अनिल कुमार यादव-
लोकतंत्र का उर्वरा कीचड़…. 2001-02 में बनारस के हिंदुस्तान अखबार का घुमंतू संवाददाता था। सो सोनभद्र के नक्सल प्रभावित इलाकों में घूम रहा था। एक साप्ताहिक हाट में चावल की ढेरियों पर रंगबिरंगे, खुशबूदार कार्ड फैले थे, ओबरा डिग्री कालेज छात्रसंघ चुनाव का कैम्पेन चल रहा था, इन कार्डों पर जिनके फोटो थे यानी प्रत्याशी यानी लोकल बनियों के लड़के तराजू थामे ढेरियों के पीछे प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठे थे, वे बाजार से बहुत सस्ते रेट पर आदिवासियों को चावल बेच रहे थे ताकि उनके कभी-कभार कालेज जाने वाले लड़के-लड़कियों के वोट पक्के कर लें।
उस साल कांटे का मुकाबला सबसे सस्ता चावल बेचने वाले दो प्रत्याशियों के बीच हुआ लेकिन एक तीसरे प्रत्याशी ने मुफ्त बांटा और इन दोनों से भारी अंतर से जीत गया. अंदाजा लगाइए, जहां लड़के चढ़ती जवानी में खुद्दी (घटिया चावल) के बदले वोट बेचते हों उन्हें अपने जीवन में आगे और क्या-क्या बेचना पड़ता होगा?
हो सकता है अठारह साल बाद प्रधानमंत्री मोदी को पांच किलो मुफ्त राशन देने का, किसानी को निर्णायक चोट देने वाला आइडिया ओबरा डिग्री कालेज के छात्रसंघ से आया हो. ज्यादा संभावना है कि जैसा अन्न वैसी बुद्धि उर्फ ‘मेरा नमक खाया है’ का महाभारत कालीन विचार पांच हजार साल बाद भटकते हुए दिल्ली में लोककल्याण मार्ग पर किसी आस में ठहर गया हो। एक अवधारणा है कि ब्रह्मांड की अपनी विराट चेतना है जिसमें विचार मंडराते रहते हैं जो अलग-अलग काल में समान वेवलेन्थ पर सोचने वाले दिमागों में घुसकर अमली जामा पहन लिया करते हैं। ठीक वैसे ही जैसे भटकती आत्माएं पसंद आ गए शरीरों को चलाने लगती हैं।
जैसे पूर्वांचल में बंगालियों जैसी दुर्गापूजा आई, सोनभद्र के आदिवासी गांवों में पूर्वांचलियों जैसी रामलीला होने लगी थी. एक आदिवासी ग्राम प्रधान इलाके की रामलीलाओं के पात्रों को धनुष, गदा, मुकुट, उत्तरीय और नकद बांटते हुए अगले विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहा था, उसे पता था रोज अदल-बदल कर ईश्वर-विदूषक-राक्षस-वानर की भूमिकाएं निभाने वाले स्वरूपों को भड़कीला बनाना नए तरह से धार्मिक होती जनता को कहां छुएगा. वह अपने साथ मुझे भी मंच पर ले जाता था ताकि उसकी दानशीलता जंगल का मोर बनकर न रह जाए.
जंगलों के भीतर बांस के लंबे-चौड़े बाड़े बने थे जिनमें मरियल गाय-बैल-बछड़े ठुंसे हुए थे, इन्हें रातों में यूपी-झारखंड-छत्तीसगढ़ की सीमा बनाती कनहर नदी पार कराकर पहले पलामू फिर बंगाल ले जाया जाना था. कुछ गाय बैल चुराए गए थे लेकिन ज्यादातर पशु-व्यापारियों के बिना परमिट वाले ट्रकों से जब्त किए गए थे. पुलिस इन्हें थानों में रख नहीं सकती थी इसलिए स्थानीय निवासियों या मुखबिरों को दे दिए गए थे. वहीं एक बाड़े में एक प्रतिभाशाली मेकअप आर्टिस्ट या मवेशी चोर से मुलाकात हुई जो नकली सींगे लगाकर, थूथन, पूंछ और आंखों का नक्शा बदल कर उन्हें इतना नया कर देता था कि उनके मालिक और व्यापारी जब जुर्माना भर कर अपने जानवर लेने आते तो पहचान नहीं पाते थे.
इस सम्मानित चोर का दखल छात्रसंघ चुनाव, रामलीला से लेकर थाना, चुर्क और डाला के सीमेंट कारखानों और अस्पताल हर जगह था. वह भी विधायक बनना चाहता था लेकिन तरीका अलग और देसी था. वह किसी आदिवासी को एक बैल या गाय इस वादे पर मुफ्त देता था कि जिंदगी में सिर्फ एक बार पूरा परिवार वोट उसे देगा जिसे वह कहेगा. अस्पताल का जिक्र इसलिए कि वहां से निकला मच्छर मार मेलाथियान पाउडर बाजारों में कीटनाशक के रूप में बिक रहा था और तकरीबन हर झोपड़ी के आगे मलेरिया और कालाजार का एक मरणासन्न मरीज लेटा हुआ था. जिन्हें यह मुफ्त मिलना था वही इसे खरीद कर अपने खेतों में छिड़क रहे थे.
उन्हीं दिनों एक एनजीओ ने दक्षिण अफ्रीका की संवैधानिक कोर्ट के जस्टिस याकूब को कनहर नदी पर पचास साल से बन रहे डैम से विस्थापित हुए आदिवासियों की रामकहानियां सुनने के लिए बुलाया था. इन आदिवासियों को फी पेड़ चार-छह पैसा और फी बीघा चार-छह रुपया मुआवाजा दिया जा रहा था. नदी किनारे जहां यह सुनवाई चल रही थी, जस्टिस की पत्नी मुझे अपनी रामकहानी बताने लगीं. दोनों मियां-बीवी बीएचयू के लक्ष्मणदास गेस्ट हाउस में ठहरे हुए थे, तीन दिन से लगातार मांगने के बाद भी उन्हें एक साफ तौलिया नहीं मिल पा रहा था. यह कहानी अगले दिन मेरे अखबार के गपशप कॉलम में तौलिया कांड के रूप में छप गई लेकिन शाम तक नफीस अंग्रेजी में लिखा जज साहब का खंडन भी आ गया कि उनके आदर-सत्कार में कहीं कोई कमीं नहीं है.
अंतर्दृष्टि संपन्न मवेशी चोर मित्र बन चुका था, उसने कहा, जब एक जज अपने लिए तौलिया नहीं मांग सकता तो क्या आदिवासियों से अपना हक मांगने की उम्मीद की जा सकती है? दरअसल हक और संघर्ष नाम की कोई चीज नहीं होती है, यहां सारी लीलाएं हर स्तर की सत्ता, या सत्ता में हिस्सा, या हिस्से का हिस्सा या उनकी कहानियों में अपनी भूमिकाएं झपटने के लिए चल रही हैं.

मैं बारह साल बाद एक शाम कनॉट प्लेस के एक बार में बैठकर ये कहानियां स्पीकिंग टाइगर पब्लिकेशन में संपादक अपने दोस्त अनुराग बसनेत को सुना रहा था. अनुराग ने कहा इन्हें किसी एक बड़ी कहानी में गूंथा जाना चाहिए, इस तरह “गौसेवक” लिखने की शुरूआत हुई. इस कहानी को हंस कथा सम्मान मिलने के एक हफ्ते के अंदर चोर मित्र का फोन आया, “गुरूजी हम एमएलए हो चुके हैं!”
विश्वास नहीं हुआ. मैंने कहा, विधानसभा सदस्यता के पहचान पत्र और अपने लेटरपैड की फोटो व्हाटसैप पर भेजो. उसने फौरन भेजा. मैने उसे बधाई देते हुए स्वीकार किया, जैसा जादुई यथार्थवाद होता है वैसा ही जादुई लोकतंत्र होता है जिसमें लीचड़ संभावनाओं के कमल बनकर खिलने लायक उर्वरा कीचड़ हमेशा रहता है.



