अभिषेक पाराशर-
Ravish Ranjan Shukla अच्छे पत्रकार हैं और उनके साथ होता यह देखकर बुरा लगा!

पत्रकारिता का ब़ड़ा नुकसान टीवी मीडिया के एक धड़े ने किया है, जिसका खमियाजा अन्य जेन्युइन पत्रकारों को उठाना पड़ रहा है। दिक्कत यह है कि जिन्होंने ऐसा किया है, वे स्टूडियो में हैं और उनके कर्मों का आक्रोश पत्रकारों को भी उठाना पड़ रहा है। लोग चेहरा नहीं ब्रांड पहचानते हैं। टीवी मीडिया के लिए यह समय आत्ममंथन का है, न कि इस बात पर ज्ञान देने का ऐसा मत कीजिए, वैसा मत कीजिए।
टीवी मीडिया को सबसे मजबूत चुनौती क्रिएटर्स जर्नलिस्ट दे रहे हैं। नैरेटिव बिल्डिंग पत्रकारिता का अहम हिस्सा है, लेकिन इसमें जो दबदबा टीवी का एक दशक पहले था, वह अब खत्म हो चुका है। लोग अब सेटिंग और फील्डिंग पकड़ लेते हैं। पकड़ पहले भी लेते थे लेकिन उनके पास इसका जवाबी विकल्प नहीं था। अब उनके पास सोशल मीडिया है, क्रिएटर्स हैं, यू-ट्यूब हैं। बारीकी से देखें तो यह पूरा आंदोलन स्वयं के सोशल मीडिया से खड़ा हुआ है। इसमें मुख्यधारा की मीडिया का कोई योगदान नहीं है, जो अन्ना आंदोलन के समय में उसे मिला था।
समीरात्मज मिश्रा-
रवीश रंजन शुक्ल की ज़मीनी रिपोर्ट में कभी नहीं दिखा कि उन्होंने अपने पेशे से कभी समझौता किया या पत्रकारिता के उसूलों से कोई समझौता किया या फिर निष्पक्षता से कोई समझौता किया। NDTV के पुराने दौर में ही नहीं, बल्कि उसके रूपांतरण के बाद भी।
यह सर्टिफ़िकेट सिर्फ़ इसलिए दे रहा हूँ कि रवीश को कई साल से पत्रकार के अलावा व्यक्तिगत तौर पर भी जानता हूँ।
हो सकता है कि किसी को उनकी रिपोर्टिंग में कभी कुछ कमियाँ भी दिखी हों लेकिन इसके पीछे मानवीय भूल या त्रुटि के अलावा कोई और वजह नहीं हो सकती, ऐसा मैं दावे के साथ कह सकता हूँ।
लेकिन, रवीश जैसे रिपोर्टर को भी यदि आम लोगों के ग़ुस्से का इस कदर शिकार होना पड़ रहा है तो स्टूडियो के भीतर ‘मुर्ग़ा लड़ाऊ’ पत्रकारिता करने वाले और सरकार के लिए ट्वीट करने वाले कथित पत्रकारों को होश में आ जाना चाहिए कि आपकी विश्वसनीयता तो जा ही चुकी है, आप के प्रति लोगों में नफ़रत इस क़दर भर गई है कि उसका शिकार रवीश जैसे पत्रकारों को भी होना पड़ रहा है।
आशीष सागर दीक्षित-
कम से कम रवीश रंजन शुक्ला जी को बख्श दीजिए….
दिल्ली । वीडियो में दिख रहे साथी रवीश रंजन शुक्ला जी है। आप दो दशक से लाल माइक के साथ NDTV India NDTV में वरिष्ठ संवाददाता है।

रवीश रंजन शुक्ला जी ने बुंदेलखंड से लेकर देशभर में ग्राउंड रिपोर्ट जमीन पर आकर की है। प्रणव राय के हाथों से एनडीटीवी इंडिया पीएम मोदी के मित्र बड़े सेठ अदानी ग्रुप के पास चले जाने के बाद लगातार लोगों ने एनडीटीवी इंडिया छोड़ दिया। लेकिन बड़े भाई रवीश रंजन शुक्ला आज भी कड़वाहट के माहौल में घूँट पीकर टिके हैं। क्योंकि बड़े शहरों में पत्रकारिता करने आया हर खांटी पत्रकार आर्थिक संसाधनों से उतना मजबूत नहीं होता। खासकर जब उसके साथ परिवार जुड़ा होता है।
आज एनडीटीवी इंडिया भले ही पूंजीवाद के वर्तमान सबसे बड़े सेठ के हाथों चला गया हो। किन्तु इस मीडिया हाउस में आज भी रवीश रंजन शुक्ला सरीखे निष्पक्ष पत्रकार मौजूद है। इनके हाथ और खबर के दायरे “फ्रेमवर्क और टास्क” से आज भले ही एक बाउंड्री लाइन में बंधे होंगे। बावजूद रवीश रंजन शुक्ला व्यक्तिगत तौर से बड़ी शिद्दत से जनता के बुनियादी मुद्दे उठाते है। जब उन्हें लगता है कि चैनल में नहीं चलेगी तो मजबूरी जाहिर हो जाती है। तब वे अपने मोबाइल से उसको कवर करके सोशल मीडिया में डालते रहते है। युवाओं द्वारा जंतर मंतर पर चल रहे आंदोलन में बड़े भाई रवीश रंजन शुक्ला को भी युवाओं का गुस्सा झेलना पड़ा। लेकिन वे युवा लाल माइक देखकर उन्हें सरकारी दत्तक मीडिया समझने की गुस्ताख़ी कर बैठे है।
इसलिए बिना किसी को समझे, देखे, रूबरू हुए आप क्रोध और आवेश में अपना शिकार न बनाएं। उम्मीद करता हूं मेनस्ट्रीम टीवी मीडिया से आक्रोशित युवा और जनता हर पत्रकार को इस तरह कटघरे में खड़ा नहीं करेगी। सबकी मजबूरियां होती है क्योंकि पत्रकार के परिवार की आवश्यकता, संसाधनों की पूर्ति और उसके कर्जे या ईएमआई की किस्तों को सरकार या जनता नहीं उसका पुरुषार्थ और कर्मठता ही चुकाती है। हर घास को एक ही हंसिया से मत काटिएगा। फिलवक्त हम आपके और देश की सरपरस्ती के साथ खड़े हैं।
यह बात गहराई से सत्ता को भी समझ आनी चाहिए कि देश में चौतरफा दुर्गति न करें। साथियों यह ध्यान रखिएगा कि उक्त पोस्ट मै उनसे व्यक्तिगत मित्रता या ब्राह्मणवाद के वशीभूत होकर नहीं पत्रकार और इंसानियत जिंदा रहे इसलिए लिख रहा हूं।
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