खुशदीप सहगल-

चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर बीजेपी सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत के साथ CISF की कांस्टेबल कुलविंदर कौर ने तमाचा मारने का जो कुकृत्य किया, उसकी कड़ी निंदा की जानी चाहिए. एयरपोर्ट बहुत संवेदनशील क्षेत्र होता है और अगर वहां तैनात सुरक्षाकर्मी ही सुरक्षा से खिलवाड़ करे तो उसके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए. माना कुलविंदर कौर अतीत में कंगना के दिए किसी बयान से आहत थी लेकिन उसे ये नहीं भूलना चाहिए था कि वो ड्यूटी पर तैनात थी और उस वक़्त अपने अर्ध सैनिक बल की नुमाइंदगी कर रही थी. निजी हैसियत से वहां मौजूद नहीं थी. बेशक ये घटना अपवाद है लेकिन इस घटना के बाद क्या अब वीआईपी और अन्य लोग सुरक्षाकर्मियों को भी शक़ की नज़र से देखना नहीं शुरू कर देंगे.
अब आते हैं कुलविंदर कौर पर. उसका कहना है कि किसान आंदोलन के दौरान उसकी मां भी धरने पर बैठी थी, उस वक़्त कंगना ने बयान दिया था कि सौ-सौ रुपए लेकर महिलाएं धरने पर बैठी हैं. कंगना की यही बात कुलविंदर को बहुत बुरी लगी थी. 6 जून को एयरपोर्ट पर कंगना को सामने देख कुलविंदर अपनी भावनाओं और गुस्से पर क़ाबू नहीं रख सकी. अब कुलविंदर ने जो किया उसका अंजाम तो उसे भुगतना ही पड़ेगा. तत्काल उसे हिरासत में लेकर ड्यूटी से निलंबित कर दिया गया.
कंगना ने घटना की जानकारी देते हुए कहा कि जब वो दिल्ली आने के दौरान चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर सिक्योरिटी चेक से निकलीं तो दूसरे केबिन से महिला सुरक्षाकर्मी ने आकर उनके चेहरे को हिट किया. कंगना ने कहा, “मैं सुरक्षित हूं, लेकिन पंजाब में आतंकवाद और उग्रवाद जो बढ़ रहा है, उसे हम कैसे संभालेंगे?”
अब मुद्दे की बात. चंडीगढ़ एयरपोर्ट वाली घटना को कंगना और कुलविंदर से अलग थोड़ा बड़े कैनवस पर देखा जाए. अपना राग अलापते हुए हम बिना वैरीफिकेशन वाली भी कई बातें बोल जाते हैं. इसमें हम मीडियाकर्मी भी शामिल हैं. पिछले कुछ साल में किसी भी बात को जर्नलाइज़ करने की एक बहुत बुरी बीमारी पनपी है. कोई अपराधी है या आतंकवादी तो इसके लिए उसके पूरे समुदाय को ही ज़िम्मेदार ठहरा दो.
मीडियाकर्मियों को भी ये समझना चाहिए कि उनके एक बयान का समाज पर क्या असर पड़ सकता है. कहीं उनके बयान समाज को जोड़ने की जगह तोड़ने वाले तो नहीं. राजनेताओं का तो ये काम है कि ध्रुवीकरण वाले बयान दो जिससे कि उनका लक्षित वोट बैंक उन्हें अधिक से अधिक वोट दे. इसके लिए वो लोगों को बांटने से भी गुरेज़ नहीं करते. पत्रकार लूज़ टॉक की बीमारी नेताओं तक ही सीमित रहने दें तो अच्छा.
पत्रकार का काम नफ़रत की आग में घी डालना नहीं बल्कि उसे सौहार्द की ठंडी फुहारों से बुझाना होता है. निष्पक्ष रह कर जहां भी अन्याय होता देखे तो उसके ख़िलाफ़ पूरे ज़ोर से आवाज़ उठाए. अब चाहे अन्याय करने वाला कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, पत्रकार डट कर सामने खड़ा हो.
अब हर मीडिया हाउस, चाहे अख़बार हो या न्यूज़ चैनल, सबके डिजिटल अवतार भी पोर्टल के तौर पर मौजूद हैं. इन्हें क्लिकबेट्स के ज़रिए व्यूज़ (क्लिक) बटोरने का बहुत बुरा चस्का है. इनकी कोशिश होती है कि हैडिंग ऐसी हो कि हर कोई उस पर क्लिक करने को मजबूर हो जाए. अब इसके लिए कई बार भड़काऊ हैडिंग भी लगा दिए जाते हैं. बॉडी शेमिंग बुरा और अनैतिक माना जाता है. अब एक प्रतिष्ठित हिन्दी अखबार ने एक्ट्रेस स्वरा भास्कर के लिए क्या हैडिंग लगाई, आप खुद ही देखिए- “बढ़ते वज़न के कारण स्वरा को नहीं मिल रहा काम!”

स्वरा भास्कर ने पिछले साल फहाद अहमद से शादी की थी. 23 सितंबर 2023 को उनके घर बेटी राबिया ने जन्म लिया. पोस्ट प्रेग्नेंसी में बढ़े वजन को लेकर बॉडी शेमिंग पर हिन्दी अखबार के डिजिटल अवतार को स्वरा ने सोशल मीडिया पोस्ट में जमकर आड़े हाथ लिया. स्वरा ने लिखा- “वो जो देवनागरी नहीं पढ़ सकते…ये एक अग्रणी हिन्दी अखबार का हैंडल है जो सोचता है कि ये ख़बर अहम है कि एक मां जिसने कुछ महीने पहले ही बच्चे को जन्म दिया, उसका वजन बढ़ गया है. क्या कोई ये न्यूज़ देने वाले बुद्दिमानों को बच्चे के जन्म की फिज़ियोलॉजी समझा सकता है.” स्वरा भास्कर ने अपनी पोस्ट में हैशटैग बॉडीशेमर भी इस्तेमाल किया.
हर किसी को बोलने से पहले सोचना चाहिए कि वो क्या बोलने जा रहा है. जैसे बंदूक से छूटी गोली वापस नहीं आ सकती वैसे ही ज़ुबान से निकला तीर भी वापस नहीं आ सकता. हम ऐसा कुछ तो नहीं कह रहे, ऐसा कुछ तो नहीं लिख रहे जिसका कहीं कोई प्रमाण न हो और जिससे कोई कहीं आहत हो रहा हो. ज़रा सोचिए…






