अलग किस्म की ‘खबर’ और उसकी दिलचस्प प्रस्तुति। दि एशियन एज का एक फ्लैग शीर्षक है, चुनाव आयोग के ताजा बयान के बाद एनडीए के सहयोगी आयोग के साथ एकजुट हुए। अगर चुनाव आयोग, स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से काम कर रहा होता तो एनडीए के सहयोगियों को उसके साथ एकजुट होने की क्या जरूरत थी? भाजपा के मामले में दुनिया जानती है ईवीएम नई आई थी तो जोरदार विरोध किया गया था और तबके प्रवक्ता ने किताब भी लिखी थी। अब वही बात सच हो रही है और भाजपा चुनाव आयोग का साथ दे रही है। अभी खास बात यह भी है भाजपा या राजग के सहयोगी भी कह रहे हैं, चुनाव आयोग को अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए। खबर थी, चार महीने से बैठक नहीं हुई फिर फैसले सर्वसम्मत कैसे थे? कुछ तो बताया जाना चाहिए?
संजय कुमार सिंह
चुनाव आयोग, असल में केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकार की गर्दन फंसी तो जान बचाने के लिए चुनाव आयोग ने जो कहा और किया वही आज की ‘खबर’ है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह चुनाव आयोग या वोट चोर सरकार द्वारा किया जा रहा तात्कालिक उपाय है। इलाज या उपचार की भाषा में इसे घाव पर बैंड-एड (टेप) लगाना कहते हैं। अभी तक की स्थिति यह थी कि चुनाव आयोग मनमानी कर रहा था, ज्यादातर मामलों में कुछ सुनता ही नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने मोटा मोटी कहा ही है कि वह एक स्वायत्त संस्था है और उसे अधिकार है कि वह अपनी मर्जी से काम करे। इसमें चुनाव आयोग के मुखिया (असल में तीनों आयुक्तों की नियुक्ति) का तरीका भी महत्वपूर्ण है। सरकार ने उसे अपने हिसाब से बदल लिया है और उससे संबंधित कानून कुछ साल से कोर्ट में लंबित है।
इस तरह सरकार ने मनमानी करके पसंदीदा चुनाव आयुक्त नियुक्त किए और चुनाव आयोग मनमानी करता रहा। सुप्रीम कोर्ट ने जनता को कोई राहत नहीं दी। उसके काम में हस्तक्षेप करने से लगभग इनकार करता रहा। दि इंडियन एक्सप्रेस की हालिया खबर ने यह साबित कर दिया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने जो कुछ किया है वह दो अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना किया है। राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस करके कहा कि ऐसा उनके मामला उठाने के बाद हुआ है। सरकार ने राहुल गांधी से निपटने के जो राजनीतिक उपाय किए और उससे संदेश यह गया कि चुनाव आयोग का बचाव सरकार कर रही है। चुनाव आयोग ने जवाब में जो कहा, उसका मतलब वही था जो इंडियन एक्सप्रेस की खबर कह रही थी। मोटे तौर पर अगर मामला सहमति का भी था तो एतराज या विरोध के बाद उसे मान लेना जबरदस्ती या लाचारी भी हो सकती है। चूंकि तीनों चुनाव आयुक्तों का चुनाव इसी सरकार ने किया है और इनके खिलाफ असहमति जताने वाले पिछले चुनाव आयुक्त की तरह कार्रवाई नहीं हुई तो माना जा सकता है कि मामला सरकारी ही है।
इसलिए उम्मीद थी कि तीनों आयुक्तों की प्रेस कांफ्रेंस एक साथ होगी। नहीं हुई पर कई महीनों बाद मीटिंग हुई, उसकी फोटो सार्वजनिक हुए और कुछ निर्णयों की घोषणा की गई। वही निर्णय आज की खबर है। कई मामलों में अखबारों की प्रस्तुति चुनाव आयोग की मदद करने वाली है। आइए, देंखें कैसे? इसमें संपादकों की योग्यता, प्रतिभा क्षमता का भी प्रदर्शन हुआ है। खबर तो प्रमुख है ही। मैं आज सिर्फ दिलचस्प शीर्षक और हाइलाइट किए गए अंश बता रहा हूं जिससे पता चलता है कि ज्यादातर अखबारों ने मूल मुद्दे को गोल कर दिया है और जो खबर छपी है वह सामान्य खबर के रूप में पर जनहित का ख्याल रखने वाली खबर होने के नाते प्रमुखता से पेश की गई है। गौर करने वाली बात यह है कि कायदे की एक ‘खबर’ से बदल गए ‘सर्वसम्मत’ फैसले, सरकार हिली या व्यवस्था – जो भी हुआ पर्दे में ही रहा। खबरें इस प्रकार हैं :
1. एसआईआर को लेकर हुई आलोचनाओं का सामना करने के बाद चुनाव आयोग ने नुकसान नियंत्रण के प्रयास शुरू किए। एसआईआर के दौरान छूट गए लोगों के नामांकन के लिए ‘विशेष अभियान’ की घोषणा की; आयोग ने कहा कि फॉर्म 6 के साथ अतिरिक्त घोषणा केवल एसआईआर अवधि के लिए ही आवश्यक है; चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की खबरों के कुछ दिनों बाद आए इन फैसलों को ‘पूर्ण आयोग की मंजूरी’ प्राप्त है। इसके साथ संशोधित प्रक्रिया का विवरण है और वह भी हाईलाइट किया हुआ है। (द हिन्दू)
2. चुनाव आयोग के बदलावों और विरोध के बीच आनन-फानन में किए गए सुधारों के बावजूद, विपक्ष ज्ञानेश को हटाने की अपनी मांग पर अड़ा हुआ है। (द टेलीग्राफ)
3. SIR से जुड़े निर्णय और प्रक्रिया की खामियों को लेकर चुनाव आयुक्तों के विरोध और विवाद के बीच – आंतरिक शांति, तीनों चुनाव आयुक्तों की बैठक हुई, पहला कदम उठाया। ऐसे मतदाता जिनकी मैपिंग नहीं हुई है या हो रही है उन्हें सुनवाई में शामिल होने की जरूरत नहीं है। ईसीआई नेट की समीक्षा होगी। (दि इंडियन एक्सप्रेस)
4. ‘संपूर्ण आयोग’ की मांग पर चुनाव आयोग ने एसआईआर की प्रक्रिया ढीली की। पैनल ने आम सहमति पर जोर दिया और कहा, प्रेस नोट को पूरे आयोग की सहमति है। (हिन्दुस्तान टाइम्स)
5. बैठक के बाद चुनाव आयोग ने कहा, अधिकारी उन लोगों के घर जाएंगे जिन्हें नोटिस भेजे गए हैं। इस खबर का इंट्रो है, शिकायतों के बाद ईसीआई नेट सॉफ्टवेयर की जांच होगी। एक और खबर का शीर्षक है एसआईआर पर सारे निर्णय आम सहमति से। (टाइम्स ऑफ इंडिया)
6. चुनाव आयोग ने मिलकर मोर्चा लिया, कहा एसआईआर के सभी निर्णय आम राय से। इसके दो फ्लैग शीर्षक है, पहला – चुनाव आयोग ने एसआईआर की प्रक्रिया की आसान किया, दिल्ली और महाराष्ट्र में अंतिम समय का विस्तार किया। दूसरा – चुनाव आयोग के ताजा बयान के बाद एनडीए के सहयोगी चुनाव आयोग के साथ एकजुट हुए। इसके साथ सिंगल कॉलम का एक शीर्षक है – भाजपा के और सहयोगी आगे आए : चुनाव आयोग को अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए। (दि एशियन एज)
7. विवादों के बीच चुनाव आयोग की बैठक, कई फैसले लिए। दावे व आपत्तियों की समय सीमा बढ़ाई। एसआईआर में नाम कटा तो घर जाकर दस्तावेज लेंगे अधिकारी। (देशबन्धु)
8. विवाद – मतभेदों के दावों के बीच आयोग की बैठक। ईसी का दावा – एसआईआर पर फैसले सहमति से ही हुए। फैसला …. एसआईआर में नाम नहीं आया तो अपडेशन में आवेदन करें। (दैनिक भास्कर)
9. वोटरों की दौड़ खत्म। तीनों चुनाव आयुक्तों की एक साथ बैठक : एसआईआर समेत सभी फैसले सर्वसम्मति से। कागज लेने घर जाएंगे बीएलओ। बेघर वोटरों के लिए लगेंगे विशेष शिविर, डीईओ करेंगे मदद। यह अहम फैलों में एक है। फॉर्म-6 पर भी व्यवस्था स्पष्ट की, ईसीआई नेट के लिए बनाई कमेटी। (अमर उजाला) और अंत में
10. एसआईआर के सभी फैसले सर्वसम्मति से : आयोग। कहा, कैबिनेट सचिव को भेजे गए पत्र नीतिगत मामलों से संबंधित नहीं। इस संबंध में खबर इस प्रकार है – निर्वाचन आयोग ने शनिवार को कहा कि एसआईआर से जुड़े सभी आदेश तीनों निर्वाचन आयुक्तों की मंजूरी के बाद (ही) जारी किए गए थे। मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है। दो निर्वाचन आयुक्तों और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बीच मतभेदों को लेकर विवाद के बीच, निर्वाचन आयोग ने एक बयान में कहा कि आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) द्वारा कैबिनेट सचिव को भेजे गए पत्र आयोग या उसके आईटी डिवीजन के किसी नीतिगत मामले से संबंधित नहीं थे, बल्कि आयोग में प्रतिनियुक्ति पर आए एक अधिकारी के कामकाज से संबंधित थे। मुख्य निर्वाचन आयुक्त समेत दोनों निर्वाचन आयुक्तों की मंजूरी से जारी बयान में आयोग ने कहा कि संबंधित अधिकारी द्वारा जारी कार्य पुनर्वितरण के आदेश दो निर्वाचन आयुक्तों के आदेश के बाद वास्तव में लागू नहीं किए गए थे। (नवोदय टाइम्स)
गौरतलब है कि देशबन्धु की खबर लीड नहीं है। सामान्य स्थितियों में ऐसी खबर लीड होनी भी नहीं चाहिए। आज यह खबर लीड है क्योंकि मुद्दा ऐसा है। दिलचस्प यह है कि कई अखबारों ने इस मुद्दे को ऐसे हल्के शीर्षक से दबा दिया है। देशबन्धु ने मुद्दे को अलग रखा है। वही लीड है और खबर अपने सामान्य शीर्षक से पहले पन्ने पर दो कॉलम की सामान्य खबर है।)
हिन्दुस्तान टाइम्स के शीर्षक के संदर्भ में कल्पना कीजिए कि आयोग को यह बताना पड़ रहा है और अखबार ने इसे अलग से खबर बनाया है। अमूमन चुनाव आयोग के नाम से या लेटर हेड पर चुनाव आयोग के किसी भी अधिकारी के दस्तखत से जारी पत्र या विज्ञप्ति को चुनाव आयोग का ही माना जाना चाहिए, माना जाता रहा है। ऐसा लिखने की स्थिति बन गई है तो यह सिर्फ चुनाव आयोग के कारण नहीं है। याद कीजिए कि जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद क्या हुआ था, आरटीआई से क्या सूचना दी गई। उसके बाद राष्ट्रपति भवन से या राष्ट्रपति के दस्तखत से जारी विज्ञप्ति पर लिखना पड़े कि इसे राष्ट्रपति की सहमति से उनके कार्यालय की जानकारी में जारी किया जा रहा है?
टाइम्स ऑफ इंडिया के शीर्षक के संदर्भ में गौर तलब है कि लॉजिकल डिसक्रिपेंसी का मामला पश्चिम बंगाल चुनाव के समय सामने आया था। जाहिर हो गया था कि ऐसी गलतियां कंप्यूटर ही पकड़ सकता है और तभी शिकायत की गई थी कि सबको एक जैसे नोटिस भेजे गए हैं जो दिल्ली से बनकर आए हैं उस पर स्थानीय अधिकारी के दस्तखत भर है या वह भी नहीं है। मुझे ठीक से याद नहीं है पर ऐसा ही कुछ मामला है और ठीक से समझना, जानना या याद करना हो तो एआई की मदद ली जा सकती है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


