आबिद सुरती-
हिन्दुस्तानी साइलेंट सिनेमा, धर्मेन्द्र नाथ ओझा द्वारा लिखी गई एक गहरी, शोध पर आधारित बहुत उम्दा पुस्तक है। यह पुस्तक हमें उस समय में ले जाती है जब फिल्मों में आवाज़ नहीं होती थी, लेकिन हर दृश्य में भावनाओं की गूंज होती थी। यह केवल सिनेमा का इतिहास नहीं, बल्कि एक पूरे दौर की जीवंत झलक है।
पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता है इसका शोध और जानकारी का विस्तार। लेखक ने सिनेमा की शुरुआत से लेकर उसकी सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परतों को बड़े सुंदर ढंग से सामने रखा है। फ़िल्म राजा हरिश्चन्द्र से फ़िल्म लाइट ऑफ एशिया तक की यात्रा को उन्होंने इतिहास की दृष्टि से सजाया है, लेकिन कहीं भी यह पुस्तक बोर नहीं करती।
पुस्तक में राजा हरिश्चन्द्र से पहले सावित्री नामक एक अधूरी फ़िल्म का ज़िक्र है, जो अगर पूरी हो जाती तो शायद भारतीय सिनेमा का इतिहास कुछ और होता। भारतीय सिनेमा का पितामह दादा साहेब फाल्के नहीं बल्कि सावित्री के निर्माता निर्देशक श्रीनाथ पाटणकर होते। उसी तरह भारतीय सिनेमा की पहली अभिनेत्री अन्ना सालुंके नामक पुरुष नहीं बल्कि सावित्री की भूमिका करनेवाली नर्मदा मांडे नाम की महिला होती।
लेखक की शैली बहुत ही सरल, साफ और बहाव वाली है। यह किताब पढ़ते हुए लगता है जैसे हम खुद सिनेमा हॉल में बैठकर वह सब देख रहे हों — चाहे वह अन्ना सालुंके का महिला किरदार निभाना हो, वी शांताराम का सेट रँगते हुए अचानक से कैमरा के सामने अभिनय करना हो या पिट (स्टेज के गड्ढे) में बैठे साजिन्दों का वाद्ययंत्र बजाना हो। यह सब पढ़ते हुए हम मूक सिनेमा से रूबरू होते हैं।
एक और ख़ास बात यह है कि लेखक केवल घटनाएँ नहीं बताते, वे यह भी समझाते हैं कि क्यों उस समय धार्मिक कथाओं को फ़िल्मों का आधार बनाया गया। बिना भेदभाव के कैसे पूरा समाज एक साथ बैठकर पौराणिक कथाओं पर बनी फ़िल्मों का आनंद लेता था।
पुस्तक में पर्दे के पीछे की कहानियाँ भी हैं — जैसे अन्ना सालुंके, फाल्के के बेटे भालचंद, कमलाबाई और उनके परिवार की विरासत। सबसे दिलचस्प प्रसंग है जब दादा फाल्के की फ़िल्म राजा हरिश्चन्द्र का प्रदर्शन मेरे अपने शहर सूरत में होता है लेकिन राजा हरिशन्द्र की पूरे पांच दिन की कमाई सिर्फ़ तीन रुपये होती है। इसकी वजह थी सूरत में चल रहे प्रसिद्ध वाकेनर नाट्य मंडली के शो। इनकी फ़िल्म का टिकट का दाम नाटक से दोगुना था। आम दर्शक को फ़िल्म के आधे पैसे में तीन घण्टे का नाच गान के साथ नाटक देखने को मिल रहा था। दुगुना पैसा देकर चालीस मिनट की फ़िल्म कौन देखे? दादा फाल्के ने फिल्म शुरू होने से पहले दो यूरोपियन नर्तकियों के डांस स्टेज पे कराने की योजना बनाई। अखबारों में विज्ञापन दिया गया कि ” दो सुंदर युवतियों के नृत्य के साथ 50 हज़ार तस्वीरें पर्दे पर देखें।”
दर्शकों को लगा कि 50 हज़ार तस्वीरें मतलब ज़रूर लंबी अवधि की फ़िल्म होगी। दर्शकों की भीड़ बढ़ गई। पूरे दिन में तीन रुपये कमाई वाली फिल्म अब तीन सौ रुपये प्रत्येक शो की कमाई करने लगी। भारतीय सिनेमा में लुभावनी मार्केटिंग का यह पहला प्रयोग था।
मुंबई के अलावा मद्रास, कलकत्ता, लाहौर और कोल्हापुर जैसे शहरों में भी मूक सिनेमा के विकास का इस पुस्तक में विस्तार से उल्लेख है। एक साथ इतने शहरों में मूक फिल्में बन रही थी। यह विविधता भारत की सांस्कृतिक रंग-बिरंगी तस्वीर को दर्शाती है।
लेखक जब लिखता है कि “सिनेमा और आज़ादी का आंदोलन लगभग सहयात्री रहे हैं।” तो यह पूरी पुस्तक का सार बन जाता है। उदाहरण के तौर पर, जब फ़िल्म लंका दहन में हनुमानजी लंका जलाते हैं इस दृश्य पर दर्शकों की राष्ट्रीय भावना उबाल मारने लगती थी और पूरा थिएटर भारत माता की जय और इंकलाब ज़िंदाबाद से गूंजने लगता था।
तकनीकी पक्ष पर भी पुस्तक में एक रोचक प्रसंग है जैसे बिना आवाज़ के फ़िल्मों में संगीत का इस्तेमाल, प्रोजेक्टर गर्म होकर बंद हो जाता था उसे ठंडा होने में 15 मिनट का वक़्त लगता था। इस बीच भीड़ शोर मचाने लगती थी जिसकी कमी को पूरा करने के लिए सिनेमा हॉल में संगीत, नृत्य, जादूगर का खेल जैसे कार्यक्रमों का चलन शुरू हुआ जो बाद में हिन्दुस्तानी सिनेमा का यह अहम हिस्सा बन गया। उसी तरह सिनेमा थिएटर में स्टेज पे खड़े होकर चलती मूक फिल्म के पीछे से एक शख़्श कमेंट्री करता था।
मूक सिनेमा के दौर में कमेंट्री करनेवाले एक शख़्स को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता था जिसका नाम नूर मोहम्मद गोलीबार था। जो अहमदाबाद के थिएटर में दिलचस्प कमेंट्री करने के लिए मशहूर था।
पुस्तक की भूमिका में लेखक ने लिखा हैं कि उन शुरुआती फिल्मकारों के पास न कोई ट्रेनिंग सेंटर था, न पूंजी थी, न ही संसाधन था। उनके पास केवल साहस और सपना था और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।
खुशी की बात है कि यह पुस्तक हिन्दी में लिखी गई है और मूक सिनेमा पर हिन्दी में इतने विस्तार से लिखी शायद यह पहली पुस्तक होगी। लेखक धर्मेंद्र नाथ ओझा को इसके लिए बहुत बहुत बधाई। मेरी टाइपिस्ट ने टाइप करते हुए पूछा कि आबिद साब, आपको यह किताब इतनी पसंद आई है फिर आपको तो लेखक से गले मिलकर मुबारक़बाद देनी चाहिए। मैंने उसे जवाब दिया कि लेखक को गले लगाकर मुबारक़बाद उसदिन दूंगा जब यह किताब भारत के एफ टी आई जैसे फ़िल्म स्कूल के सिलेबस पाठ्यक्रम में शामिल हो जाए।



