1991 के पूजा स्थल विधेयक के अनुसार 1947 की स्थिति कायम रखनी है। यहां वर्ष 2003 में स्थिति बदलने की ‘खबर’ है। कानून के मामले मैं नहीं समझता लेकिन किसी अखबार में 1991 के पूजा स्थल कानून के आलोक में इस पर कोई टिप्पणी नहीं दिखी। द हिन्दू की लीड के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट जीवन और आज़ादी से जुड़े ज़रूरी मामलों के लिए एसओपी पर विचार कर रहा है। इस पर आखिर में। मैंने कल यहां लिखा था, धार्मिक विवाद मध्यस्थता से ‘सुलझाने की कोशिश’ को झटका और खबर को मिला महत्व! शीर्षक के आलोक में यह देखा जाना चाहिए कि 1991 के ‘पूजा स्थल अधिनियम के बाद स्थिति क्या होनी चाहिए। इस कानून की धारा 3 और 4 स्पष्ट रूप से कहती हैं कि 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस रूप में था, उसका धार्मिक स्वरूप बदला नहीं जा सकता। इसके बावजूद ज्ञानवापी, मथुरा व संभल विवाद बने रहने या चलते रहने का कोई कारण नहीं है। आज भोजशाला विवाद उसमें जोड़ लीजिए। मुझे लगता है कि इस कानून के सम्मान में और देशहित में किसी भी धार्मिक स्थल से संबंधित ऐसे मामलों पर अदालतों को विचार ही नहीं करना चाहिए। पर यह होगा कैसे? या हो सकता है? होना चाहिए?
संजय कुमार सिंह
आज जब 30 भारतीय क्रू वाले दो टैंकर्स पर ईरानी हमले में एक मौत और 10 के जख्मी होने की खबर कई अखबारों में लीड है तब अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, तनाव नहीं बढ़ा सकते…मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर से अलग जुमे की नमाज के लिए दी जाए जगह। उपशीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम पक्ष की याचिकाओं पर सुनवाई के लिए सहमत, परिसर में नमाज पढ़ने पर रहेगी रोक। कहा, यह सिर्फ अंतरिम व्यवस्था, तीन सप्ताह बाद होगी अंतिम सुनवाई, सभी पक्षों को नोटिस जारी। अमर उजाला में कल लीड का शीर्षक था, ज्ञानवापी, मथुरा व संभल विवाद मध्यस्थता के जरिए सुलझाने से दोनों पक्षों का इनकार। उपशीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने की थी पहल : ज्ञानवापी मामले में वाराणसी जिला प्रशासन ने आज दोनों पक्षों को बुलाया। मैं आज जिला प्रशासन की बैठक की खबर लीड होने की उम्मीद कर रहा था। आप जानते हैं कि अमर उजाला मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश का अखबार है। इसलिए ज्ञानवापी, मथुरा व संभल विवाद का उत्तर प्रदेश के अखबार के लिए अलग महत्व है और उसे हिन्दू पक्ष की रिपोर्टिंग नहीं कहा जा सकता है। आज उस बैठक की खबर का शीर्षक पांच कॉलम में है और लीड के नीचे छपी है। शीर्षक है, 35 साल से कोर्ट में चल रहे ज्ञानवापी मामले की मध्यस्थता 32 मिनट में खत्म। उपशीर्षक है, हिन्दू व मुस्लिम पक्ष ने मौखिक ही बता दिया कि मध्यस्थता नहीं चाहिए, अदालत में हो नियमित सुनवाई… जो फैसला होगा उसे मानेंगे। जाहिर है, खबर मध्यस्थता की कोशिश को महत्व देने की है। लेकिन मध्य प्रदेश का मामला भी आज लीड है और यह अंग्रेजी अखबारों में भी है। लेकिन 1991 के पूजा स्थल विधेयक, उसके मकसद आदि की चर्चा खबरों में नहीं है। इसलिए कहा जा सकता है कि मामले की रिपोर्टिंग हिन्दुओं की तरफ से की गई लगती है। निष्पक्ष तो नहीं है। और बात सिर्फ हिन्दी अखबारों की नहीं है।
दैनिक भास्कर और देशबन्धु में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। दि एशियन एज में पहले पन्ने पर तीन कॉलम में छपी खबर का शीर्षक है, भोजशाला मामले पर सुप्रीम कोर्ट अर्जेन्ट आधार पर सुनवाई करेगा, ‘धैर्य’ रखने की अपील की। जुम्मे की नमाज के लिए मुसलमानों को अलग जगह देने का निर्देश। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर तीन कॉलम में टॉप पर है। शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने भोजशाला के पास जुम्मे की नमाज के लिए जगह दी। इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक है, “भोजशाला विवाद : सुप्रीम कोर्ट ने जुम्मे की नमाज के लिए वैकल्पिक स्थान का आदेश दिया”। पीठ ने यथास्थिति बहाल करने का आदेश देने से इनकार किया, विवाद पर विस्तार से चर्चा करेगी। यहां अमर उजाला में लीड के साथ छपी खबरें उल्लेखनीय हैं – सॉलिसिटर जनरल ने किया नमाज की मांग का विरोध और भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत बोले – सोच समझकर आगे बढ़ने की जरूरत है। पांच कॉलम की लीड के साथ और भी खबरें हैं। कई तथ्य और सूचनाएं हैं लेकिन 1991 के पूजा स्थल विधेयक की चर्चा मुझे नहीं दिखी और जो हो रहा है वह इस कानून के बावजूद है तो उसके खिलाफ हो या नहीं – बावजूद है जरूर बताया जाना चाहिए। कानूनी स्थिति मुझे या किसी पत्रकार या संपादक को मालूम होने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। लेकिन सांप्रदायिकता रोकने के मकसद से बनाए गए एक कानून की जानकारी और समय पर उसका उल्लेख तो होना ही चाहिए। यही पत्रकारिता है। लेकिन इन दिनों जो पत्रकारिता हो रही है उसके क्या कहने। राजनीति, कानून, समाज और सरकार का हाल यह है कि टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर छपी लीड के अनुसार, ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टुआर्ट स्टेन्स और उनके दो बच्चों को जिन्दा जला देने के मामले में 2000 से जेल में बंद दारा सिंह की रिहाई के आसार बन रहे हैं। मामला उड़ीशा के क्योंझर जिले का है और 22 जनवरी 1999 को यह कांड हुआ था। अब वहां डबल इंजन की सरकार है।
दारा सिंह को 2003 में फांसी की सजा हुई थी। 2005 में उड़ीशा हाईकोर्ट ने दारा सिंह की मौत की सजा को उम्र कैद में बदल दी थी और 11 अन्य को बरी कर दिया था। बरी किए गए 11 लोगों के नाम सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं है। पुरानी खबरों के अनुसार इनलोगों (या इनमें से कुछ) ने सीबीआई पर फंसाने का आरोप लगाया था। मुआवजे की मांग भी की थी। यह मांग अब मुख्यमंत्रियों ने नहीं की है। कानून बन रहा है कि 30 दिन से ज्यादा जेल रहे तो पद चला जाएगा। यही सरकार चुनाव जीतती रहे उसके लिए जो व्यवस्था हो रही है सो आप जानते ही हैं। मुझे लगता है कि पत्रकारिता को निष्पक्ष और स्वतंत्र करना समय की सबसे बड़ी जरूरत है लेकिन वह अलग मुद्दा है। इसी तरह, हम पूर्व और वर्तमान जजों, उनके राजनीतिक रूझान, तबादले, इनाम और कारनामों के बारे में जानते हैं। यह भी कि मामलों में क्या कार्रवाई हुई और वह भी अलग मुद्दा है। अभी तो मुद्दा यह है कि बांग्लादेशी लेखिका तस्लीम नसरीन दो दशक बाद कलकत्ता जा रही हैं। हाल में खबर थी कि निर्वासित प्रधानमंत्री शेख हसीना भी बांग्लादेश जाने वाली हैं। तस्लीमा नसरीन को कट्टरपंथी धार्मिक समूहों के हिंसक विरोध और जान से मारने की धमकियों (फतवों) के कारण 1994 में बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था। उनके उपन्यास ‘लज्जा’ (बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार पर आधारित) और उनकी आत्मकथाओं में महिला अधिकारों व धर्मनिरपेक्षता पर बेबाक विचारों को लेकर कट्टरपंथियों ने उन पर ईशनिंदा का आरोप लगाया था। तसलीमा नसरीन 2007 से कलकत्ता नहीं गई हैं। तत्कालीन लेफ्ट सरकार के दौरान तसलीमा के खिलाफ तीव्र प्रदर्शन हुआ था। इसके बाद उन्हें शहर छोड़ना पड़ा था। आज छपी खबरों के अनुसार, बांग्लादेश से निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन लगभग 20 वर्षों के बाद कोलकाता लौट रही हैं। वे 1 अगस्त को रवींद्र सदन में कट्टरपंथ-विरोधी एक कार्यक्रम में शिरकत करेंगी। द टेलीग्राफ में यह खबर सेकेंड लीड है। हालांकि, आज भारतीय नाविकों पर हमला और एक की मौत ही ज्यादातर अखबारों की लीड है।
द टेलीग्राफ का फ्लैग शीर्षक है, होर्मुज में मिसाइल से नाविक की मौत और कइयों के घायल होने पर गंभीर चिन्ता। मुख्य शीर्षक है, नाविक की मौत, भारत ने ईरान को तलब किया। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, भारतीय नाविक मारा गया, ईरान के हमले में 10 जख्मी। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, नए हमलों में नाविक की मृत्यु पर सरकार ने ईरान से विरोध दर्ज करवाया। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, होर्मुज में ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात के टैंकर पर हमला किया, एक और भारतीय की मौत। इसके साथ छपी एक खबर के अनुसार सरकार ने कहा है, नाविकों पर नजर रखने के लिए डैशबोर्ड और परिवारों के लिए लायजन ऑफिसर। आज द हिन्दू और दि एशियन एज की लीड भी आम अखबारों से अलग है। पंजाब में चुनाव करीब है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पंजाब के लिए ढाई हजार करोड़ के पैकेज की घोषणा करने वाले हैं। यह घोषणा शुक्रवार को होनी है लेकिन खबर आज ही लीड है। एक्सक्लूसिव खबरें पहले आने पर लीड बनती हैं। लेकिन यह तो सरकारी प्रचार है। अखबार ने बताया है कि भाजपा पंजाब में अकेले ही लड़ने की तैयारी में है। हिन्दी अखबारों में नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, ईरानी हमले में भारतीय की मौत। होर्मुज में दो व्यापारिक जहाजों पर हमला, 10 घायल। देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, ईरान के मिसाइल हमले में एक भारतीय की मौत। नाविक की मौत के बाद भारत ने ईरानी राजनयिकों को किया तलब। दैनिक भास्कर की लीड भी ऐसी ही है। पहले बता चुका हूं कि अकेले अमर उजाला की लीड धार के भोजशाला पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की खबर है। यह दिलचस्प है कि दैनिक जागरण ने भी होर्मुज पर ईरानी हमले में भारतीय नाविक की मौत, 10 घायल को लीड बनाया है भले टॉप पर सात कॉलम का शीर्षक है, भोजशाला को वाग्देवी मंदिर घोषित करने के हाईकोर्ट के आदेश पर रोक नहीं। इसके साथ दो कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, श्रीकृष्ण जन्मस्थान को लेकर कारसेवा का आह्वान, तिथि बाद में होगी।
द हिन्दू की लीड अलग से चर्चा के लायक है। शीर्षक औऱ हाइलाइट किए अंश के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट जीवन और आज़ादी से जुड़े ज़रूरी मामलों के लिए एसओपी पर विचार कर रहा है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि संवैधानिक उपाय हर समय उपलब्ध होने चाहिए। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच का कहना है कि न्याय की ज़रूरी मांगों पर ‘रिस्पॉन्स टाइम’ (जवाब देने में लगने वाले समय) को कम करने के लिए एक एसओपी लागू किया जा सकता है। याचिकाकर्ता माहेरवीश रेन ने कहा है, न्यायिक पहुंच को लगातार बनाए रखने के लिए व्यवस्थित और संस्थागत तंत्र न होने के ऐसे नतीजे हो सकते हैं जो बाद में बदले न जा सकें। सॉलिसिटर-जनरल तुषार मेहता ने कहा है कि एसओपी तैयार करने का काम सुप्रीम कोर्ट को अपने न्यायिक पक्ष के बजाय प्रशासनिक पक्ष से करना चाहिए। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने कहा है, संभव है कि किसी ज़रूरी मामले का ज़िक्र होने के एक घंटे के भीतर कोर्ट की ओर से जवाब आए। हाल की कुछ घटनाओं और इस याचिका के आलोक में सुप्रीम कोर्ट अगर कुछ करता है तो ‘देर आए दुरुस्त आए’ वाले सुधारात्मक कदम के रूप में देखा जाना चाहिए। “न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है” और ऐसा अक्सर होता है। दूसरी ओर, पूजा स्थलों के मामले में अगर यह उम्मीद की जा रही है कि अभी ही न्याया होना है या हो सकता है तो मामला चिन्ताजनक है। न्याय समय पर होना चाहिए लेकिन कानून के अनुसार और न्याय की देवी की आंखों की पट्टी हट गई है तो सब कुछ देख समझ कर। मध्य प्रदेश के राज्यसभा चुनाव में जो हुआ वह आंखों की पट्टी के साथ ही हुआ लगता है लेकिन तमाम मामलों में पट्टी हट गई लगती है। मामला दो तरह का तो नहीं ही होना चाहिए।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



