
महेश शर्मा-
(पार्ट वन)
पौराणिक, फिरंगियों के खिलाफ देश की आजादी की पहली लड़ाई के साथ ही औद्योगिक इतिहास संजोए उद्योगों के कब्रिस्तान कानपुर में सातवें कानपुर लिटरेचर फेस्टिवल-2024 ने हलचल मचा दी। शहर के बेहद शांत इलाके कमला नगर में डॉ.गौरहरि सिंघानिया इंस्टीट्यूटव में आयोजित इस लिट-फेस्ट आयोजन की खबर लोगों को है पर शिरकत चुनिंदा लोगों की रही। लोगों को लगता है कि जैसे यह इंटलेक्चुअल क्लास के लिए है जबकि आयोजक डॉ.आलोक वाजपेयी ने मीडिया और सोशल मीडिया खुली मुनादी कर दी थी कि आप सब आइए और अपने दोस्तों को भी लाइए।
दरअसल कानपुर के लिए लिट-फेस्ट सामाजिक पर्यटन का भी विषय है। कला, साहित्य, फिल्म, पुस्तक, संवाद के लिए आपको अपनी बात रखने का खुला मंच लिट-फेस्ट में मिलता है। शनिवार को पहला दिन रहा जिसमें फिल्म निदेशक अतुल पांडे की “मैं निदा” दिखायी गयी।


निदा फाजली उर्दू और हिंदी के अजीम शायर थे। उन्होंने कई फिल्मों के गीत भी लिखे। उनकी शायरी और गीतों ने बड़ी मकबूलियत हासिल की। उनका लिखा हुआ कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता…, तू इस तरह से मिरी जिंदगी में शामिल है.., जैसे गीत लोगों के होठों पर आज भी ताजा हैं। उनका शेर, अपनी मरजी से कहां अपने सफर के हम हैं, रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं…। अतुल पांडे की फिल्म मैं निदा, पर लेखक अभिनेता अतुल तिवारी की बातचीत और बाद में प्रश्नोत्तरकाल में पांडे ने लोगों ने जिज्ञासा शांत की।
निदा को ही फिल्म के लिए क्यों चुना, इसका जवाब देते हुए अतुल पांडेय ने कहा कि निदा की शायरी में जिस तरह का वजन था उसने मुझे बहुत मुतासिर किया, यही वजह थी कि किसी और के बजाय निदा को चुना। अतुल तिवारी ने बताया कि निदा साहेब सिर्फ पोएट नहीं एक स्कॉलर भी थे। इस वजह से उनकी कई बार फिल्म के लोगों से तल्खी भी हो जाती थी लोग उनका बायकॉट भी कर देते थे। फिल्म पर बातचीत के बाद प्रश्नोत्तर भी दर्शकों द्वारा किए गए । जिसका डायरेक्टर अतुल पांडेय ने जवाब दिया। इसके बाद फेस्टिवल का उद्घाटन हुआ।
लिट-फेस्ट में सबसे पहले तबला वादक पद्मविभूषण ज़ाकिर हुसैन को श्रद्धांजलि दी गई। फेस्टिवल डायरेक्टर अंजली तिवारी ने बताया ये सातवां फेस्टिवल है। कानपुर शहर के लोगों के सहयोग से संपन्न हुआ है। इस उत्सव को हम सब लोग बहुत आगे तक ले जाएंगे। उन्होंने सभी सहयोगियों का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि यह फेस्टिवल गंगा जमुनी तहजीब को हमेशा बढ़ावा देता है। मैं निदा फिल्म इसी क्रम में दिखाई गई। इसके बाद धर्मवीर कुशवाहा, राहुल गोयल, डॉक्टर प्रवीण सारस्वत, डॉक्टर ए के त्रिवेदी, अतुल पांडेय द्वारा दीप जलाकर फेस्टिवल का औपचारिक उद्घाटन किया गया।
फेस्टिवल की थीम “औरतनामा” के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट शीना तकी का उनके साहस और संघर्ष के लिए सम्मान शहर के जाने माने एडवोकेट सईद नकवी द्वारा किया गया । उनकी संघर्ष गाथा की कहानी अनीता मिश्रा ने प्रस्तुत की।
“मैं निदा” की खासियत

इस बार के फिल्म फेस्टिवल में 81 देशों की 150 से अधिक फिल्में आई हैं। इनमें से इंडियन पैनोरामा में 25 फिल्मों को शामिल किया गया है। किसी मूवी का शामिल होना अपने आप में ही बहुत बड़ी उपलब्धि है। ऐसी ही एक हिंदी डॉक्यूमेंट्री है ‘मैं निदा’, जिसका प्रीमियर आईएफएफआई में हुआ, इसकी दर्शकों ने खूब सराहना की।
‘मैं निदा’ एक ऑडियो-विजुअल बायोग्राफी-डॉक्यूमेंट है जो सामान्य रूप से दर्शकों और विशेष रूप से कलात्मक दुनिया का ध्यान सबसे महान आधुनिक भारतीय कवि, विद्वान और दार्शनिक निदा फाजली की यात्रा की ओर आकर्षित करता है। मशहूर फिल्म निर्माता अतुल पांडे कवि, दार्शनिक और मानवतावादी निदा फाजली की असाधारण प्रतिभा से बहुत प्रेरित थे।
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