
संजय कुमार सिंह
आज दिल्ली के कुछ अखबारों में आतिशी के मुख्यमंत्री बनने की खबर लीड है। आज ही लखनऊ में महिला डॉक्टर के बाल पकड़कर घसीटने, लात-घूंसों से पिटाई की खबर भी है। बेंगलुरु से एक महिला की हत्या कर शव के 30 टुकड़े करने और उसे फ्रिज में रखने का खुलासा है। इसके अलावा उड़ीशा के थाने में वकील महिला की पिटाई, यौन उत्पीड़न और उससे पहले मध्य प्रदेश के कैंट क्षेत्र में महिला की पिटाई और यौन उत्पीड़न का मामला भी है जिसका फॉलोअप होना चाहिये था। आप कह सकते हैं कि पुराने मामलों का फॉलोअप पहले पन्ने पर हो या आज की खबरें? आप सही हैं कि पहले पन्ने पर आज की खबरें होनी चाहिये। लेकिन लखनऊ और बेंगलुरु की खबर आज की है और फॉलोअप में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी हो तो वह भी पहले पन्ने पर हो सकती है, होती है। उड़ीशा वाले मामले के फॉलो अप में महत्वपूर्ण खबर यह है कि पीड़िता के चरित्र हनन का प्रयास किया जा रहा है। इसमें भारतीय जनता पार्टी के प्रचार प्रमुख अमित मालवीय का एक ट्वीट शामिल है। उन्होंने उड़िया में एक ट्वीट शेयर किया (रीट्वीट) किया था जो दूसरा पक्ष बताने के नाम पर पुलिस की ज्यादतियों का समर्थन कर रहा था। कहने की जरूरत नहीं है कि पीड़िता ने जबरन गिरफ्तार किये जाने के विरोध में चाहे जो किया हो पुलिस को यह अधिकार नहीं है कि उसका ब्रा खोल दें और स्तन पर लात मारें। मैं नहीं जानता ये आरोप कितने सही हैं और इसका क्या सबूत है पर आरोप यही हैं और इसकी जांच होनी चाहिये। अगर ऐसा हुआ है तो गलत है। क्यों हुआ यह बाद की बात है।
वैसे भी, अमित मालवीय ने अगर बंगाल मामले में मुख्यमंत्री और सरकार का विरोध किया था तो उड़ीसा में पुलिस का समर्थन करना रेखांकित करने वाली बात है और यह स्पष्ट होना चाहिये कि क्या यही भाजपा की नीति है? एक राजनीतिक दल के रूप में भाजपा राजनीति कर सकती है लेकिन सरकार का काम प्रशासन चलाना है, सबके लिए न्याय सुनिश्चित करना है और कानून का शासन बहाल करना है। महिला उत्पीड़न, यौन हिन्सा आदि के मामले में पार्टी अगर राजनीति कर रही है और न्याय के साथ नहीं है तो शर्मनाक है। दिलचस्प यह कि भाजपा के समर्थन में पत्रकारिता भी ऐसी ही हो गई है। कोलकाता में बलात्कार और हत्या की वारदात के डेढ़ महीने होने को आये। वहां के अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ में आज भी संबंधित खबर पहले पन्ने पर है। आप जानते हैं कि घटना एक डॉक्टर के साथ अस्पताल में हुई थी और उसके बाद से वहां के डॉक्टर हड़ताल पर थे और आज फोटो के साथ बताया गया है कि शनिवार को वे काम पर लौटे।
दूसरी ओर, लखनऊ में महिला डॉक्टर की पिटाई और बाल पकड़कर घसीटने की खबर आज अमर उजाला और कई अखबारो में पहले पन्ने पर नहीं है। कोलकाता की घटना पर अमर उजाला के पहले पन्ने की खबरें याद कीजिये। यह पत्रकारिता है या भाजपा का प्रचार? बेशक अखबार भाजपा का प्रचार कर सकते हैं और यह संपादकीय विवेक का मामला है लेकिन सरकार के प्रचार और जनहित में जनहित ज्यादा जरूरी है और समर्थन भी उसी पार्टी का किया जाना चाहिये। कोलकाता मामले में भाजपा का रुख और अब उड़ीशा मामले में अमित मालवीय के विचार अगर भाजपा के हैं तो निश्चित रूप से अखबारों को अपने समर्थन पर विचार करना चाहिये। यह अलग बात है कि अमित मालवीय ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया है और सोशल मीडिया पर उनकी आलोचना इसके लिए भी हो रही है। कुल मिलाकर, आज यह स्पष्ट है कि बंगाल में डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या को अखबारों ने राजनीतिक कारणों से ज्यादा महत्व दिया। अगर मामला कार्यस्थल पर महिला सुरक्षा का भी माना जाये तो अखबारों के लिए मुद्दा वह नहीं था और उसे वहां के समाज ने ही महत्व दिया और इसके कई उदाहरण हैं, मैं लिखता रहा हूं। कोलकाता मामले में जूनियर डॉक्टर काम पर भले लौट आये हैं, उनका आंदोलन अभी भी जारी है।
अमर उजाला में लीड का शीर्षक है, “दिल्ली की तीसरी महिला सीएम बनीं आतिशी, 5 मंत्रियों के साथ ली शपथ”। इसमें तीसरी महिला मुख्यमंत्री निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है लेकिन इसे मेरे किसी और अखबार ने महत्व नहीं दिया है। वैसे भी, आतिशी मुख्यमंत्री बनी ही इसलिए हैं कि केजरीवाल को इस्तीफा देना पड़ा। भले ही यह उनकी राजनीति है और भाजपा के दबाव में है लेकिन इसके लिए भाजपा को महिला मुख्यमंत्री देने का श्रेय नहीं दिया जा सकता है। अखबार परोक्ष रूप से यही करता लग रहा है जबकि आतिशी के साथ खास बात यह है कि उन्होंने कहा है कि वे केजरीवाल को फिर से मुख्यमंत्री बनाने के लिए काम करेंगी। जाहिर है आतिशी के मुख्यमंत्री बनने के साथ महत्वपूर्ण बात वह नहीं है जो ऐसे मामलों में आमतौर पर होता है। इंडियन एक्सप्रेस ने यही शीर्षक बनाया है। अमर उजाला में यह छोटी सी खबर है।
अमर उजाला के पहले पन्ने की दूसरी खबरें भी आज दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। खबरें भी देख लीजिये – अब सूरत में ट्रेन पलटाने की साजिश। इस बारे में मैं पहले लिख चुका हूं। यह साजिश कौन कर रहा है, रुक क्यों नहीं रही है और सरकार क्या कर रही है। इसके बिना यह पहले पन्ने की खबर क्यों है? मेरे ख्याल से सरकार के बचाव में कि वह क्या करे? लोग साजिश करके ट्रेन पलटा दे रहे हैं। पर इससे बचना, रोकना और साजिश करने वालों को पकड़ना भी सरकार का ही काम है। एक छोटी सी खबर है, पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने कहा, मिलावट बड़ा पाप। उन्होंने कहा है, यह देश के हर मंदिर की कहानी हो सकती है। आप जानते हैं कि मिलावट लड्डू में नहीं घी में था और ऐसा नहीं था कि खाने वालों को पता चला हो वह प्रयोगशाला जांच में पता चला। और तब चला जब जांच कराई गई। ऐसे में यह मंदिर की कहानी नहीं है, बाजार की है और बाजार में बिकने वाले तमाम उत्पादों में मिलावट का मामला है सिर्फ लड्डू या घी में नहीं।
जहां तक तिरुपति के लड्डू की बात है, आज ही अमर उजाला में खबर है, लड्डू प्रसादम की पवित्रता बहाल। यह दावा तिरुमला तिरुपति देवस्थानम ने किया है और कहा है कि अब यह प्रसादम पूरी तरह शुद्ध व पवित्र है। ये सब मेरे किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। यह तो हुई सरकार और सरकारी पार्टी के पसंद की खबरें और उसकी बात। इंडियन एक्सप्रेस में आज दो खबरें हैं जो जनहित की हैं। खबर के अनुसार, घृणा फैलाने वाले भाषणों से संबंधित एफआईआर पर धूल पड़ रही है। ये महाराष्ट्र के मामले हैं औऱ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को कार्रवाई का भरोसा दिया था। अधिकारियों ने कहा है कि कम से कम 19 एफआईआर पर कार्रवाई के लिए सरकार की सहमति चाहिये जबकि उप मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणविस ने कहा है कि सरकार कानून के अनुसार काम कर रही है।
इंडियन एक्सप्रेस में ही पहले पन्ने पर आज एक और दिलचस्प खबर है जो समाज की हालत बताती है। इससे अनुसार, अपहरण के शिकार ने अपने मामले में 17 साल बाद वकील के रूप में अंतिम बहस में हिस्सा लिया। कहानी सात साल के हर्ष गर्ग की है जिसका 10 फरवरी 2007 को अपहरण कर लिया गया था। 7 मार्च को उसे मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिसे से छुड़ाया गया था। 2007-2008 में मामले के सभी आरोपी गिरफ्तार कर लिये गये। 2022 में हर्ष को कानून की डिग्री मिली और 17 सितंबर 2024 को अंतिम बहस हुई। खबर के अनुसार हर्ष ने गवाहों को ढूंढ़ने के लिए दूसरे राज्यों की यात्रा की, रिटायर पुलिस अधिकारियों को ढूंढ़कर उनकी गवाही सुनिश्चित की। अदालत ने अभियोजन के कुल 15 गवाहों और बचाव पक्ष के एक गवाह से जिरह की। खबर के अनुसार बचाव पक्ष के वकील ने कहा है कि वे फैसले के खिलाफ अपील दायर करेंगे। पर यह कहानी तो बहुत पुरानी नहीं है और सच यह है कि अभी बहुत सारे पुराने मामले लंबित है और न्याय बहुत दूर है। सरकार क्या कर रही है, पता नहीं पर आज ही नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, भारत अमरीका साझेदारी सबसे मजबूत।
आप जानते हैं कि हरियाणा और कश्मीर में चुनाव चल रहे हैं। सरकार यह दावा कर चुकी है कि कश्मीर घाटी में आतंकवादी घटना खत्म होने के कगार पर है। अखबारों में खबरें छप चुकी हैं। आज नवोदय टाइम्स में खबर है, अमितशाह ने कहा, पाकिस्तान डरता है मोदी से इसीलिये सीमा पर शांति। इसके साथ, आज ही सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, किश्तवाड़ में आतंकवादियों सुरक्षा बलों के बीच मुठभेड़। आप समझ सकते हैं कि चुनाव के समय आतंकवाद खत्म होने की ओर है का दावा करने के बावजूद मुठभेड़ जारी है। फिर भी गृहमंत्री कह रहे हैं कि पाकिस्तान मोदी से डरता है और इसलिये सीमा पर शांति है। यह 2019 चुनाव में घुसकर मारूंगा के दावे के बाद की स्थिति है और जाहिर है वोट लेने के लिए कही जा रही है। और यह अकेली कोशिश नहीं है।
नवोदय टाइम्स में ही आज एक खबर है, सिखों ने राहुल के खिलाफ सरकार को सौंपा मांग पत्र। इसके बराबर में दूसरी खबर का शीर्षक है, भाजपा झूठ फैला रही है, मुझे चुप कराना चाहती है : राहुल। आप जानते हैं कि राहुल गांधी पिछले दिनों अमेरिका में थे और वहां उन्होंने भारत में सिखों की संभावित स्थिति के बारे में जो कहा उसे लेकर गलतफहमी फैलाने की कोशिश की गई है उन्हें सिख विरोधी प्रचारित किया जा रहा है जबकि उन्होंने संबंधित वीडियो भी जारी किया है। मुझे लगता है कि ऐसे समय में अखबारों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण और जिम्मेदारी वाली है। आप देख रहे हैं कि खाद्यपदार्थ (यहां घी) में मिलावट के मामले को लड्डू या प्रसाद में मिलावट का मामला बना दिया गया और हिन्दुओं की आस्था से जोड़ दिया दिया। इसमें पूर्व राष्ट्रपति भी बयान दे रहे हैं और वह पहले पन्ने पर छप रहा है। इसी तरह राहुल गांधी का मामला है। उन्होंने जो कहा है वह भाजपा की राजनीति की पोल खोलता है और बचाव में भाजपा के पास कोई स्पष्टीकरण नहीं है तो वह उन्हें चुप कराना चाहती है। इसके लिए उनके खिलाफ तमाम उपाय हो रहे हैं और दादी जैसा हाल करने तथा जीभ काटने पर ईनाम जैसे मामलों में भी कार्रवाई नहीं हो रही है। अंग्रेजी अखबारों की लीड विदेशी मामलों की है और देसी मामलों में सारे अंग्रेजी अखबारों का हाल भी एक जैसा नहीं है इसलिए आज उन्हें रहने देता हूं।



