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आज के अखबार : हेडलाइन मैनेजमेंट वाली खबर से अलग सूचना इंडियन एक्सप्रेस और दैनिक भास्कर में ही

Newspaper front page with a bold headline about two friends trapped under debris in Saket and their plea to sleep for survival.

हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रचार है, …. प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद ये कदम उठाए गए। दैनिक भास्कर में फ्लैग शीर्षक है, 20 दिन बाद केंद्र का बड़ा ऐक्शन…. मुख्य शीर्षक है, “CBSE; 17 साल के सार्थक ने 7 पेज का प्रेजेंटेशन दिया…। टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज के युवाओं के समक्ष मौजूद चुनौतियों में से एक और को उजागर किया है। इससे पहले दिल्ली के एक कोचिंग संस्थान में बच्चे डूब कर मर गए थे। ये बच्चे भी परीक्षार्थी हैं और पीजी में रह रहे थे जो गिर गया। राजेन्द्र नगर वाली घटना के बाद मुझे लगा था सरकार ऐसे छात्रों के लिए कुछ करेगी लेकिन अग्निवीर योजना लाने वाली सरकार से युवाओं के लिए क्या उम्मीद करना। 

संजय कुमार सिंह

आज मेरे ज्यादातर अखबारों ने यही खबर दी है कि सीबीएसई के चेयरमैन और सचिव को हटा दिया गया है। मुझे नहीं लगता कि यह खबर है या खबर हो सकती थी। खबर तो शिक्षा मंत्री को हटाने की होनी चाहिए थी हालांकि अब उन्हें भी हटाने का कोई मतलब नहीं है और अगर कोई हटा सकता है तो प्रधानमंत्री को हटाया जाना चाहिए। वे खुद इस्तीफा दें तो भी खबर होगी। शिक्षा मंत्री को तो इस्तीफा दे ही देना चाहिए। सोनम वांगचुक ने भी लिखा है कि आत्म सम्मान वाले किसी भी व्यक्ति को इस्तीफा दे देना चाहिए। लेकिन मुझे लगता है कि ओएसएम व्यवस्था को जबरन, जल्दबाजी में लागू करने के बाद जारी रखने के लिए धर्मेन्द्र प्रधान की जरूरत होगी इसलिए उन्हें नहीं हटाया जाएगा। नीट औऱ दूसरी परीक्षाओं में जो चल रहा है उसमें भी शिक्षा मंत्री की भूमिका होगी। प्रधानमंत्री इस्तीफा क्यों नहीं दे रहे हैं और क्यों किसी भी तरह चुनाव जीतने के लिए परेशान रहते हैं – बताने की जरूरत नहीं है। ऐसे में कल जो हुआ और आज जो खबर है वह हेडलाइन मैनेजमेंट से ज्यादा कुछ नहीं है। जनसत्ता डॉट कॉम की कल की एक खबर है, सीबीएसई ऑन स्क्रीन मार्किंग विवाद में संसदीय समिति की बैठक आज, बोर्ड चेयरपर्सन राहुल सिंह और शिक्षा सचिव तलब। खबर कहती है,  केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की ऑन-स्क्रीन मार्किंग व्यवस्था को लेकर उठे विवाद पर आज संसदीय समिति की अहम बैठक होने जा रही है। बैठक में ऑन-स्क्रीन मार्किंग पोर्टल में सामने आई तकनीकी गड़बड़ियों और इससे 12वीं बोर्ड परीक्षा मूल्यांकन प्रक्रिया पर पड़े प्रभाव की विस्तृत समीक्षा की जाएगी। आज नया इंडिया डॉट कॉम की खबर के अनुसार, सीबीएसई की 12वीं की बोर्ड परीक्षा में ऑन स्क्रीन मार्किंग यानी ओएसएम का काम करने वाली कंपनी कोएम्प्ट को ठेका देने के मामले में हुई गड़बड़ियों की पोल खोलने वाले झारखंड के छात्र सार्थक सिद्धांत मंगलवार को शिक्षा मामले की संसदीय समिति के सामने पेश हुए।

सार्थक ने दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली कमेटी के सामने ओएसएम प्रणाली के लागू होने और इसके टेंडर प्रक्रिया में हुई कथित गड़बड़ियों पर अपनी बात रखी। इससे पहले सार्थक ने एक वीडियो बना कर गड़बड़ियों को सबके सामने रखा था। उन्होंने मंगलवार को संसदीय समिति से कहा, ‘मेरे ब्लॉग के अनुसार कम से कम 15 खामियां हैं’। गौरतलब है कि सार्थक ने अपने वीडियो में बताया था कि कैसे एक ब्लैकलिस्टेड कंपनी को ठेका देने के लिए टेंडर की शर्तें बदली गईं। स्कैन की क्वालिटी घटाई गई और साथ ही टर्नओवर की शर्त भी बदली गई। उन्होंने 15 कमियां बताई थीं, जिसकी जानकारी संसदीय समिति को भी दी। इसके बाद शिक्षा मंत्रालय ने सीबीएसई से कोएम्प्ट को टेंडर देने को लेकर बोर्ड से रिपोर्ट मांगी। दिग्विजय सिंह ने बताया, ‘सार्थक ने समिति के सामने अपनी बात रखी है। अब समिति उनके उठाए गए मुद्दों और सीबीएसई के जवाबों पर विचार करेगी’। लोकसभा और राज्यसभा के कुल 31 सदस्यों वाली इस समिति ने नीट परीक्षा के पेपर लीक और परीक्षा रद्द होने के मामले की भी सुनवाई की है। इस मामले में एनटीए के सदस्यों की पेशी भी समिति के सामने हुई थी। हालांकि नीट यूजी के पेपर लीक का मामला कोर्ट तक ले जाने वाले डॉक्टरों के समूह को भाजपा सांसदों ने एनटीए के सामने नहीं पेश होने दिया।

Collage of Twitter posts discussing CBSE issues and government actions, featuring multiple verified accounts and headlines about transfers and inquiries (counts of views and replies shown).

एक्स पर मोहम्मद जुबैर की पोस्ट से

आज यह खबर नहीं मिल रही है कि दोनों अधिकारी संसदीय समिति के समक्ष पेश हुए या नहीं।  समिति के समक्ष पेश होने और शिकायतों पर संज्ञान लेने के तुरंत बाद, केंद्र सरकार ने सख्त कार्रवाई करते हुए तत्कालीन चेयरमैन राहुल सिंह और सचिव हिमांशु गुप्ता को उनके पदों से हटा दिया था। इस तरह मुझे इन अधिकारियों को हटाए जाने में मकसद दिख रहा है। यह कार्रवाई नहीं, हेडलाइन मैनेजमेंट है। वैसे भी, ऐसे तबादलों को हमेशा रूटीन और प्रशासनिक कहा जाता है। इस बार यह कार्रवाई कैसे हो सकती है। फिर भी अमर उजाला की पूरी प्रस्तुति सरकार की प्रशंसा वाली है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया था केंद्र सरकार ने अपनी इस कार्रवाई से शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को बचाया – यह खबर छोटी सी है। हालांकि, नहीं भी होती तो हम-आप क्या कर सकते थे। इस खबर के शीर्षक का फौन्ट बोल्ड भर है, साइज शायद एक प्वाइंट भी बड़ा नहीं है। खबर और शीर्षक तकरीबन एक ही फौन्ट में है। प्रमुखता से बताया गया है कि पुनर्मूल्यांकन पोर्टल पर 8 घंटे में एक लाख साइबर हमले हुए। कहने की जरूरत नहीं है कि साइबर हमले रोकना, हमले से सुरक्षा की व्यवस्था करना भी सरकार और सीबीएसई का काम है। यह व्यवस्था कमजोर है तो नुकसान पूरे देश को होता है। मुझे अपना वेबसाइट बंद करना पड़ा क्योंकि सुरक्षा व्यवस्था बहुत महंगी है फिर भी सुरक्षित रहने की गारंटी नहीं है और होने को तो भाजपा के वेबसाइट को भी हैक किया जा चुका है। फिर से तैयार करने में कई महीने लगे थे। सीबीएसई का पोर्टल हैक किया जा सकता है यह तो छात्र निसर्ग ने पहले ही बता दिया था। नवोदय टाइम्स में भी यह खबर सरकारी प्रचार की ही तरह है। केंद्र की कार्रवाई – प्रमुखता से लिखकर भी बताया गया है। ओएसएम सेवाओं की जांच करेगी समिति इतनी प्रमुखता से छपी है जैसे तबादलों से दूध-पानी सब अलग हो जाएगा। देशबन्धु में भी यह खबर लीड है लेकिन फ्लैग शीर्षक इसे प्रचार नहीं रहने देता है। इसमें कहा गया है, ओएसएम को लेकर बैकफुट पर आई मोदी सरकार। उपशीर्षक के नीचे दो कॉलम का शीर्षक है, यह जवाबदेही नहीं, मामले को दबाने का प्रयास : राहुल। इसके अलावा जो खबरें हैं और जिनके शीर्षक दो कॉलम में बड़े फौन्ट में हैं, वे है – छात्र ने संसदीय समिति को बताई खामियां और विशेषज्ञों ने 36 बड़ी कमियों को चेतावनी दी थी।

दैनिक भास्कर की लीड का शीर्षक अधिकारियों को हटाए जाने या उनके तबादले की खबर ही नहीं है। फ्लैग शीर्षक भी वह तथ्य है जो सबको पता है और जरूर दर्ज किया जाना चाहिए था। शीर्षक है, 20 दिन बाद केंद्र का बड़ा ऐक्शन, ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम की जांच के लिए कमेटी गठित। मुख्य शीर्षक है, “CBSE; 17 साल के सार्थक ने 7 पेज का प्रेजेंटेशन दिया, चेयरमैन-सचिव हटाए गए।” अंग्रेजी अखबारों में टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक बहुत सामान्य है। ओएसएम विवाद पर सीबीएसई प्रमुख और सचिव हटाए गए, सरकारी पैनल सेवाएं लेने की जांच करेगी। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर का शीर्षक है, हंगामे के बीच सीबीएसई चेयरमैन और सचिव हटाए गए। इस खबर का इंट्रो है -ओएसएम प्रापण की जांच के लिए पैनल बनाया गया; प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद ये कदम उठाए गए। जाहिर है इसके जरिए यह प्रचारित करने की कोशिश की जा रही है कि प्रधानमंत्री ने कार्रवाई की पर यही तो मुद्दा है। शिक्षा मंत्री ने क्यों नहीं की और नहीं कर रहे हैं तो हटाए क्यों नहीं गए? मीडिया ने न तो यह सवाल उठाया है और न जवाब दिया है। मुझे लगता है कि आज इस मामले में एक खबर यह भी होनी चाहिए थी कि ओएसएम मामले में संसदीय समिति ने जिन अधिकारियों को बुलाया था उन्हें केंद्र सरकार ने उसी दिन हटा दिया (पहले या बाद) में। इससे जांच स्वतंत्र होगी या बाधा पड़ सकती है और यह भी कि शिक्षा मंत्री को क्यों नहीं हटाया गया। मैं यह जानना चाहता हूं कि अधिकारी संसदीय समिति के समक्ष पेश हुए या नहीं, पेश हुए तो जवाब देने के समय वे जानते थे कि नहीं कि उनका तबादला हो चुका है और क्या सवाल करने वालों को पता था कि ये अब मुक्त किए जा चुके हैं। इससे सरकार की कार्यशैली का पता चलता है। द हिन्दू में खबर और सूचनाएं तो यही सब हैं लेकिन उपशीर्षक में विपक्ष का यह आरोप भी है कि तबादले राजनीतिक नेतृत्व को बख्शने के लिए की गई लीपा-पोती है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर बाकी सभी अखबारों से अलग है। अखबार ने छह कॉलम की अपनी खबर के फ्लैग शीर्षक में बताया है, जनवरी में केंद्रीय विद्यालयों, नवोदय, दिल्ली के शिखर के स्कूलों के प्राचार्य और प्रमुख परीक्षकों ने सिस्टम की जांच की थी। मुख्य शीर्षक है, सीबीएसई ने जिसे नजरअंदाज किया : इसके अपने पैनल ने परीक्षण में गड़बड़ियां पाईं और कहा था, ओएसएम को एक साल देर से लागू किया जाए। खबर के अनुसार, दिल्ली में परीक्षण के बाद जनवरी 2026 में बोर्ड को भेजी गई दो रपटों में प्रमुख समस्याओं, तकनीकी गड़बड़ियों पर प्रकाश डाला गया था। साथ ही यह भी बताया गया था कि नंबर अपने आप कुछ भी बढ़ या घट जाते हैं। द टेलीग्राफ में यह खबर दो कॉलम में छपी है लेकिन शीर्षक एक ही कॉलम का है। दूसरे कॉलम में ओएसएम के खिलाफ दिल्ली में एनएसयूआईके प्रदर्शन की फोटो है जो दिल्ली के अखबारों में नहीं है।  

आप समझ सकते हैं कि रिपोर्टिंग कितनी पक्षपाती है और सरकार की छवि बनाए रखने के लिए मीडिया कर्मी क्या सब कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि यह कार्रवाई नहीं, कार्रवाई का प्रचार करने के लिए बनाई गई खबर है और कल ही सोशल मीडिया पर इसका प्रचार शुरू हो गया था। इससे पहले सीबीएसई स्कूलों के प्रिंसिपल को रील बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के आदेश की खबर थी और जाहिर है वह आदेश मंत्री ने नहीं दी होगी लेकिन सबको पता है कि भाजपाई इको सिस्टम ऐसा करता-करवाता रहा है। ऐसे में सीबीएसई के अध्यक्ष और सचिव को हटाया जाना उनके पद की गरिमा के खिलाफ है और इस सरकार ने तमाम पदों के साथ ऐसा किया है। विपक्ष पर आरोप लगाने से भी नहीं चूकते। यह काम खुद प्रधानमंत्री भी करते हैं। सत्ता में आने से पहले भाजपा ईवीएम का विरोध करती थी लेकिन 2024 के चुनाव में सीटें कम होने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था, ‘जब चार जून के नतीजे आए तो मैं काम में व्यस्त था। बाद में फोन आना शुरू हुए। मैंने कहा कि ये आंकड़े तो ठीक हैं, ये बताओ कि EVM जिंदा है या मर गया? क्योंकि ये लोग तय करके बैठे थे कि भारत के लोकतंत्र और लोकतंत्र की प्रक्रिया से लोगों का विश्वास उठा दिया जाए। ये लगातार EVM को गाली देते रहे। ये ईवीएम की अर्थी निकालने की तैयारी में थे। …. शाम आते-आते उनकी जुबान में ताले लग गए और EVM ने उन्हें चुप करा दिया। यह ताकत लोकतंत्र और चुनाव आयोग की है। आशा करता हूं कि पांच साल EVM नहीं सुनाई देगा, लेकिन 2029 में ये फिर EVM कहने लगेंगे। आप जानते हैं कि बंगाल चुनाव में आयोग ने क्या किया या चुनाव आयोग से क्या सब करवाया गया। दिलचस्प यह है कि बंगाल चुनाव के लिए चुनाव आयोग ने रिकार्ड संख्या में अधिकारियों का तबादला किया और जिन अधिकारियों को तैनात किया गया इनमें कइयों के तार किसी न किसी तरह भाजपा से जुड़े थे। यहां तक कि चुनाव के बाद  मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी रहे (CEO) मनोज कुमार अग्रवाल को राज्य का मुख्य सचिव नियुक्त कर दिया। ठीक है कि केरल सरकार ने भी राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी रतन यू केलकर को मुख्यमंत्री वीडी सतीशन का सचिव नियुक्त किया। पश्चिम बंगाल में शुरुआत करने वाली भाजपा ने केरल के बाद आरोप लगाया कि उनकी पार्टी की ओर से शासित राज्यों में इसी तरह की नियुक्तियों पर कांग्रेस का रुख विरोधाभासी होता है। मुझे लगता है कि दोनों मामले बेहद अलग हैं। बंगाल के मामले में चुनाव आयोग को निष्पक्ष अधिकारी की तैनाती करनी थी पर जिसे किया गया वह भाजपा सरकार या मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का पसंदीदा निकला। केरल में वे पहले से इस पद पर थे और उन्हीं को रखा गया है। इस तरह बंगाल में चुनाव में गलत किया गया तो केरल में जो हुआ वह सामान्य है। नई सरकार ने अपना पंसदीदा नहीं ढूंढ़ा जो पहले से (महत्वपूर्ण पद पर) था उसी को चलने दिया। फिर भी भाजपा इकोसिस्टम का प्रचार सही को गलत साबित करने में लगा रहता है। 

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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