टाइम्स ऑफ इंडिया ने मरने वाले 21 लोगों में कई विदेशी लिखा है और यह शीर्षक में है, नवोदय टाइम्स के अनुसार 11 विदेशी हैं
संजय कुमार सिंह
प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का शोक संदेश नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर है। अमर उजाला में प्रधानमंत्री का शोक संदेश है। दोनों अखबारों में प्रधानमंत्री राहत कोष से मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख और घायलों को 50,000 रुपए की मदद की घोषणा है। अंग्रेजी अखबारों में यह प्रचार नहीं है। दि एशियन एज के उपशीर्षक में एक बुलेट है – प्रधानमंत्री ने सहायता का आदेश दिया। अमर उजाला ने एलजी ने दिए कड़े निर्देश को भी पहले पन्ने पर छापा है। कहने की जरूरत नहीं है कि अखबारों ने आज जिन कमियों का उल्लेख किया है, पहले किया होता और एलजी ने पहले जांच कराई होती तो शायद यह हादसा नहीं होता। वे हादसे का इंतजार कर रहे थे ऐसी कोई खबर नहीं है और मुझे याद नहीं है कि पहले के हादसों के बाद जांच हुई या नहीं और हुई तो क्या हुआ या क्यों नहीं हुई। मुझे यह जरूर याद है कि हमारे समय में अखबारों में शिकायतों का एक कॉलम होता था। जनसत्ता में कई बार पूरे एक पन्ने में पाठकों की शिकायत छपती थी। जाहिर है, उसका दबाव पड़ता होगा और समाधान होता होगा तभी लोग लिखते थे। लेकिन अब जनता से शिकायत का अधिकार छीन लिया गया है। अपनी एक शिकायत छपवाने के लिए मित्र पर दबाव डाला तो उसने यह कहकर जान बचाई कि अब किसी ब्रांड के नाम से शिकायती खबर छापने के लिए विज्ञापन वालों से अनुमति लेनी होती है। खबरों और सूचना के मामले में अखबारों की हालत यह है कि आग लगने जैसे हादसे में मरने वाले विदेशियों की संख्या को लेकर भ्रम है। मरे 12 या 11 विदेशियों की सही गिनती नहीं बता पाया है या इसकी जरूरत ही नहीं समझी। ज्यादातर अखबारों ने पुलिस के हवाले से 12 विदेशियों के मरने की बात लिखी है। नवोदय टाइम्स में 11 विदेशी नागरिकों के मरने की खबर है। इनमें नौ अफ्रीका के और दो तुर्कमेनिस्तान के बताए गए हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने मरने वाले 21 लोगों में कई विदेशी लिखा है और यह शीर्षक में है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह टीवी या डिजिटल मीडिया का ब्रेकिंग न्यूज नहीं है। सुबह की घटना की रिपोर्ट रात में छप कर सुबह पढ़ने के लिए आई है। मुझे नहीं लगता है कि अब किसी के पास ऐसे विवरण के लिए अखबार पढ़ने का समय है लेकिन जो खरीद रहे है और मेरी तरह पढ़ रहे हैं उनके लिए अखबारों में कुछ विशेष नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, घर से दूर मरे विदेशियों के लिए अस्पतालों में बहुत कम लोग दिखे। 12 विदेशियों की मौत के अलावा कुछ के घायल होने की भी खबर है और संभावना है कि उनके परिवार को सूचना भी न हो। दूसरी ओर, अमर उजाला में एक शीर्षक है, दो-दो लाख रुपए की मदद। खबर के अनुसार प्रधानमंत्री राहत कोष से मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपए और घायलों को 50 हजार रुपए की मदद की जाएगी। जो नहीं जानते उन्हें बता दूं कि हादसा मैक्स, साकेत के सामने के होटलों में से एक में हुआ है। मैक्स और पास के अस्पताल में इलाज कराने आए लोगों के तीमारदार इन होटलों में रहते थे। अब जब तीमारदार भी घायल हैं तो उन्हें 50 हजार रुपए मिलेंगे (यह खबर या प्रचार है)। तथ्य यह है कि मैक्स जैसे अस्पताल की इमरजेंसी में प्राथमिक उपचार के बाद अगर डॉक्टर अस्पताल में दाखिल कराने के लिए कहता है तो शुरुआती राशि 50,000 होती है (थी)। हालांकि अखबार में एक खबर है जो बता रही है कि घायलों और मृतकों को एम्स ले जाया गया है। यहां अपेक्षाकृत कम पैसे लगते हैं। यह तथ्य विदेश में भारत की क्या छवि बनाएगा पता नहीं। मरने वालों के लिए दो लाख रुपए तो खैर नागरिकों की कीमत है और कोविड में मरने वालों को यह भी नहीं मिला था। 144 करोड़ की आबादी में यह सब कोई खास बात नहीं हो सकती है। एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 96 रुपए मानूं को दो लाख रुपए 2100 डॉलर भी नहीं होंगे। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री की सेवा में पहले पन्ने पर ऐसी खबरें छापने से बेहतर होता कि सरकार इलाज का खर्च देती। विदेशियों के रिश्तेदारों को सूचना देने, उनके आने की विशेष व्यवस्था करती। भारत सरकार देश में इलाज कराने आए लोगों के मारे गए रिश्तेदारों के प्रति इतनी संवेदना शून्य है तो इसीलिए कि वह नागरिकों के प्रति भी ऐसी ही है। फिर भी अमर उजाला जैसे अखबार सरकार को दयालु दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। मुफ्त राशन पर जी रहे लोगों के लिए 50,000 रुपए निश्चित रूप से बहुत होंगे।
कहने की जरूरत नहीं है कि अमीरों के बच्चे जब पढ़ने के लिए अमेरिका इंग्लैंड जाते हैं तो कुछ देशों के बच्चे भारत भी आते हैं। लेकिन भारत में शिक्षा परीक्षा की जो हालत है उसमें उस ‘धंधे’ पर तो असर पड़ना ही है। इलाज के मामले में ऐसे हादसे और उस पर सरकार के रुख से इलाज का व्यवसाय भी खराब होगा। नीट की जो हालत है उससे भी हो रहा है और 2047 के भारत की कल्पना की जा सकती है लेकिन अभी वह मुद्दा नहीं है। अभी इसका असर निश्चित रूप से देश की अर्थव्यवस्था और जीडीपी पर पड़ेगा। हम स्वदेशी अपनाकर काम चला लेंगे। वैसे भी सरकार ने विदेशों से काले धन का निवेश रोकने के नाम पर लाखों शेल कंपनियां बंद करवाई है, विदेशी चंदे से सेवा और व्यवसाय करने वाले सरकार का विरोध करने लायक नहीं रहें इसके लिए चंदा लेने के नियम सख्त किए गए हैं और कई एनजीओ बंद हो गए हैं। वरना यह हो सकता था कि कोई एनजीओ विदेशियों उनके रिश्तेदारों का खर्च उठा लेता। अतिथि देवो भवः वाले देश में अतिथियों के प्रति सरकारी संवेदनहीनता खबर भी नहीं है। कायदे से सरकार को विदेशियों के इलाज का खर्च भी उठाना चाहिए। जहां तक आग लगने के बाद कार्रवाई की बात है – सरकार बलि के बकरे तलाशेगी। उनके भी पैसे ही खर्च होने हैं। कार्रवाई कैसी भी हो, जो मरे उन्हें वापस आना नहीं है। सिस्टम ठीक होना नहीं है। आग लगती रहेगी लोग मरते रहेंगे। जनता मंत्रियो – अफसरों के वेतन भत्तों के लिए टैक्स देती रहेगी। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकारी व्यवस्था ऐसी है कि जिम्मेदार अफसरों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती है और वे रिश्वत वसूलने (और ऊपर तक पहुंचाने) के अलावा कोई काम नहीं करते हैं। नियम ऐसे हैं कि पालन मुश्किल है और मजबूरी में पैसे देने के बाद अगर कोई बुनियादी जरूरत की सुविधा भी नहीं रखे तो कोई देखने वाला नहीं है। नियम ऐसे हैं कि अनुपालन बहुत महंगा है और बिना अनुपालन रिश्वत देना मजबूरी है। इसलिए बुनियादी सुविधाएं भी नहीं होती हैं। हादसे के बाद भी नियमों का अनुपालन या अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए कुछ नहीं किया जाता है। मुझे लगता है कि आज इलाके के अग्नि शमन अधिकारी का पक्ष प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए था आखिर एनओसी के बिना होटल चल क्यों रहा था? होटल मालिक को गिरफ्तार किया जाना ठीक हो सकता है लेकिन जिम्मेदार अफसरों को क्यों नहीं? अब इसकी चर्चा विदेशों में तो होगी ही, क्या इससे बदनामी नहीं होगी। किसी को परवाह है?
सब चंगा सी – के बावजूद
देशबन्धु में मूल खबर के अलावा एक खबर का शीर्षक है, ना इमरजेंसी गेट, ना वेंटिलेशन, ना कोई फायर एनओसी। इसके साथ एक खबर का शीर्षक है, होटल संचालकों में हड़कंप। इसमें कहा गया है कि प्रशासनिक कार्रवाई व सीलिंग के डर से आस-पास के कई होटलों में ताले लटका दिए गए हैं। सवाल उठता है कि वहां होटल की जरूरत है, जिनकी पास संपत्ति है वे होटल चलाने का व्यवसाय करना चाहते हैं। फिर प्रशासनिक कार्रवाई का डर क्यों? कारण यह हो सकता है कि छोटे-सस्ते होटलों के लिए भी नियम और टैक्स वैसे ही हों। या जो भी हों उनका अनुपाल सुनिश्चित नहीं किया गया है और हादसे के बाद सख्ती से लोगों ने ताले लगा दिए हैं। यह समस्या का समाधान नहीं है क्योंकि कुछ दिनों के बाद फिर ऐसे ही चलने लगेंगे जबकि आग से बचने के उपाय सुनिश्चित करना जरूरी है और कर लें तो चलने देना चाहिए। हादसा नहीं हुआ है तो अभी जुर्माने आदि से छूट देने का व्यावहारिक तरीका अपनाया जाना चाहिए। आज की दूसरी महत्वपूर्ण खबरों में हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार, कुवैत एयरपोर्ट पर ईरान के हमले से तनाव बढ़ा और इसमें एक भारतीय की मौत हो गई। भारत ने इस हमले की निंदा की है। विदेश मंत्रालय ने भी ज़ोर देकर कहा है कि आम नागरिकों और नागरिक इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। 28 फरवरी को ईरान और अमेरिका के बीच शुरू हुई लड़ाई के बाद से, इस ताज़ा घटना के साथ मरने वाले भारतीयों की कुल संख्या कम से कम 10 हो गई है। इस युद्ध से पहले प्रचार किया जाता था कि भारतीयों की रक्षा के लिए प्रधानमंत्री युद्ध रुकवा देते हैं। आप जानते हैं कि चुनाव लड़ने और जीतने में व्यस्त रहने वाले नरेन्द्र मोदी ने गंगोत्री से गंगासागर तक भाजपा का प्रसार कर दिया है। बंगाल में चुनाव जीतने के बाद तब की सत्तारूढ़ और अब प्रमुख विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस में विभाजन हो गया है। द टेलीग्राफ की एक खबर के अनुसार तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी ने कलकत्ता के मेयर फरहाद हाकिम को इस्तीफा देने और कलकत्ता म्युनिसिपल कॉरपोरेशन छोड़ने पर ‘सहमति’ दे दी है। सुभजोय रॉय की खबर के अनुसार, हाकिम के करीबी सूत्रों ने बताया कि वह पिछले कुछ दिनों से ममता को मेयर पद से इस्तीफ़ा देने की अपनी इच्छा के बारे में बता रहे थे। हाकिम ने अपने करीबी लोगों से यह भी कहा है कि वह लगभग हर दिन कोलकाता नगर निगम जाते हैं लेकिन बहुत कम अधिकारी या विज़िटर उनके दफ़्तर आते हैं।
द हिन्दू में छपी जनगणना से संबंधित खबर डबल इंजन वाले राजस्थान की है। खबर के अनुसार, जनगणना 2027 के डेटा में ‘विसंगतियों’ की दोबारा जाँच का आदेश दिए गए हैं। जनगणना में जो डेटा सामने आ रहा है, वह सरकारी रिकॉर्ड से अलग है – खासकर खुले में शौच और घरों में बिजली या कुकिंग गैस कनेक्शन की उपलब्धता जैसे मुद्दों पर। इस पर जनगणना करने वालों का कहना है कि वरिष्ठ अधिकारियों ने उनसे घरों में दोबारा जाकर डेटा की “विसंगतियों” को ठीक करने के लिए कहा है। आप इसका मतलब समझ सकते हैं और आगे की खबर का इंतजार करना चाहिए। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को कुछ श्रेणियों की सिक्योरिटीज़ में विदेशी निवेशकों के लिए टैक्स नियमों में ढील देने वाले एक अध्यादेश की सिफ़ारिश की। वित्त मंत्रालय द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव का विवरण तुरंत उपलब्ध नहीं हो पाया। हालांकि, इसे रुपये को मज़बूत करने की एक कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। जनवरी से अब तक विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेशकों द्वारा इक्विटी से रिकॉर्ड 2.6 लाख करोड़ रुपये निकालने के कारण रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 6% कमज़ोर हो गया है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर डबल इंजन वाले उत्तर प्रदेश के प्रयागराज यानी इलाहाबाद से है। खबर के अनुसार मोमबत्ती की रोशनी वाले विरोध के बाद की गई सरकारी कार्रवाई में तीन कोचिंग सेंटर सील कर दिए गए हैं। इससे छात्रों में बेचैनी है। भर्ती परीक्षा से कुछ दिन पहले की गई इस कार्रवाई से प्रशासन ने किसी भी संबंध से इनकार किया है। लखनऊ डेटलाइन से मनीष साहू की खबर के अनुसार, यह कार्रवाई इन तीन संस्थानों के मालिकों द्वारा 29 मई को प्रयागराज में आयोजित एक कैंडल लाइट मार्च में हिस्सा लेने के बाद हुई है। इसका आयोजन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों ने किया था। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में शिक्षा परीक्षा की बदहाली के बाद कोचिंग सेंटर के खिलाफ तो कार्रवाई हो ही रही है, सरकार समर्थक एक एंकर ने कोचिंग करने वाले शिक्षकों के खिलाफ टिप्पणी की और शिक्षकों के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


