेज दिये गये भारतीयों की खेप याद आई। यह भी कि उससे संबंधित एक कार्टून के लिये तमिल साप्ताहिक के वेबसाइट पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। बाद में, मद्रास हाईकोर्ट ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर कार्टून प्रकाशित करने के लिए तमिल साप्ताहिक पत्रिका “आनंद विकटन” की वेबसाइट पर लगाए गए प्रतिबंध को हटाने का निर्देश दिया। जस्टिस भरत चक्रवर्ती ने सरकार को यह निर्देश दिया और पत्रिका से कार्टून वाले पृष्ठ को ‘अस्थायी रूप से’ हटाने को कहा। न्यायालय ने कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे पता चले कि कार्टून देश की संप्रभुता पर आघात पहुंचाता है। हाल में, पीएम नरेंद्र मोदी व आरएसएस पर कार्टून बनाकर विवादों में घिरे कार्टूनिस्ट हेमंत मालवीय को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली। इससे पहले, हेमंत की याचिका को स्वतंत्रता के अधिकार का दुरुपयोग बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा था, ऐसे बयान और तस्वीरों को संरक्षण नहीं दिया जा सकता। मालवीय ने माफीनामा दिया। आलोचनात्मक राय की छूट की दलील दी। सरकार की ओर से कार्टून के स्क्रीन शॉट पेश कर उसे अपराध की श्रेणी का बताया गया। बाद में उन्हें राहत मिली। आज ही खबर है, अमेरिका से 1563 भारतीय नागरिक निर्वासित किये गये हैं।
अजित डोभाल का दावा
ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान जम्मू में नागरिकों को जान-माल के भारी नुकसान का सामना करना पड़ा पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोभाल ने सात मई के ऑपरेशन सिंदूर पर पहली बार 11 जुलाई को बयान दिया। इसमें कहा कि कई विदेशी मीडिया ने पाकिस्तान के खिलाफ भारत की कार्रवाई पर सवाल उठाए। भारत को नुकसान की खबरें चलाईं। लेकिन कोई भी फोटो या सैटेलाइट इमेज नहीं दिखा पाया। ना यह बता पाया कि नुकसान क्या हुआ। सबको पता है कि पाकिस्तानी हमले में जम्मू में भारी नुकसान हुआ था। मैंने, पाकिस्तानी हमले में जम्मू गूगल किया तो कई वीडियो लिंक देखने को मिले। खबरें तो हैं ही। एनडीटीवी की एक खबर का शीर्षक है, शाम सात बजे जम्मू-कश्मीर में पहला ड्रोन अटैक, फिर कराची समेत कई पाकिस्तानी शहरों में तबाही। ईटीवी की 10 मई की खबर के अनुसार, पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर में अलग-अलग जगहों पर गोलाबारी की। इसमें कम से कम पांच लोगों की मौत हो गयी अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की। राजधानी जम्मू खुद सीधे हमले की चपेट में आ गया। 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद पहली बार यहां गोलाबारी देखी गई। मृतकों में पुंछ के मेंढर के केरी कांगड़ा की निवासी रशीदा बीबी भी शामिल हैं। इनकी मौत उनके घर पर मोर्टार शेल गिरने से हुई। एक अन्य घटना में जम्मू के आरएसपुरा के बदयाल ब्राह्मणा गांव के अशोक कुमार की भी मौत हो गई। इससे पहले की रपटों में एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी समेत तीन अन्य लोगों की मौत की पुष्टि की गई थी।
विमान दुर्घटना और साजिश
द टेलीग्राफ की आज की लीड अहमदाबाद विमान दुर्घटना की रिपोर्ट और उसके लीक होने से संबंधित खबर है। फ्लैग शीर्षक है, नियामक ने आरोप-प्रत्यारोप से बचने की चेतावनी दी। आप जानते हैं कि विमान दुर्घटना के लिए पायलट को दोषी ठहराने वाली कहानी फैलाई गई है जबकि अनुभवी पायलट से ऐसी गलती की उम्मीद कम है। ऐसे में दुर्घटना का कारण कुछ और हो सकता है तथा जल्दबाजी और लीक से लग रहा है कि मृत पायलट पर दोष मढ़कर किसी को बचाने की कोशिश हो रही है। इसमें विमान के फुएल स्विच में तकनीकी खराबी भी संभव है और अगर ऐसा है तो दोषी को बचाने से ज्यादा जरूरी है कि दोष को सुधारा जाये ताकि भविष्य में फिर ऐसी दुर्घटना न हो। लेकिन दुर्घटना अगर साजिश के कारण हुई होगी तो एक बड़े अपराध पर और साजिश पर से पर्दा हटना रह जायेगा। फिर भी आज हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, एआई-171 के कनिष्ठ पायलट ने कप्तान से पूछा कि उन्होंने ईंधन सप्लाई के स्विच क्यों बंद किये। जवाब हम जानते हैं, उन्होंने कहा कि उनने नहीं बंद किया है। इसके बाद स्विच की जांच के आदेश भी दिये जा चुके हैं। इसलिए रिपोर्ट लीक होना भी मुद्दा है। यही नहीं, टाइम्स ऑफ इंडिया में एक खबर का शीर्षक है, एएआईबी (एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इनवेस्टीगेशन ब्यूरो) ने एआई-171 की दुर्घटना पर ‘गैरजिम्मेदार’ अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट की आलोचना की।
आईटी अधिनियम और सरकार
टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड के अनुसार, सरकार ने अदालत में कहा है कि एक्स या ट्वीटर पर अवैध सामग्री लोकतंत्र को खतरे में डालती है तथा इसे चलाने वाली कंपनी आईटी अधिनियम की सेफ हार्बर सुरक्षा प्रावधान का उपयोग करके जिम्मेदारी से बचना चाहती है। अखबार ने इस संबंध में सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया, तुषार मेहता के कथन को हाईलाइट किया है। हिन्दी में यह कुछ इस तरह होगा, सेफ हार्बर की अवधारणा में जबरदस्त जिम्मेदारियां शामिल हैं। इसके तहत मध्यस्थों के लिए आवश्यक है कि नोटिस मिलने पर गैरकानूनी सामग्री को तत्काल और प्रभावी ढंग से हटाये या बेअसर करे…. सेफ हार्बर संवैधानिक स्वतंत्रता नहीं है बल्कि एक वैधानिक विशेषाधिकार है जिसे खासतौर से डिजाइन किया गया है ताकि जिम्मेदार आचरण को बढ़ावा दिया जा सके। पहले की घटनाओं के मद्देनजर सरकार की इस दलील का खेल समझना मुश्किल नहीं है। स्पष्ट है कि सरकार चाहती है कि ट्वीटर या सोशल मीडिया पर जो कुछ भी रहे उसपर उसका निर्बाध नियंत्रण रहे। आपने पढ़ा होगा कि हाल में सरकार के आदेश पर कुछ कार्रवाई की गई और बाद में सरकार ने मना कर दिया। यह ऐसा मामला है कि सोशल मीडिया चलाने वाली संस्था भारत के कानून का तो सम्मान करने के लिये तैयार हैं लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी पक्षधर हैं। ऐसे में वह सरकार के कहने पर सामग्री हटाने के लिए तो तैयार है लेकिन उपयोगकर्ताओं को भी इसकी जानकारी दे देती है। सरकार को यह पसंद नहीं है। आप जानते हैं कि भारत में या भारत से पोस्ट किसी भी गैर कानूनी सामग्री के मामले में सरकार कानूनी कार्रवाई कर सकती है।
उसकी जरूरत सिर्फ गैरकानूनी सामग्री को हटाना नहीं है बल्कि वह चाहती है कि जिसे वह हटाना चाहे उसे तुरंत प्रभावी तरीके से हटा दिया जाये और कारण नहीं पूछा जाये या कारण बिल्कुल अस्पष्ट हो। इससे वह अपने हित की गैर कानूनी सामग्री को तो रहने दे सकेगी पर अपने खिलाफ उचित और उपयुक्त सामग्री को भी हटवा सकेगी। वरना नियम यह हो सकता है कि सरकार अनुचित सामग्री के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करके संबंधित सोशल मीडिया संस्थान को सूचित करे और वह इस बिना पर सामग्री को रोक दे। लेकिन ऐसे लगता है कि सरकार कोई कारण बताये बिना उचित सामग्री को हटाने के लिए संस्था को कहे और वह हटा भी दे। सोशल मीडिया संस्थान कुछ मामलों में ऐसा कर भी रहे हैं। दूसरी ओर, तमाम आपत्तिजनक सामग्री सोशल मीडिया पर बनी हई है। उन्हें हटाने से संबंधित चूं भी नहीं है जबकि सरकार का मामूली विरोध भी बर्दाश्त नहीं है। सरकार चाहती है कि आईटी ऐक्ट का उपयोग उसकी जरूरत के अनुसार, उसेक आदेश पर लोगों को बताये बिना किया जाये। इसके लिए बदनामी अगर हो भी तो संबंधित संस्थान की हो। वह लोकतंत्र का गला घोंटे और बदनाम संबंधित मीडिया संस्थान हो। अभी इसी कारण टकराव है। सरकार चाहती है कि जो संस्थान उसकी बात नहीं मानें उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार हो ताकि उनसे अपनी मर्जी के अनुसार काम कराया जा सके।
बिहार को पैकेज मिला नहीं या लुट गया
इंडियन एक्सप्रेस की लीड नाटो को सरकार का दृढ़ जवाब है। सरकार ने कहा है कि ऊर्जा की आवश्यकताओं को सुरक्षित करना उसकी बढ़ती और सर्वोच्च प्राथमिकता है और रूस से व्यापार के मुद्दे पर नाटो प्रमुख को प्रतिबंधों की चेतावनी दी गई है। अमर उजाला के दूसरे पहले पन्ने पर नाटो की खबर ही लीड है। इसका शीर्षक है, नाटो को दो टूक – दोहरा रवैया नहीं चलेगा, पहले अपनी जरूरत देखेंगे। अमर उजाला के दूसरे पहले पन्ने पर भी सरकार की तारीफ वाली खबरें है। एक खबर का शीर्षक है, इंदौर देश में फिर सबसे स्वच्छ…. तीन से दस लाख आबादी में नोएडा अव्वल। चार कॉलम का एक और शीर्षक है, पृथ्वी-2 व अग्नि-1 बैलस्टिक मिसाइलों का परीक्षण सफल। पहले पन्ने की बाकी खबरों में चार कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, छांगुर (उर्फ जमालुद्दीन) पर अब ईडी का शिकंजा, 14 ठिकानों पर छापे। उपशीर्षक है – धर्मांतरण :यूपी में 12 और मुंबई में दो स्थानों पर कार्रवाई, कई दस्तावेज व डिजिटल उपकरण जब्त। इससे आप समझ सकते हैं कि अखबार ने कौन सी खबरें छोड़कर किन खबरों को पहले पन्ने पर प्राथमिकता दी है। बेशक यह संपादक के अधिकार और विवेक का मामला है लेकिन उसके उपयोग की चर्चा के साथ खबरों के शीर्षक उदाहरण के रूप में दिये ही जा सकते है। अमर उजाला में जो खबर प्रमुखता से नहीं है पर दूसरे अखबारों में है उनमें एक खबर देशबन्धु में है। इसका शीर्षक है, (डबल इंजन वाले) उड़ीशा में बंद का असर दिखा, आवाजाही पूरी तरह ठप रही। वाड्रा के खिलाफ चार्जशीट की खबर भी ज्यादातर अखबारों में पहले पन्ने पर है। सरकार के प्रचार वाली एक खबर आज दि एशियन एज में लीड है। शीर्षक है, (चुनाव वाले) बिहार और पश्चिम बंगाल में मोदी आज 12 हजार करोड़ की योजनाएं शुरू करेंगे। यहां मुझे बिहार के लिए 1.25 लाख करोड़ के पैकेज की नाटकीय घोषणा याद आती है। हाल में उनेक प्रचारक से विरोधी या ‘स्वंतत्र’ बने प्रशांत किशोर ने पूछा था, बिहार को 1.25 लाख करोड़ का पैकेज मिला नहीं या लुट गया। लाइव हिन्दुस्तान की 27 मई 20121 की खबर इस प्रकार थी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगामी बिहार दौरे पर जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने तंज कसते हुए कहा कि 2015 से पहले आरा से बिहार के लिए 1.25 लाख करोड़ रुपये के विशेष पैकेज की घोषणा की थी। लेकिन राशि का हुआ क्या? बिहार को पैकेज भेजा नहीं गया, या फिर डबल इंजन सरकार ने लूट लिया।



