बद्री प्रसाद सिंह-
वर्ष १९९४-९५ की सपा सरकार में मेरा ५ बार स्थानांतरण हुआ, परिणामस्वरूप मेरा छोटा बेटा इलाहाबाद के BHS के हास्टल में, बड़ा लड़का अलीगढ़ के SDM योगेश्वर राम मिश्र के घर, बेटी को लेकर पत्नी झाँसी में और मैं एटा पीएसी के एक सिपाही के मकान में रह रहा था जहाँ से हाउस गार्ड ड्यूटी लखनऊ लगने पर मैं लखनऊ आ गया और मुन्ना भाई के पार्क रोड वाले सरकारी मकान में आवासित हो गया। २ जून १९९५ को हुए “गेस्ट हाऊस कांड” का मैं चश्मदीद गवाह भी हूँ जिसके बाद सपा सरकार का पतन तथा भाजपा के सहयोग से मायावती सरकार की ताजपोशी हुई।
मायावती जी के ३ जून १९९५ को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने पर डॉ काश्मीर सिंह जी लखनऊ रेंज के डीआईजी बने और बहन जी से नज़दीकी संबंध होने के कारण उनके यहाँ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की हाज़िरी लगने लगी। १९९४ में जब मैं पुलिस अधीक्षक नगर इलाहाबाद था, तब काश्मीर सिंह जी मेरे एसएसपी थे और मेरे उनसे अच्छे संबंध थे। मैं भी उनसे मिलने गया तो पूछने पर मैंने एसपी सिटी इलाहाबाद के बाद की उक्त नियुक्तियाँ व उसके कारण बताए।
सपा शासन काल में मुझे प्रताड़ित किया गया था, इसलिए बसपा सरकार में मैं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बन गया और काश्मीर सिंह जी ने मेरी नियुक्ति पुलिस अधीक्षक नगर, वाराणसी के पद पर करा दी। १५ दिन बाद जब मैं उनसे मिला तो उन्होंने कहा कि मुन्ना भाई यदि बसपा में शामिल हो जाएं तो वह उन्हें बसपा का राष्ट्रीय महासचिव बनवा देंगे, मैं मुन्ना भाई को समझा कर बसपा में शामिल करवा दूँ।
मैंने मुन्ना भाई से बात की तो उन्होंने कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया। काश्मीर सिंह जी के कई फोन मेरे पास आए और मैं लगातार मुन्ना भाई से बात करता रहा। एक दिन उन्होंने कहा कि बसपा में महासचिव बनने से क्या फ़ायदा, बहन जी के सामने जमीन पर बैठना पड़ेगा और मुँह सीकर रहना पड़ेगा। कांग्रेस में बैठने को कुर्सी और बोलने की स्वतंत्रता तो है। मैंने यही बात काश्मीर सिंह जी को बता दी। उन्होंने कहा कि अब बहन जी की बैठकों में कुर्सी मिलती है परन्तु बोलने की आज़ादी तो नहीं है। मैंने भाई को यह बात भी बताई परन्तु उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि पद के लिए वह कांग्रेस पार्टी से विश्वासघात नहीं करेंगे।
मैंने काश्मीर सिंह जी को यह बात बता कर इस चैप्टर को बंद कराया। मायावती जी ३ जून से १८ अक्टूबर १९९५ तक मुख्यमंत्री रहीं, उसके बाद पुनः राष्ट्रपति शासन लागू हो गया।

अरुण कुमार सिंह मुन्ना कांग्रेस पार्टी की सेवा में निष्ठा से लगे रहे और सोनिया गांधी जी के विश्वासपात्र बने रहे। जून २००२ में उन्हें उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया और जुलाई २००३ तक अध्यक्ष रहे। मुन्ना भाई न तो कांग्रेस पार्टी के साथ विश्वासघात किया और न ही अपने स्वाभिमान से कभी समझौता किया। वह खाने पीने के शौकीन थे और गाली देने की आदत छात्र जीवन से ही थी। इनके अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस पार्टी में इनकी विरोधी लॉबी सक्रिय हो गयी और इनके गाली देने की आदत को कांग्रेस हाईकमान से बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया गया परिणामस्वरूप मई २००३ में उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद से हटा दिया गया।
वर्ष २००२ के विधानसभा चुनाव में बसपा की सरकार बनी और मुझे पूर्व मुख्यमंत्री मा. राजनाथ जी का क़रीबी मानकर एसपी आज़मगढ़ से महत्वहीन पद पर भेज दिया गया। २००३ में मा. मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव जी की सरकार बनने पर मुझे स्वतंत्रता सेनानी मानकर एसएसपी मेरठ बना दिया गया। २००४ में मेरठ के सरधना क़स्बे में साम्प्रदायिक संघर्ष में एक हिंदू की मृत्यु हो गई और मैं निलंबित कर दिया गया यद्यपि मैं उस तिथि को स्वीकृत अवकाश पर था।
मैं तीन दिन बाद लखनऊ आकर डीजीपी वीकेबी नायर साहब से मिला और अपने निलंबन के विषय में पूछा तो वह बताए कि कुछ दिन पूर्व तुम्हारे भाई अरुण कुमार सिंह मुन्ना ने प्रेस में मा. मुख्यमंत्री जी की कटु शब्दों में निंदा की थी इसी कारण से दंगे की रिपोर्ट में दोषी अधिकारियों की सूची में उन्होंने तुम्हारा नाम बढ़वा कर अन्य के साथ तुम्हें भी निलंबित कर दिया। वह तुमसे रुष्ट नहीं हैं, तुम दो तीन दिन बाद मुन्ना जी से मुख्यमंत्री जी को कहला दो, तुम बहाल हो जाओगे। मैंने कहा कि नौकरी मैं कर रहा हूँ मुन्ना भाई से क्यों कहलाऊँ। नायर साहब ने मुझे बहुत समझाया लेकिन मैं मुन्ना भाई से अपनी सिफारिश कराना उनकी शान के खिलाफ माना।
मैंने पूरी बात मुन्ना भाई को बताकर कहा कि वह मेरी सिफारिश मुख्यमंत्री से न करें, मेरी गलती नहीं है मैं बहाल हो जाऊँगा। न मुन्ना भाई ने मुलायम सिंह यादव जी से मेरी बहाली के लिए कही और न मैं बहाल हुआ, और ७ माह व्यतीत हो गए। एक दिन एडीशनल डीजी शैलजाकांत मिश्र जी के घर विवाह समारोह में शाम को मुन्ना भाई गए थे, वहाँ उपस्थित कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने उनसे मेरे निलंबन समाप्त कराने के लिये मुख्यमंत्री जी से सिफारिश करने को कहा तो वह बोले कि बद्री ने मना किया है। अधिकारियों ने कहा कि वह मूर्ख है आप आज ही उनसे कह दीजिए मुख्यमंत्री जी अभी यहीं आने वाले हैं।
मुख्यमंत्री जी के आने पर मुन्ना भाई उनके साथ सोफे पर बैठे। बातों-बातों में भाई ने मुख्यमंत्री जी से कहा कि आजकल वह बदल गए हैं और विपक्ष के नेताओं व उनके संबंधियों को परेशान कर रहे हैं। मुख्यमंत्री जी के नकारने पर बोले कि यदि ऐसा नहीं है तो बद्री को क्यों निलंबित किया जबकि वह घटना के समय अवकाश पर था। मुख्यमंत्री जी मुस्कराते हुये बोले कल बहाल कर देंगे।
भाई ने लौटकर यह बात मुझे बताई। अगले दिन ४ बजे शाम मैं प्रमुख सचिव गृह के पास गया तो वह बोले कि तुम्हारे लिए ख़ुशख़बरी है, तुम बहाल हो गए। मैंने उनका आभार व्यक्त किया तो बोले कि इसमें उनका या किसी अन्य का कोई रोल नहीं है, तुम राजनीतिक कारणों से निलंबित हुए थे और राजनीतिक कारण से बहाल हुए हो। मैं मुस्कराता हुआ वहाँ से लौट आया और मैं बहाल हो गया।
लेखक बद्री प्रसाद सिंह रिटायर आईपीएस अधिकारी और दिवंगत अरुण कुमार सिंह मुन्ना के छोटे भाई हैं।
क्रमशः
पिछला भाग…
अरुण कुमार सिंह मुन्ना (पार्ट 4) : एक दिन भाजपा नेता ने मुख्यमंत्री जी को शिकायत पहुँचाई कि आज़मगढ़ का डीएम सपाई व एसपी बसपाई है!



