लोकतंत्र और चुनावी शुचिता के सबसे बड़े पैरोकार, एडीआर (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) के संस्थापक और आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व प्रोफेसर जगदीप एस. छोकर का आज सुबह निधन हो गया। उन्होंने अपने जीवनकाल में न केवल चुनावी सुधारों की लड़ाई को दिशा दी, बल्कि मृत्योपरांत देहदान कर समाज के प्रति अपनी अंतिम प्रतिबद्धता भी निभाई।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह लिखते हैं-
इतनी बुरी ख़बर से आज दिन का सामना होगा सोचा न था । तीन चार दिन पहले बात हुई थी और अब यह सुना। जगदीप एस. छोकर (जन्म 1944), आईआईएम अहमदाबाद से सेवानिवृत्त प्रोफेसर और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के संस्थापकों, ट्रस्टियों और मार्गदर्शक में से एक, आज सुबह दिवंगत हो गए।
वह वास्तव में लोकतंत्र और सार्वजनिक मामलों के लिए समर्पित निस्वार्थ योद्धा थे। अत्यंत विनम्र और आत्म-निरपेक्ष, उन्होंने और एडीआर ने पिछले दो दशकों में कुछ प्रमुख चुनावी सुधारों के पीछे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिनमें उम्मीदवारों की संपत्ति और आपराधिक पृष्ठभूमि को affidavits पर घोषित करना शामिल हैं।
एडीआर एसआईआर के खिलाफ मुख्य याचिकाकर्ता है। उनकी इच्छा के अनुसार उनका शरीर मेडिकल परीक्षण के लिए दान किया जा रहा है। मैं फूट फूट कर रोना चाहता हूँ क्योंकि ऐसे लोग आसपास बहुतायत में नहीं हैं और जो हैं वे भी कम हो रहे हैं !
न्यूज़24 की एंकर और वरिष्ठ पत्रकार गरिमा सिंह लिखती हैं-
मैं सन्न हूँ …जगदीप सर चले गए.. वो लोकतंत्र की ज़बर्दस्त ताक़तवर आवाज़ थे.. साफ़ सुथरे निष्पक्ष चुनाव की जमकर पैरोकारी करते थे…अदालतों में अर्ज़ियाँ लगाते थे..सालों साल केस लड़ते थे.. किसी गणित के बग़ैर, नफ़े नुक़सान के अंदाज़े के बग़ैर…इलेक्टोरल बॉंड जैसा बड़ा फ़र्जीवाडा पकड़ा जाना उन्हीं के जीवट से सम्भव हुआ जिसमें हज़ारों करोड़ रुपये का चंदा लिया गया बदले में फ़ायदा पहुँचाया गया
मुझसे कहते थे “देखो गरिमा राजनीति मैं जानता नहीं इसीलिए उस पर बोलूँगा भी नहीं हाँ जो सच है वो हर हाल में कहूँगा”
मैं कहती थी “आइए सर स्वागत है आपका”
मैंने हमेशा उनसे दिशा पायी.. उनके दिए हुए अनगिनत विश्वसनीय आँकड़ों से अपनी पत्रकारिता सजाई। Association for democratic reforms ADR के संस्थापक का जाना इस देश का बड़ा नुक़सान है।
आपको विनम्र विदाई सर प्रणाम।
वरिष्ठ पत्रकार राजीव तिवारी बाबा ने लिखा है-
जब देश में चुनाव का ज़िक्र आता है तो एक नाम सबकी जुबां पर अक्सर आता है और वो है एडीआर यानी एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म्स। ‘एडीआर’ यानि चुनावी शुचिता की सबसे बड़ी पैरोकार संस्था। चुनाव के मुद्दों को लेकर सर्वे करने से लेकर उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों के संबंध में चुनाव के आंकड़े जुटाने का काम हो, ये सब काम एडीआर की टीम पूरी दक्षता से करती है। इसी एडीआर के संस्थापक, ट्रस्टी और मार्गदर्शक जगदीप एस. छोकर का आज सुबह निधन हो गया।
आईआईएम अहमदाबाद के सेवानिवृत्त प्रोफेसर और लोकतंत्र व सार्वजनिक मुद्दों के सच्चे निस्वार्थ पैरोकार जगदीप जी अत्यंत विनम्र और आत्मनियंता थे। वह और उनकी एडीआर की टीम पिछले करीब तीन दशकों में देश में हुए कई प्रमुख चुनावी सुधारों के पीछे मुख्य कारक थे। इनमें उम्मीदवारों की संपत्ति और आपराधिक पृष्ठभूमि का खुलासा शामिल है। आज के ज्वलंत मुद्दे एसआईआर में भी सुप्रीम कोर्ट में एडीआर प्रमुख याचिकाकर्ता है।
परिजनों के मुताबिक उनकी इच्छा के अनुसार मृत्योपरांत उनका शरीर दान किया जा रहा है। बाबा से प्रार्थना है कि लोकतंत्र के इस सच्चे सेनानी को मोक्ष प्रदान करें। उम्मीद है इस लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र चाहने वाले करोड़ों लोग और आने वाली पीढ़ी सार्वजनिक/राजनीतिक जीवन में शुचिता के आपके संघर्ष पवित्रता को याद करेंगे…… भावभीनी श्रद्धांजलि
राकेश कायस्थ-
चुनावी बांड को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाइयों का दौर लगातार चल रहा था। सरकार हर मुमकिन कोशिश कर रही थी कि उसकी गर्दन बच जाये। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का मैनेजमेंट इस बात की पुरजोर कोशिश कर रहा था कि बांड के ज़रिये राजनीतिक दलों को चंदा देने वाली कंपनियों के नाम सार्वजनिक ना करने पड़े।
आईटी सेल और सरकार समर्थक मीडिया टूल किट और विदेशी हाथ जैसे चिर-परिचित जुमले उछाल रहे थे ताकि राजनीतिक व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग कर रहे लोगों की साख पर बट्टा लगाया जा सके। इन सबके बीच सीबीआई और ईडी भी अपना काम कर रहे थे। यानी इधर-उधर छापे रोज पड़ रहे थे।
चुनावी बांड मामले की मुख्य याचिकाकर्ता संस्था एडीएआर (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) के प्रमुख प्रोफेसर जगदीप ए.छोकर से उसी दौरान किसी यू ट्यूबर ने पूछा “क्या आपको इस बात का डर नहीं लगता कि ईडी आपके घर भी आ सकती है।“
प्रो.छोकर ने हंसकर जवाब दिया “आएंगे तो मैं उन्हें प्यार से चाय पिलाकर वापस भेजूंगा और बाकी मेरे घर से क्या ले जाएंगे“
जब व्यक्ति के पीछे ईमानदारी और नैतिक शक्ति का बल होता है, उसकी प्रतिक्रिया वैसी ही होती है, जैसी प्रो.छोकर की थी। एडीआर ने सात साल की लंबी लड़ाई लड़ी और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बांड को गैर-कानूनी वसूली का उपकरण मानते हुए रद्द कर दिया। इतना ही नहीं टालमटोल करने वाले सरकारी बैंक एसबीआई को चंदा देने वाली कंपनियों के नाम भी सार्वजनिक करने पड़े।
प्रोफेसर जगदीप ए.छोकर हमारे समाज के उन महानायकों में थे,जिनके बारे में हम या तो बिल्कुल नहीं जानते या फिर बहुत कम जानते हैं। आईएमएम अहमदाबाद में प्राध्यापक रहे प्रोफेसर छोकर बिना किसी शोर-शराबे के चुनाव सुधार और लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए काम करते रहे। उनकी संस्था एसआईआर मामले में भी मुख्य चायिका कर्ता थी। प्रोफेसर छोकर का जीवन यह बताता है कि बेईमानी के खिलाफ लड़ाई तभी सफल हो सकती है, जब लड़ने वाला निजी जीवन में ईमानदार हो।

यह एक संयोग है कि प्रो.छोकर का निधन सीपीएम नेता सीताराम येचुरी की पहली पुण्य तिथि के दिन हुआ है। येचुरी की तरह प्रो.छोकर भी अपना शरीर मेडिकल रिसर्च के लिए दान दे गये हैं। ऐसे लोग हमें यकीन दिलाते हैं कि हमारे आसपास की दुनिया उतनी बुरी भी नहीं है, जितनी हम कई बार मान लेते हैं।
प्रो.छोकर और कामरेड येचुरी को सादर नमन!



