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उत्तराखंड

अंकिता भंडारी केस में अनिल जोशी और मन्नू शिवपुरी जैसे किरदार क्यों लाए जा रहे हैं?

अजीत सिंह राठी-

फैसलों की सत्यनिष्ठा भी संदिग्ध होती है। अब अंकिता भंडारी मर्डर केस में सरकार के सीबीआई जाँच के फ़ैसले को ही लीजिए। सीबीआई को जाँच देने से पहले एक FIR की जाती है, जो देहरादून में बसंत विहार थाने में हुई, वो भी पद्मश्री अनिल जोशी की तहरीर पर। जोशी अंकिता भंडारी के माँ बाप भाई बहन या किसी भी रिश्ते में नहीं है।

सीएम धामी कह रहे है कि सीबीआई जाँच अंकिता के माता पिता के कहने पर हुई, और मुकदमे के लिए तहरीर ली गई पद्मश्री से? जोशी कहाँ से आ गए इस मामले में?

इसके साइड इफ़ेक्ट्स सामने आयेंगे, अगर अंकिता के माता पिता की तहरीर पर FIR होती तो केस तो उनके हाथ में रहता, अब तो न केस उनका है, न वो पैरवी उनकी, हाँ दुर्भाग्य से मरने वाली बेटी उन्हीं की है। अब जोशी जी आ गए जिन्होंने अंकिता भंडारी मर्डर केस पर कभी मुँह नहीं खोला। मामले में अभी भी पूरा झोल है।


उत्तराखंड में शायद कानूनों की परिभाषा बदल रही है, कोई प्राइवेट व्यक्ति भी पुलिस SIT का हिस्सा हो सकता है, दो दिन पहले अंकिता भंडारी के मामले में हरिद्वार में जिस SIT के सामने अभिनेत्री उर्मिला सनावर पेश हुई, उसके रिलीज फ़ोटो में गोल घेरे में एक महिला बैठी है, इस महिला का नाम मन्नू शिवपुरी है, किस कैपेसिटी से यह महिला पूछताछ के दौरान उपस्थित रही? बड़ा सवाल है।

पुलिस का कहना है कि कोई महिला समाज सेवी स्वतंत्र गवाह के रूप में मौजूद रह सकता है। मेरे पास जानकारी है कि ये महिला भाजपा से जुड़ी है, किसी को चाहिए तो बहुत सारे भाजपा नेताओं के साथ मंचों पर मौजूद इस महिला के फ़ोटो दे दूँगा।


गुणानंद जखमोला-

आखिर अनिल जोशी के हृदय में कैसे उमड़ा जनभावओं का दर्द?

  • जो देवदार कटने की बात पर मौन रहा, वो अंकिता को न्याय दिलाएगा? है न गजब की बात
  • तीन दिन में पैदा हो गये दो महापुरुष, एक भगवाधारी तो एक गमछाधारी

मैं पिछले कई दिनों से प्रदेश के विभिन्न वरिष्ठ और नामी वकीलों से अंकिता भंडारी प्रकरण पर सलाह ले रहा हूं। सीबीआई को भी हाईकोर्ट, मर्डर के दोषियों से दूसरे केस को इनवेस्टीगेट करने के लिए अनुमति लेनी होगी। उर्मिला प्रकरण में पहले अचानक से दर्शन भारती टपक गया तो अब इस केस में एक गमछाधारी पदम भूषण अनिल जोशी का जन्म हो गया। कोई अनिल जोशी से पूछे कि भई तुम कहां से पैदा हो गये इस केस में? डीजीपी को कोई और नहीं मिला कि तुमसे शिकायत लिखवा ली? हद है, क्या एकता कपूर का कोई सीरियल है कि जिस करेक्टर को मर्जी जब चाहो शो में शामिल कर दो।

अंकिता भंडारी के माता-पिता को यदि पहले से ही उनके गांव से बुलवा लिया गया था तो जब सीएम ने सीबीआई के लिए संस्तुति दी तो नया केस दर्ज भी उनके माता-पिता को करना था। कम से कम मैं अनिल जोशी पर विश्वास नहीं करता। ये आदमी जिस पर्यावरण के नाम पर देश दुनिया में प्रख्यात है तो ये पदम पुरस्कार के लालच में देवदारों के कटने, एलीवेटिड रोड के बनने, रैणी के जंगल ढहने, जोशीमठ के घंसने, धराली-थराली आपदा के मामले में चुप एक कोने में पड़ा रहा। क्यों? अचानक ही इस व्यक्ति को अंकिता प्रकरण में जनभावनाओं का ख्याल आ गया।

वैसे भी बता दूं कि मैंने पहले ही अपर महाधिवक्ता रहे अवतार रावत, सीबीआई पैनल के एडवोकेट जीसी शर्मा, उत्तराखंड पुलिस के लीगल एडवाइजर रहे एडवोकेट राज सिंह राघव, एडवोकेट चंद्रशेखर तिवारी एडवोकेट विकेश नेगी से बात कर इस मामले में कई बार पोस्ट लिखी है कि कोर्स ऑफ एक्शन क्या होगा? नई एफआईआर और सप्लीमेंट्री चार्जशीट की बात भी की थी।

अब अनिल जोशी ने जो एफआईआर करवाई है, यदि सीबीआई उस पर क्लोजर रिपोर्ट लगा दे कि कोई वीआईपी नहीं था तो उसे चैलेंज कौन करेगा? यदि अनिल जोशी मुकर गये तो क्या होगा? सोचो, सोचो और यह भी सोचो, कि आखिर अनिल जोशी के हृदय में जनभावनाओं के दर्द का सैलाब क्यों उठा?

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