दीपक गोस्वामी-
अगर इस आंदोलन की कमान Millennials के हाथ में होती तो अमित मालवीय की गालीबाज़ आईटी सेल उन्हें खदेड़कर रख देती। पिछले 12 साल से वो यही करती आई है।
इस आंदोलन की कमान Gen Z के हाथ में थी। जो पैदा होते ही हाथ में फ़ोन उठा लिए थे। जिन्होंने उस फ़ोन के ज़रिए कोविड के ख़ाली समय में दुनिया एक्स्प्लोर कर ली थी। उन्होंने ख़ुद को वायरल करने के लिए इंस्टाग्राम के एल्गोरिथम के साथ खूब एक्सपेरिमेंट किए और सफल भी हुए। इन्हें न कैमरे के सामने आने में झिझक होती थी और न ही अपने कंटेंट के साथ कुछ भी एक्सपेरिमेंट करने से ये डरते थे। वायरल होने की सनक में इन्होंने नए-नए शब्द ईजाद किए। चूंकि रील जितनी छोटी उतनी ज़्यादा सफल, इसलिए इन्होंने शब्दों और विचारों के साथ ऐसा क्रिएटिव खेल खेला कि डेढ़ घंटे की कहानी डेढ़ मिनट में कह डालें। यही क्रिएटिविटी उनकी ताक़त बनी।
जब अमित मालवीय की आईटी सेल के सैनिक Gen Z से टकराने आए तो उनके हथियार घिसे-पिटे और पुराने थे, जो हमेशा कॉन्सपिरेसी थ्योरी के इर्द-गिर्द ही घूमते थे। उनमें षड्यंत्र की कहानी होती थी, लोगों को बांधकर रखने वाली क्रिएटिविटी नहीं। ये पैटर्न Millennials और उससे पहले की बुढ़ऊ जनरेशन पर कारगर था। जब हम जैसे Millennials इस पैटर्न के झांसे में नहीं आते थे तो अमित मालवीय की ट्रोल आर्मी हमें गंदी-गंदी गालियां देकर मैदान छोड़ने के लिए मजबूर कर देती थी। हमारे अंदर शर्म और लिहाज जो अधिक था।
मालवीय की आईटी सेल ने यही हथकंडा Gen Z पर अपनाया। मालवीय की सेना घंटों की मेहनत करके एक कॉन्सपिरेसी थ्योरी तैयार करती, जिसे मिनटों तक पढ़कर और देखकर समझना पड़ता। कई लोगों के पास तो इतना लंबा पढ़ने और देखने का समय ही नहीं होता। यहीं Gen Z खेल गए।
जितनी देर में मालवीय की सेना प्रोटेस्ट के ख़िलाफ़ एक कॉन्सपिरेसी थ्योरी तैयार करती, उतनी देर में Gen Z दर्जनों कंटेंट बनाकर वायरल कर देते। इनका 15-20 सेकंड का कंटेंट इतना ज़्यादा एंगेजिंग होता था कि लोग स्किप ही न कर सकें और हंसते-हंसते इनके फैन हो जाएं।
मालवीय नफ़रत के साथ थ्रिलर खड़ा कर रहे थे, जिसे समझने के लिए दिमाग़ लगाना पड़ता। Gen Z मोहब्बत से कॉमेडी क्रिएट कर रहे थे, जिसे बस मजे से स्क्रॉल करते जाओ।
डेढ़ घंटे की कहानी डेढ़ मिनट में कहने वाली शब्दों और विचारों की यही क्रिएटिविटी जंतर-मंतर पर Gen Z के पोस्टर्स और प्लेकार्ड में दिखी। ये पोस्टर्स और प्लेकार्ड भी खूब वायरल हुए और नैरेटिव को Gen Z के पक्ष में घुमा दिया। इन्होंने एंटी-नेशनल होने को भी क्रिएटिव रंग दे डाला। पाकिस्तान, सोरोस, सीआईए, चीन जैसे नैरेटिव को बुरी तरह अपनी क्रिएटिविटी से ध्वस्त कर दिया। आईटी सेल के इन नैरेटिव पर उन्होंने लोगों को हंसने के लिए मजबूर कर दिया।
ऐसी क्रिएटिविटी भाजपा के प्रचार तंत्र के पास कभी नहीं रही थी।
अमित मालवीय की आईटी सेल 12 साल से अजेय थी। नैरेटिव अपने पक्ष में करने में अपनी इस हार से वह बौखला गए। जब वह बौखलाते हैं तो गालियों पर उतर आते हैं। लोगों का चरित्र हनन करते हैं। मालवीय की ट्रोल आर्मी का ये आख़िरी और सबसे कारगर हथियार होते है।
ये हथियार उन्होंने Gen Z पर चलाया। उनके पहनावे को टारगेट किया, लड़कियों के लिए गंदे-गंदे शब्द इस्तेमाल किए। यहां भी Gen Z उनसे बाज़ी मार गए। ट्रोल आर्मी की मां-बहन की गालियों और चरित्र हनन के प्रयास पर उन्होंने अपनी क्रिएटिव गालियों से ऐसा काउंटर अटैक किया कि मालवीय की सेना को अपनी क्षमताओं पर शक होने लगे।
इन गालियों का जवाब देने में हम Millennials झिझक जाते थे और पीछे हट जाते थे। Gen Z ने इन गालीबाज़ों को उनकी ही भाषा में खदेड़ा और ऐसी जगह संयुक्त हमला किया जो भाजपा की कमज़ोर नस थी यानी प्रधानमंत्री की छवि। जिसे उन्होंने हज़ारों करोड़ खर्च करके बनाया था।
मालवीय की सेना Gen Z के अलग-अलग सोशल मीडिया अकाउंट, जंतर-मंतर से वायरल अलग-अलग रील और तस्वीरों को निशाना बना रही थी। Gen Z ने सिर्फ एक चेहरा पकड़ा और उसके ख़िलाफ़ क्रिएटिव तरीक़े से जितना गंदा बोल सकते थे, वो बोला। तरीका इतना ज़्यादा क्रिएटिव था कि सीधा दिल पर चोट करे।
ये काम कभी हम Millennials नहीं कर पाए क्योंकि हम प्रधानमंत्री पद का सम्मान कर लेते थे। लेकिन बगावती तेवर रखने वाले Gen Z ने सीधा प्रधानमंत्री को ही Accountable बनाकर उन पर हमला शुरू कर दिया।
इसकी कल्पना न तो अमित मालवीय ने की थी, न भाजपा ने और न स्वयं प्रधानमंत्री ने। Gen Z की इसी एप्रोच ने मालवीय की आईटी सेल को परास्त कर दिया। भाजपा कुछ भी बर्दाश्त कर सकती थी, लेकिन मिस्टर नॉन-बायोलॉजिकल की साख पर बट्टा बिल्कुल नहीं लगने देती। ये आंदोलन अगर हफ़्ते भर और चल जाता तो Gen Z पता नहीं कि पंत प्रधान की इमेज के साथ और कितने एक्सपेरिमेंट करते!


