बद्री प्रसाद सिंह-
वर्ष १९८९ में हुए विधानसभा चुनाव में मुन्ना भाई जीते लेकिन कांग्रेस पार्टी को निराशा हाथ लगी और वह विपक्ष में बैठने को बाध्य हुई। नारायण दत्त तिवारी जी कांग्रेस विधायक दल के नेता तथा अरुण कुमार सिंह उपनेता बने। यह विधानसभा अधिक दिनों तक नहीं चल सकी और १९९१ में हुए विधानसभा चुनाव में मुन्ना भाई रारी विधानसभा से चुनाव लड़ कर सपा उम्मीदवार से पराजित हुए और प्रदेश में मा. कल्याण सिंह जी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी।
६ दिसंबर १९९२ को बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने कल्याण सिंह की भाजपा सरकार को भंग कर राष्ट्रपति शासन लागू किया और राज्य का प्रशासन राज्यपाल मा. मोतीलाल बोरा देखने लगे और प्रकाश सिंह जी पुनः पुलिस महानिदेशक उ.प्र. बनाए गये। मैं मार्च १९९१ से पुलिस अधीक्षक, सिख आतंकवाद उन्मूलन अभियान पीलीभीत था, प्रकाश सिंह जी ने १९९३ में मुझे पुलिस अधीक्षक नगर, इलाहाबाद बना दिया।
१९९३ के अंत में प्रदेश विधानसभा का चुनाव हुआ, मुन्ना भाई मछलीशहर क्षेत्र से चुनाव लड़ कर सपा के ज्वाला प्रसाद यादव से पराजित हुए और प्रदेश में बसपा के समर्थन से मुलायम सिंह यादव जी की सपा की सरकार चलने लगी। इलाहाबाद में मेरे डीआईजी मुझसे व एसएसपी से अप्रसन्न रहते थे और प्रकाश सिंह के डीजी बीएसएफ बनने के बाद नये डीजीपी वीपी कपूर से मुझे स्थानांतरित कराने का प्रयास करने लगे, लेकिन मुन्ना का भाई होने के कारण बोरा जी ने मुझे नहीं हटाया था। मुलायम सिंह सरकार बनने के बाद जनवरी ९४ में मेरा स्थानांतरण पुलिस मुख्यालय इलाहाबाद हो गया।
१९९४ में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव तथा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष सीताराम केसरी का सोनिया गांधी से मनोमालिन्य होने के कारण गांधी परिवार के निष्ठावान कांग्रेसी नेताओं ने नरायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी से अलग नयी पार्टी बनाई जिसका नाम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (तिवारी) रखा गया जिसमें तिवारी जी के अलावा अर्जुन सिंह, माखन लाल फोतेदार, नटवर सिंह, रंगराजन कुमारमंगलम व अन्य के साथ अरुण कुमार सिंह भी शामिल थे।
वर्ष १९९६ के लोकसभा चुनाव में अरुण कुमार सिंह (तिवारी कांग्रेस) से जौनपुर संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़े लेकिन पराजित हुए। इसके उपरांत सोनिया गांधी जी के प्रयास से तिवारी कांग्रेस का मूल कांग्रेस पार्टी में विलय हो गया। १९९८ में मुन्ना भाई कांग्रेस पार्टी से जौनपुर संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़े लेकिन पराजित हुए। वर्ष १९९९ में मुन्ना भाई कांग्रेस पार्टी से मछलीशहर संसदीय क्षेत्र से सपा के सीएन सिंह से पराजित हुए। किसी भी पद के चुनाव के लिए उनका यह अंतिम प्रयास था।
वर्ष २००१ में मैं एसपी सिद्धार्थ नगर से एसपी आज़मगढ़ स्थानांतरण पर आया। उस समय भाजपा के मा. राजनाथ सिंह जी मुख्यमंत्री थे। उस समय पूर्वी उत्तर प्रदेश में आज़मगढ़ बसपा नेतृत्व का केंद्र था। धीरे-धीरे अन्य स्थानीय नेताओं के साथ बसपा के नेताओं से भी मेरे मधुर संबंध बन गये। मुन्ना भाई का बड़ा लड़का अभिषेक सिंह आशू मेरे पास आता रहता था, उसके बहुत से मित्र आज़मगढ़ के थे। एक दिन उसने कहा कि मैं वहाँ के बसपा नेताओं से बात कर उसे मुंगरा बादशाहपुर विधानसभा सीट से बसपा का टिकट दिला दूँ। मैंने उसे समझाया कि पिता जी कांग्रेस के नेता हैं, मेरे मुख्यमंत्री जी से अच्छे संबंध हैं, मेरे कहने पर बसपा तुम्हें क्यों टिकट देगी, लेकिन वह नहीं माना और बसपा से चुनाव लड़ने की जिद पर अड़ा था।
मैंने मुन्ना भाई से बात की, उन्होंने कोई आपत्ति नहीं की। मैंने इस संबंध में बसपा के नेताओं से बात की। धीरे-धीरे यह बात स्थानीय नेताओं को पता चल गई। २००२ का विधानसभा चुनाव सन्निकट था। एक दिन भाजपा के स्थानीय नेता ने मा. मुख्यमंत्री जी से मिल कर शिकायत की कि आज़मगढ़ का डीएम रवीन्द्र नाथ त्रिपाठी सपाई व एसपी बसपाई हैं, इन दोनों का तत्काल वहाँ से स्थानांतरण कर दिया जाए। डीएम के भाई जौनपुर से सपा के विधायक थे और मैं आशू के लिए बसपा से बात कर रहा था। मुख्यमंत्री जी हम दोनों को जानते थे इसलिए हमारा स्थानांतरण नहीं हुआ।
चुनाव से पहले बसपा के सुखदेव राजभर जी व जगदीश नारायण राय जी घर आकर बताए कि आशू का बादशाहपुर सीट से टिकट बहन जी ने कर दिया है, अगले दिन आशू लखनऊ आकर राय साहब के साथ बहन जी से मिल कर टिकट ले लें। मैंने तत्काल यह बात आशू को बता दी जो उस समय गाँव रामनगर में थे॥ देर रात मैंने मुन्ना भाई को भी यह बात बता दी जो दिल्ली में थे। उन्होंने कुछ नहीं कहा।
अगली सुबह ८ बजे मुन्ना भाई का फोन आया कि वह कांग्रेसी हैं यदि बेटा बसपा से लड़ेगा तो उनकी प्रतिष्ठा धूल में मिल जाएगी, मैं किसी तरह आशू को रोकूँ और उसे यह न बताऊँ कि उन्होंने रोका है। मैंने कहा कि जब मैंने आपको पहले ही बता दिया था तो आपने मुझे क्यों नहीं रोका, अब वह लखनऊ राय साहब के घर पहुँच गया होगा, मैं संपर्क नहीं कर पाऊँगा। थोड़ी देर बाद आशू का लखनऊ से फ़ोन आया कि जगदीश राय जी के यहाँ वह है अभी किसी का उनके पास फोन आया था, उसके बाद वह बसपा के टिकट के लिए मना कर दिए, लगता है कि पापा ने फोन कर मना कर दिया है।
मैं समझ तो गया लेकिन मैंने उसे सान्त्वना देते हुए अगले चुनाव में लड़ने के लिए कहा और मुन्ना भाई का इसमें रोल न होना बताया लेकिन वह मेरी बात पर विश्वास न कर रोने लगा। मुझे उसका रोना देख दुःख हुआ और मुन्ना भाई पर बहुत क्रोध आया। उसका टिकट कटने से पूरा परिवार दुखी और मुन्ना भाई से नाराज़ हो गया। इस सीट पर बसपा विजयी हुई थी। आशू लड़ा होता तो २००२ में ही विधायक हो गया होता। तुलसी बाबा बहुत पहले कह चुके हैं कि-
“हानि लाभ जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ।”
लेखक बद्री प्रसाद सिंह रिटायर आईपीएस अधिकारी और दिवंगत अरुण कुमार सिंह मुन्ना के छोटे भाई हैं।
क्रमशः
पिछला भाग…
अरुण कुमार सिंह मुन्ना (पार्ट 3) : राजीव गांधी के कार्यक्रम में उस दिन मुन्ना भाई न होते तो दोनों एसपी और मुझे अच्छी डांट पड़ती!


