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हे अंधे मीडिया मंचों; बचकानी उछल कूद करते ‘बाबा’ के मायाजाल से बाहर आओ!

राहुल देव-

‘भक्तों’ के भ्रम-भंजन के लिए खेद है। किंतु यह काम लोकहित में ज़रूरी है। दो तीन दिनों से भक्तगण ही नहीं प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी-हिंदी अख़बार भी धीरेंद्र शास्त्री के ब्रिटिश संसद में हनुमान चालीसा पाठ पर गदगद कंठ से उसे ऐतिहासिक, इतिहास में पहली बार बता रहे हैं। ज़रा सा सामान्य ज्ञान और पाँच मिनट की गूगल खोज उन्हें बता देती कि ब्रिटिश हाउस ऑफ लॉर्ड्स और हाउस ऑफ कॉमन्स दोनों में कई समिति-सभा कक्ष हैं जो किसी भी तरह के कार्यक्रम के लिए भाड़े पर लिए जा सकते हैं। बुकिंग के लिए किसी ब्रिटिश सांसद को संस्तुति करनी होती है।

संलग्न स्क्रीन शॉट देख कर समझ में आ जाएगा।

धीरेंद्र शास्त्री की अगुवाई में हनुमान चालीसा पाठ का वीडियो भी दिखा रहा है कि यह वेस्टमिंस्टर महल का, जिसमें ब्रिटिश संसद के दोनों सदन हैं, एक कमरा है। उसमें पहचान के लिए हाउस ऑफ कॉमन्स का प्रतीक चिन्ह दो-तीन जगह लगा दिया गया है। इसके अलावा उसमें और किसी भी सामान्य समिति कक्ष में कोई अंतर नहीं है। यानी यह भाड़े पर बुक किया हुआ कमरा है।

अब चालीसा पाठ की बात। अभी ८ जुलाई को ही वहाँ नौ साल से नियमित चल रहे ध्रुव छत्रालिया नाम के एक सज्जन का हनुमान चालीसा यज्ञ संपन्न हुआ है। उसकी जानकारी और तस्वीरें भी संलग्न हैं। आयोजक संस्था द्वारा हिंदू शास्त्रों और ज्ञान पर संसद सहित यूके के विभिन्न स्थानों पर सैकड़ों आयोजनों की सूचना भी मिल जाएगी।

हमारे मित्र तेजेंद्र शर्मा तो लगभग हर साल किसी एक या दो हिंदी साहित्यकारों को इसी संसद में पुरस्कृत करते हैं।

इसलिए हे ‘भक्तों’, और उनसे ज़्यादा अंधे मीडिया मंचों, इस नए बड़ी हल्की क़िस्म की चतुराई से भरे बचकानी उछल-कूद वाले ‘बाबा’ के मायाजाल से बाहर आओ और अपने सच्चे धार्मिक-आध्यात्मिक गुरुओं को खोजो, उनसे ज्ञान प्राप्त करो। सरकारी बाबाओं और भगवाधारी असंतों के चंगुल से हिंदू धर्म को बचाओ। ख़ुद भी बचो।

संतों का एक लक्षण उनके जीवन, दिनचर्या, आचार-व्यवहार-भाषा-भेष-भंगिमा की सादगी और सरलता होता है। शास्त्रों में सद्गुणों में आर्जव का हर जगह उल्लेख मिलता है। आर्जव ऋजुता से आता है, यानी सरलता, सहजता। जहाँ सरलता और सादगी का अभाव और भूषा-भंगिमा की रंगीनी दिखे, लोगों को प्रभावित करने के तौर-तरीके दिखें समझ जाओ वहाँ छल है। नाटक मंडलियों और फ़िल्मों की तरह मेकअप करके बैठने वाले उपदेशकों-कृष्ण जैसी मोहनी मूरत और हाव-भाव बना कर भागवत कहने वालों से प्रभावित होना छोड़ो।

और अंतिम बात – धीरेंद्र शास्त्री में स्वामी विवेकानंद का पुनर्जन्म देखने वाले दृष्टाओं को सुझाव है कि विद्वानों और शिक्षितों के समूह में यह न कह दीजिएगा। हँसी तो उड़ेगी ही मूर्ख भी कहलाएँगे। यह पढ़ कर दुख तो होगा आपको लेकिन बड़े अपयश से शायद बच जाएँगे। किंतु अपनी यह आस्था उन तक ज़रूर पहुँचा दीजिएगा। प्रसन्न होंगे और क्या पता आपके लाभ का कोई चमत्कार ही कर दें।

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