रिया चक्रवर्ती को कम से कम अर्नब गोस्वामी पर केस जरूर करना चाहिए। अगर वह खुद ऐसा नहीं करतीं, तो जनता को भी इस पर सवाल उठाना चाहिए। याद है, कैसे सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद इस शख्स ने पूरे मामले को एक हाई-वोल्टेज ड्रामा बना दिया था?
रिया को 27 दिन तक जेल में रहना पड़ा, उन पर आरोप लगा कि उन्होंने सुशांत को ड्रग्स दिए। यह मामला उनकी मौत के बाद उठा और देखते ही देखते इसे साजिश का रूप दे दिया गया। अलग-अलग कहानियां फैलाई गईं, मीडिया ट्रायल हुआ, और रिया को विलेन बना दिया गया। लेकिन अब, पूरे पांच साल बाद, CBI ने इस केस को बंद कर दिया है क्योंकि उन्हें किसी भी साजिश के सबूत नहीं मिले।
अब सवाल यह है—क्या उन लोगों की कोई जिम्मेदारी बनती है जिन्होंने बिना ठोस आधार के आरोप लगाए? क्या उन मीडिया हाउस और ऐंकरों को कोई जवाबदेही लेनी चाहिए जिन्होंने इस मामले को सनसनीखेज बनाकर पेश किया और रिया की जिंदगी को तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी?
CBI की क्लोजर रिपोर्ट यह साबित करती है कि यह पूरा मामला एजेंडा सेटिंग और मीडिया ट्रायल का नतीजा था। यह भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का एक काला अध्याय रहेगा, जिसे आने वाले समय में मिसाल के तौर पर पेश किया जाएगा कि कैसे मीडिया की आड़ में किसी की जिंदगी बर्बाद की जा सकती है।
इस पूरे मामले में गोदी मीडिया ने सारी हदें पार कर दी थीं। झूठी कहानियां बनाई गईं, कैमरे लगाए गए, हफ्तों तक इसे प्राइम टाइम में दिखाया गया और एक निर्दोष व्यक्ति की छवि खराब करने की पूरी कोशिश की गई। अब जब सच्चाई सामने आ गई है, तो क्या कोई अपनी गलती मानेगा? क्या कोई माफी मांगेगा? शायद नहीं।
अब जनता को भी खुद से यह सवाल करना चाहिए—क्या हम सिर्फ सनसनीखेज खबरों के लिए अपनी समझदारी छोड़ देंगे? क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि जो दिखाया जा रहा है, वह सच है या किसी के निजी स्वार्थ का हिस्सा? जिन लोगों ने उस वक्त आंख बंद करके इस कवरेज पर भरोसा किया, वे अब क्या सोचते हैं?
CBI की टीम को इस निष्पक्ष जांच के लिए बधाई, क्योंकि उन्होंने किसी भी दबाव में आए बिना सच्चाई तक पहुंचने का काम किया। अन्यथा, अगर वे भी इन मीडिया हाउस के प्रोपेगेंडा का हिस्सा बन जाते, तो उनकी मेहनत मिट्टी में मिल जाती।



