नई दिल्ली। अमेरिका की ओर से भारत के रूसी तेल आयात को लेकर आए कथित बयान के बाद देश की संप्रभुता और ऊर्जा नीति को लेकर बहस तेज हो गई है। वरिष्ठ पत्रकार दिबांग ने सोशल मीडिया पर कई सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार की नीतियों और चुप्पी पर सवाल खड़े किए हैं।
दिबांग ने अपने ट्वीट में कहा कि अमेरिका की ओर से भारत को रूसी तेल खरीदने की “इजाजत” देने जैसी बातें देश के आत्मसम्मान और संप्रभुता पर सवाल खड़ी करती हैं। उनका सवाल है कि क्या 1.4 अरब आबादी वाला भारत अब अपने ऊर्जा संबंधी फैसले लेने के लिए वॉशिंगटन की अनुमति का मोहताज हो गया है?
2014 के वादों का क्या हुआ?
दिबांग ने भाजपा के 2014 के चुनावी घोषणा पत्र का जिक्र करते हुए पूछा कि उस समय देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और आयात पर निर्भरता कम करने की बात कही गई थी, लेकिन मौजूदा हालात में तेल आयात लगातार बढ़ता दिख रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर इन वादों का क्या हुआ।
LPG की कीमतों पर भी सवाल
उन्होंने घरेलू मुद्दों का जिक्र करते हुए एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी पर भी सवाल उठाए। दिबांग के मुताबिक जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव होता है, तो उसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ता है, लेकिन सरकार की ओर से इस पर स्पष्ट जवाब नहीं मिलता।
तेल भंडार पर तुलना
अपने ट्वीट में उन्होंने ऊर्जा सुरक्षा के सवाल पर अंतरराष्ट्रीय तुलना भी की। दिबांग ने कहा कि जापान के पास लगभग 254 दिनों का तेल भंडार है, जबकि भारत की स्थिति इससे काफी पीछे बताई जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान जैसे देश ऊर्जा संकट से जूझ रहे हैं, लेकिन भारत को भी अपनी दीर्घकालिक रणनीति पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है।
मीडिया और सूचना पर भी टिप्पणी
दिबांग ने यह आरोप भी लगाया कि मौजूदा समय में टीवी चैनलों पर सरकार के खिलाफ सवाल उठाने की गुंजाइश सीमित होती जा रही है। उनका कहना है कि ऐसे अहम अंतरराष्ट्रीय और आर्थिक मुद्दों पर खुली बहस होनी चाहिए।
ईरान में फंसे भारतीय छात्रों का मुद्दा
उन्होंने विदेश नीति से जुड़े एक और पहलू का जिक्र करते हुए कहा कि ईरान में पढ़ने वाले कई भारतीय मेडिकल छात्र मौजूदा हालात के कारण मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। उनका सवाल है कि ऐसे हालात में सरकार की स्पष्ट रणनीति क्या है और छात्रों की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
दिबांग के इन सवालों के बाद सोशल मीडिया पर ऊर्जा नीति, विदेश नीति और मीडिया की भूमिका को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है।
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