Connect with us

Hi, what are you looking for?

सियासत

मीडिया ने EPFO बढ़ोतरी को बताया सौगात—पर कर्मचारी की आज की जेब का क्या?

अविनाश दास-

महीने की पहली तारीख़ को जब बैंक से तनख़्वाह का मैसेज आता है, तो आम नौकरीपेशा इंसान सबसे पहले यह देखता है कि इस बार हाथ में कितना बचा। दस साल बाद व्यवस्था को अचानक याद आया कि पंद्रह हज़ार रुपये में अब किसी का गुज़ारा नहीं होता, इसलिए पीएफ़ का दायरा बढ़ाकर पच्चीस हज़ार करने की तैयारी है। अख़बारों की सुर्ख़ियों में इसे इक्यावन लाख कर्मचारियों के लिए बड़ी ‘सौग़ात’ बताया जा रहा है, लेकिन उस मुलाज़िम से किसी ने नहीं पूछा कि इस फ़ैसले के अगले ही महीने उसके घर का बजट कैसे संभलेगा।

निजी कंपनियों में सीटीसी का हिसाब सब जानते हैं। वहां मालिक अपनी जेब से अलग से कुछ नहीं जोड़ता; जो भी कटेगा, वह कर्मचारी की ही गाढ़ी कमाई से कम होगा। नतीजा यह होगा कि बाज़ार में आटा, तेल, कमरे का किराया और बच्चों की स्कूल फ़ीस पहले से चढ़ी हुई है, और उधर हर महीने खाते में आने वाली नक़द रक़म और घट जाएगी। जिस पैसे से आज की ज़रूरतें पूरी होनी थीं, उसे जबरन रोककर यह समझाया जा रहा है कि यह तुम्हारे कल का सहारा है।

सवाल उस सहारे की क़ीमत का भी है। पीएफ़ के दफ़्तरों में अपनी ही जमा पूंजी निकालने के लिए जिस तरह की काग़ज़ी दौड़ लगानी पड़ती है, वह किसी से छुपी नहीं। पेंशन की हालत यह है कि आज के दौर में उससे महीने भर की दवाइयों का ख़र्च भी नहीं निकलता। दूसरी तरफ़, आम आदमी की इस बचत से सरकारी ख़ज़ाने को बाज़ार में झोंकने के लिए हज़ारों करोड़ का नया पैसा बिना मांगे मिल जाता है।

जब किसी सरकारी क़दम को बहुत बड़ा ‘फ़ायदा’ कहकर प्रचारित किया जाए, तो बस इतना देखना चाहिए कि नक़दी किसके हाथ से निकली और नियंत्रण किसके हाथ में गया। मुलाज़िम की जेब आज ही हल्की हो गयी, और बदले में उसे थमा दिया गया भविष्य का एक काग़ज़ी भरोसा।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को जन्मदिन की बधाई! दीया जलाओ…!!

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन