अखबार और मीडिया का मूल उद्देश्य है समाज को सच्चाई से रूबरू कराना और जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता देना। लेकिन क्या आज का मीडिया इस भूमिका को निभा रहा है? एक ओर ठिठुरती सर्दी में सड़क किनारे बैठा एक आम आदमी अखबार में छपे हर शब्द को सच मानकर पढ़ता है, वहीं दूसरी ओर अखबारों में छपने वाली खबरें सरकार के पक्ष में झुकी हुई दिखती हैं। जमीन सर्वे जैसे गंभीर मुद्दों पर भी जनता के असल सवाल गायब हैं। यह सिर्फ पत्रकारिता का संकट नहीं, बल्कि समाज और भविष्य के प्रति हमारी जिम्मेदारी का सवाल भी है। क्या हम अपने शब्दों की ताकत और भरोसे को सही दिशा दे पा रहे हैं?
नीचे.. अखबार से एक उम्मीद और एक शिकायत, पढ़ें…
उर्मिलेश-
एक पत्रकार को अपनी रिपोर्ट या लेख लिखते या उसे प्रसारित करते समय हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि हमारे जैसे विकासशील समाज में अभावों के बीच जीने वाले करोड़ों लोग पत्रकारों के लिखे या बोले एक-एक शब्द को सच समझते हुए अखबार पढ़ते हैं.
टीवी या यूट्यूब चैनल देखते हैं. अनजाने में अगर किसी पत्रकार के समाचार या विचार में कुछ तथ्य या सूचनाएं गलत हों तो वह क्षम्य है पर इरादतन कोई गलत लिखता या बोलता है तो निश्चय ही यह बहुत बड़ा अपराध है.
ऐसा पत्रकार, लेखक या प्रसारक सिर्फ अपने समकालीन समाज और लोगों के साथ ही नहीं, भविष्य के समाज और लोगों के साथ भी बहुत बड़ा अन्याय कर रहा है. वह मनुष्यता को धोखा दे रहा है! वह अपने शब्दों का भी गुनहगार है!
फोटो (ऊपर) : कड़ाके की ठंड में सड़क किनारे अखबार पढ़ते इस व्यक्ति को देखें! इस तस्वीर की रोशनी में शब्दों का मतलब समझें!
कुमुद सिंह-
सरकार का पक्षकार बना हुआ है अखबार
कल तक जो अखबार रैयतों (किसान) के पक्ष में था आज वो जमींदार यानी बिहार सरकार के पक्ष में मजबूती से खड़ा है. बिहार में चल रहे जमीन सर्वे को बिहार का कोई अखबार कवर नहीं कर रहा है.

मंत्री के बयान, विभाग का निर्देश और डीएम ने सीओ को धमकाया.. इससे ज्यादा किसी अखबार में आपको कुछ नहीं मिलेगा..बंदोबस्ती क्या है. गैरमजरुआ क्या होता है..आज तक किसी अखबार में रैयतों का पक्ष नहीं छपा है. पूर्व जमींदारों का बयान नहीं आया है..वकीलों या जमींदारी के विशेषज्ञों की बात भी पढ़ने को नहीं मिल रही है..अखबार पढ़ने से लगता है कि मंत्री ही सर्वज्ञानी हैं और डीएम ही सर्वशक्तिमान…
वजह भी साफ है.. 2 हजार कमाने वाला पत्रकार क्या समझेगा बंदोबस्ती और खतियान.. लाखों कमानेवाले संपादक तो खैर पढ़ने-लिखने का काम वर्षों पहले छोड़ चुके हैं. यह एक खतरनाक और डरावना सच है कि बिहार में रैयतों की जमीन लूट अभियान में हर वो पक्ष शामिल है, जो अब तक जमींदार के खिलाफ खड़ा होता रहा है.. अब वो जमींदार के लिए रैयतों को गुनहगार साबित करने में लगा है..
मीडिया का ये रूप रैयतों की सोच से परे है. रैयत तो आज भी सोचता है कि पटना से प्रकाशित इंडियन नेशन और आर्यावर्त तो देश के सबसे बड़े जमींदार का अखबार था, लेकिन उसमें भी रैयतों का पक्ष छपता था..लेकिन सच ये है कि आज किसी अखबार में रैयत की आवाज को जगह नहीं है..
मीडिया के लिए 70 साल पहले जमींदार की हर बात गलत थी..आज मीडिया केवल जमींदार की बात रैयतों को समझा रही है.. सचमुच बहुत बदल गया है भारत…



