
संजय कुमार सिंह
कांग्रेस ने जो किया वह तुष्टिकरण और खुद ‘खतरे में पड़े’ में हिन्दुओं की रक्षा का दावा और इसकी आड़ में मुसलमानों को कमजोर करने उनके खिलाफ बुलडोजर न्याय की शुरुआत करने वाली भाजपा की राजनीति का रायता फैलने लगा है। इसका पता आज के हेडलाइन मैनेजमेंट से ही लगता है। मुद्दे पर आने से पहले यह बता दूं कि आम आदमी पार्टी या अरविन्द केजरीवाल की सरकार ने मुफ्त बिजली, पानी देने की घोषणा की तो प्रचार किया गया कि लोगों की आदत खराब की जा रही है उन्हें मुफ्तखोरी सिखाई जा रही है। प्रधानमंत्री ने इसे रेवड़ी कहा। बाद में डबल इंजन वाली भाजपा की सरकार न सिर्फ 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देने का दावा कर रही है राशन पाने वालों से नमक की कीमत भी मांगने के उदाहरण हैं। यही नहीं, मुफ्त नकद देने की योजनाएं महाराष्ट्र जैसे अमीर राज्य में तो हैं ही चुनाव पूर्व भाजपा के बड़े नेता नकद बांटते पकड़े गये, भारी मात्रा में धनराशि बरामद हुई और मतदान से पहले ईडी के छापे ‘घुसपैठियों का सच’ स्थापित करने के लिए पड़ रहे थे। भाजपा की इस राजनीति का हाल यह हो गया है कि वह सत्ता में नहीं रही तो उन तमाम मामलों में कार्रवाई शुरू हो सकती है जिनकी जांच भाजपा के सत्ता में रहते नहीं हुई है। इसलिए भाजपा के लिए अब सत्ता में रहकर राजनीति करने से जरूरी हो गया है सत्ता में बने रहना और अब उसकी राजनीति इतने ही भर की ही लग रही है।
आज के अखबारों की खबरों से यह साफ हो गया है। आप जानते हैं कि इस बार महाराष्ट्र विधानसभा में भाजपा और उसके सहयोगियों के पास स्पष्ट बहुमत है। कैसे हैं, उसपर आरोप है। अभी उसे रहने देते हैं। फिर भी तथ्य है कि भाजपा अभी तक सरकार नहीं बना पाई है। मुख्यमंत्री कौन हो तय नहीं हो पा रहा था। बाधा हटी का प्रचार तो हुआ पर मुख्यमंत्री अपने गांव चले गये और वहां बीमार पड़ गये। इसके साथ की राजनीति को समझते हुए भी आज इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स और दि एशियन एज की लीड है, महाराष्ट्र में शपथग्रहण 5 दिसंबर को। जाहिर है, इस खबर का संदेश यह है कि महाराष्ट्र और भाजपा में सब ठीक है, पांच को शपथग्रहण हो जायेगा। यह इस तथ्य के बावजूद है कि जब बहुमत नहीं था तो शपथग्रहण के लिये राज्यपाल को जगा दिया गया था। अब रास्ता साफ है का प्रचार तो है पर शपथ ग्रहण में कई दिन लग रहे हैं। निश्चित रूप से यह सामान्य नहीं है और खबर यही थी। नहीं है तो इसलिए कि हेडलाइन मैनेजमेंट चल रहा है। दैनिक भास्कर में आज की इस खबर का शीर्षक है, “मुहूर्त तय… शपथ कौन लेगा तय नहीं”। नवोदय टाइम्स में यही शीर्षक वीर रस से भरा हुआ है, शिन्दे के सामने समर्पण नहीं। और यह पूर्व सूचना (सूरक्षा कारणों से जरूरी नहीं थी) भी कि प्रधानमंत्री समारोह में शामिल होंगे।
भाजपा की राजनीति और हेडलाइन मैनेजमेंट के रायते का पता शीर्षक से ही चलता है। यह भी कि अभी तक जो रायता बना था वह फैल गया है। भले हेडलाइन मैनेजमेंट से उसे छिपाने की कोशिश भी चल रही हो। इंडियन एक्सप्रेस का फ्लैग शीर्षक है, “सरकार गठन पर राज्य (महाराष्ट्र) भाजपा प्रमुख ने कहा : कोई देरी या विवाद नहीं है”। मुख्य शीर्षक अजीत पवार के हवाले से है, महाराष्ट्र में शपथग्रहण 5 दिसंबर को, भाजपाई मुख्यमंत्री का फैसला हो चुका है। कहने की जरूरत नहीं है कि जो भी मुख्यमंत्री होगा वह भाजपा का ही होगा या भाजपा के फैसले से ही होगी। उसे भाजपाई कहा ही जा सकता है। इस तरह यह शीर्षक शब्दों का खेल ज्यादा है। वरना मुख्यमंत्री का नाम देने में क्या दिक्कत थी और उसके बिना इसमें लीड जैसी खबर क्या है? फिर भी यह खबर चार कॉलम में छपी है और मुख्यमंत्री का नाम ऐसा सवाल बन गया है कि मतगणना कि मतगणना के 12 दिन बाद जो नाम सामने आयेगा वह बड़ी खबर हो जायेगी और उसे चार से ज्यादा कॉलम में छापना उचित लगेगा। असली खबर यहां उपशीर्षक है जो पूरी खबर का शीर्षक भी है। इसके अनुसार, शिन्दे खेमा गृह मंत्रालय चाहता है और कहा है कि फडणविस उपमुख्यमंत्री के रूप में गृहमंत्री थे। जाहिर है, शिवसेना को तोड़कर पिछली सरकार बनाने में मदद देने वाले शिवसेना के एक समूह के नेता शिन्दे अगर मुख्यमंत्री नहीं बनने को मान गये हैं तो भी चाहते हैं कि गृहमंत्रालय उन्हें मिले। यह भाजपा जैसी सोच ही है और यह शीर्षक से स्पष्ट भी है। इसलिए आज की खबर और उसका शीर्षक यह भी हो सकता था कि शिवसेना या शिन्दे गृहमंत्री के पद के लिए अड़े पर खबर है, सब सामान्य है भले शपथग्रहण विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने के बावजूद चुनाव के नतीजे आने के 11 दिन बाद होगा। बिना कहे यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि सब सामान्य है। द टेलीग्राफ में इस खबर के शीर्षक की हिन्दी कुछ इस तरह होगी, शिन्दे की सत्ता के खेल ने गृह (मंत्रालय) पर निशाना साधा।
मैं लिख चुका हूं कि अखबारों ने पहले लिखा था कि विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने के बाद भी शपथग्रहण में जल्दबाजी की जरूरत नहीं है और ऐसा पहले भी हो चुका है। आज की बड़ी खबर यह भी है कि सवालों पर शायरी करने और हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों में अनियमितताओं के आरोपों के बारे में पूछे जाने पर “कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना” कह चुके मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) राजीव कुमार ने कहा है कि, विधानसभा चुनाव से पहले मतदाताओं के नाम हटाने और बड़ी संख्या में नए मतदाताओं के नाम शामिल किये जाने के आरोपों की जांच करेंगे। द हिन्दू में आज यह खबर लीड है। शीर्षक वही है जो यहां है, चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र चुनाव से संबंधित कांग्रेस की चिन्ता की समीक्षा करने की सहमति दी। हालांकि, दैनिक जागरण के पहले पन्ने की एक खबर का शीर्षक है, “चुनाव में कोई गड़बड़ नहीं, हर सवाल का मिलेगा जवाब चुनाव आयोग”।
कहने की जरूरत नहीं है कि यह बड़ी खबर है और आज यह भी लीड हो सकती थी। पर शपथग्रहण जैसी औपचारिकता चार दिन बाद है जो एक दिन में दो बार भी हुई है, को लीड बनाया गया है। और बात इतनी ही नहीं है। मामला गृहमंत्रालय का है और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली में कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर आरोप लगाये हैं। इसका जवाब देने (मांगने) की बजाय अमर उजाला ने केंद्रीय गृहमंत्री की जवाबी कार्रवाई को आज लीड बना दिया है। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, जबरन वसूली के मामले में आप विधायक नरेश बाल्यान गिरफ्तार। उपशीर्षक है, गैंगस्टर कपिल सांगवान के साथ बातचीत का ऑडियो आने के बाद कार्रवाई। भाजपा ने इस ऑडियो क्लिप को सोशल मीडिया पर जारी किया था। विरोधियों के खिलाफ ऐसा वह करती रही है और इनमें कई ऑडियो वीडियो फर्जी साबित हुए हैं या राजनीतिक लाभ के बाद की कार्रवाई नहीं हुई क्योंकि इनके संपादित होने का आरोप है। ऐसे मामलों की संख्या एक दो नहीं कई है और हाल के महाराष्ट्र चुनाव में भी इसका उपयोग हुआ है। यह काम सिर्फ पार्टी की ट्रोल सेना नहीं करती है, पार्टी के जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग भी ऐसे वीडियो और पोस्ट का प्रसार करते रहे हैं। इस क्लिप के बारे में भी कल ही कह दिया गया था कि पुराना है और इसे अदालत के आदेश पर सोशल मीडिया से हटवाया जा चुका है। इसके बावजूद इसे शेयर किया गया है तो मामला सैंया भये कोतवाल, डर काहे का भी है। आम आदमी पार्टी का यह आरोप है और इसका एक अंश (जो किसी भी आरोप पर संबंधित पक्ष की प्रतिक्रिया के रूप में संबंधित और जरूरी है) खबर में भी है फिर भी खबर सिर्फ अमर उजाला में लीड है। यह अखबार का संपादकीय विवेक है और मैं ऐसी ही चीजें रेखांकित करने की कोशिश करता हूं। कायदे से इस खबर के साथ याद दिलाया जाना चाहिये था कि कन्हैया कुमार के जेएनयू वाले वीडियो के मामले में वर्षों बाद, अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। अखबार अगर ऐसे क्लिप की पोल खोल रहे होते तो भाजपा की यह राजनीति कब की हांफने लगी होती। अब उसका रायता फैल रहा है।
सबको पता है कि अखबारों की खबरों का असर होता है। कन्हैया पर अदालत में हमला हुआ था और आज अमर उजाला में ही खबर है कि किसी बस मार्शल ने पदयात्रा के दौरान दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर पानी फेंक दिया। मेरी दिलचस्पी इसका कारण जानने या इसके साथ की बस मार्शल की मानसिकता को समझने में नहीं है क्योंकि मैं जानता हूं कि बस मार्शल क्यों हटाये गये और उन्हें वापस काम पर रखने में क्या दिक्कत आई औऱ उसमें भाजपा या आम आदमी पार्टी की भूमिका क्या रही। सबके बावजूद जो खबर छपी है या जो स्थिति बनी है उससे यही लगता है कि बस मार्शल आम आदमी पार्टी या अरविन्द केजरीवाल से नाराज हैं जबकि केजरीवाल उन दिनों जेल में थे और उनकी पार्टी ने बस मार्शल की मांग पूरी करने की भरपूर कोशिश की है। अभी वह मुद्दा नहीं है। अभी भाजपा की राजनीति, उसमें प्रचार, भाजपा की चाल और मीडिया की भूमिका मुद्दा है। आज अरविन्द केजरीवाल पर पानी फेंकने की राजनीति और उसकी खबर खूब छपी है। इसपर मुख्यमंत्री आतिशी की एक्स की टिप्पणी नवोदय टाइम्स में है – “दिनदहाड़े भाजपा के कार्यकर्ता ने अरविन्द केजरीवाल जी की जीप पर हमला किया। दिल्ली का चुनाव तीसरी बार हारने की बौखलाहट भाजपा में दिख रही है। भाजपा वालों दिल्ली के लोग ऐसी घटिया हरकतों का बदला लेंगे। पिछली बार आठ सीटें आई थीं। इस बार दिल्ली वाले भाजपा को जीरो सीट देंगे।”
दैनिक भास्कर में विज्ञापनों के बीच में तीन कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, “बांग्लादेश : चिन्मय के बाद उनके शिष्य की गिरफ्तारी”। यह खबर आज टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड है। हिन्दी में यह शीर्षक इस प्रकार होता, जेल में बंद चिन्मय कुमार दास से मुलाकात के बाद दो और पुजारी गिरफ्तार। बांग्लादेश के अधिकारियों ने इस्कॉन के मोंक, आदि पुरुष श्याम दास और रंगनाथ दास को गिरफ्तार किया है। मुझे नहीं लगता है कि भारत में जो सांप्रदायिक माहौल है उसमें बांग्लादेश की यह खबर लीड होना डिजर्व करती है। हालांकि अंग्रेजी अखबार और पाठकों का मामला हिन्दी पट्टी के मामले से अलग है। आज यह खबर दि एशियन एज में तीन कॉलम में है और इसका फ्लैग शीर्षक है, बांग्लादेश पुलिस ने अभी तक गिरफ्तारियों की पुष्टि नहीं की है। हिन्दुस्तान टाइम्स में भी यह दो कॉलम की खबर है। पहले पन्ने पर इसका शीर्षक है, बांग्लादेश में इस्कॉन के दो और लोग गिरफ्तार किये गये। नवोदय टाइम्स में यह विज्ञापन के बराबर में, एक कॉलम से ज्यादा दो कॉलम में से कम में है। शीर्षक है, बांग्लादेश में 2 और हिन्दू ब्रह्मचारी गिरफ्तार। यहां आप विधायक की गिरफ्तारी की खबर, जबरन वसूली मामले में आप विधायक गिरफ्तार। एक तरफ अखबारों में अगर यह स्थिति है तो सोशिल मीडिया पर अधिवक्ता दुष्यंत दवे का एक वीडियो शेयर किया जा रहा है जो करण थापर के साथ उनकी बात-चीत का हिस्सा है। इसके अनुसार वे समझ सकते हैं कि देश का बहुमत धीरे-धीरे 1991 के पूजा स्थल कानून को नष्ट किया जाना देखने से इनकार कर रहा है। इसका असर यह होगा कि देश में तबाही फैल जायेगी तथा राजनीतिक लाभ के लिए हमारे आर्थिक विकास चौपट हो जायेंगे। उनके जैसा वरिष्ठ व्यक्ति भी बाकी दूसरों की तरह व्यवहार कर सकता है – बस दूसरी तरफ देखो – पैसे कमाओ – सर्दी में अलाव या एयरकंडीशन का आनंद लो – लेकिन उन्होंने इसे नहीं चुना है। उन्होंने इससे परेशान होना चुना है। दवे जैसे लाखों लोग हैं जो सच्चे देशभक्त हैं। जो चिंतित होकर देख रहे हैं कि हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं। चिन्ता यह भी है कि हम इस पागलपन को रोकने में असमर्थ हैं। हम आवाज नहीं उठा रहे हैं। ऐसी पार्टी बनने-बनाने उसका साथ देने में असमर्थ हैं जो राजनीतिक माफिया को बाहर करने के लिए लगातार काम करती हो। अपनी बात रखते हुए दुष्यंत दवे रो पड़ते हैं और यही उनकी चिन्ता का शीर्ष है। पता नहीं संपादकों-पत्रकारों को यह चिन्ता क्यों नहीं है – या वे किस लाभ में इस सरकार का साथ दे रहे हैं जो और कुछ भी हो, देशभक्त तो नहीं लगती है पर देशभक्ति का सार्टिफिकेट बांटने से नहीं चूकती।


