प्रियदर्शन-
जो पुरस्कार ममता जी को बीस साल पहले मिल जाना चाहिए था- वह अब मिला है। लेकिन साहित्य अकादेमी की पुरस्कार सूची को देखें तो पता चलता है कि यह अपवाद का मामला नहीं है- यही नियम है।
जब लेखक अपनी श्रेष्ठतम कृतियां लिख ले, जब वह अपने संघर्षों से पार पा चुका हो, तब अचानक उसके झोले में किसी पके फल सा यह पुरस्कार गिर पड़ता है। मुदुला गर्ग, रमेशचंद्र शाह, नंदकिशोर आचार्य, संजीव- सब इसी दुर्घटना के शिकार हुए हैं और अब ममता कालिया इसकी नई कड़ी भर हैं।
वैसे भी साहित्य अकादेमी इन दिनों अपना सम्मान खोती जा रही संस्था है- कई और संस्थाओं की तरह। इसके बावजूद अंतत: यह लेखकों की संस्था है और कभी इसका मिज़ाज और चरित्र बदलेगा, यह उम्मीद बिल्कुल बेमानी नहीं है। इस वजह से भी ममता कालिया के नाम इस सम्मान की घोषणा खुशी देती है।
बीते कुछ वर्षों से वे हिंदी के लोकवृत्त में अपनी सार्वजनिक उपस्थिति के साथ हिंदी की तमाम पीढ़ियों के लेखकों पर जो ममता लुटाती रही हैं, उसका कुछ हिस्सा मुझ तक भी आता रहा है। वे शायद लेखकों के बीच सबसे प्रिय और लोकप्रिय लेखकों में हैं। लेकिन मेरी खुशी की वजह दूसरी है।
अपनी किशोर उम्र से ही जिन लेखकों का गद्य मुझे अत्यंत प्रिय रहा है, उनमें ममता जी हैं। ऐसा विहंसता हुआ- वाग्मिता से भरा- गद्य हिंदी की कृत्रिम गुरु-गंभीर मुद्रा वाली कंकड़नुमा भाषा के बीच अलग तरह की राहत देता रहा है। उनमें विलक्षण क़िस्सागोई है।
उनके उपन्यासों ‘नरक दर नरक’ और ‘बेघर’ को सबसे पहले पढ़ा था। उन्हीं दिनों यह समझ में आया कि बड़ी सहजता से, हंसते-मुस्कुराते, ममता जी काफी गंभीर वैचारिक लेखन कर डालती हैं। कुछ लोगों को लगता है कि उनका लेखन बहुपरतीय नहीं है, लेकिन शायद इस बहुपरतीयता की उनको ज़रूरत भी नहीं है। वे बहुत भारी-भरकम पंक्तियां नहीं लिखतीं, बहुत गहन-गझिन वाक्य नहीं रचतीं, लेकिन एक उल्लसित और जगमग बतकही उनकी भाषा को बहुत जीवंत बनाती है। उनको अक्सर मालूम होता है- कौन सी बात कहां से शुरू करनी है, उसे किस तरह दिलचस्प बनाए रखना है।
उनकी कुछ कहानियां तो मुझे बेहद महत्वपूर्ण लगती हैं।
कभी इंडिया टुडे के किसी विशेषांक में उनकी एक कहानी छपी थी। कहानी में एक ब्राह्मण लड़का अपने लिए एससी का प्रमाण पत्र बनवा कर किसी बड़े इंजीनियरिंग संस्थान में दाख़िला ले लेता है। वहां वह पाता है कि उसकी प्रतिभा से सब अभिभूत हैं, उसकी दलित पहचान उसके सम्मान में आड़े नहीं आती। उसे लगता है कि यहां तो कोई जातिगत भेदभाव नहीं है। लेकिन जब वह एक लड़की से प्रेम करता और शादी की सोचता है तो पाता है कि उसकी ओढ़ी हुई जाति उसके आड़े आ गई। ममता कालिया ने यह कहानी तब लिखी थी जब प्रीमियर शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव के आरोप लगने शुरू नहीं हुए थे।
इसी तरह उनकी एक और कहानी किसी पत्रिका में छपी थी- बहुत नामालूम ढंग से। किसी काम से एक गांव गई एक अभिजात क़िस्म की महिला को वापसी में बहुत देर हो जाती है। अंधेरा हो चुका है और वह बस में घबराई सी बैठी है। तभी एक बेफ़िक्र सी गांव की महिला आती है और साथ बैठ जाती है। दोनों की बातचीत में पता चलता है कि वह महिला किसी भी नतीजे से डरने वाली नहीं है। यहां तक कि रेप के हौवे को भी वह अपने ऊपर हावी होने देने को तैयार नहीं है।
ममता जी खूब लिखती हैं, कभी-कभी लापरवाह भी दिखती हैं, लेकिन यह लापरवाही भी मुझे सुंदर लगती है। शायद इसलिए भी कि मैं भी एक लापरवाह लेखक ही हूं। बहुत लिखता हूं और इस बात की परवाह नहीं करता कि जो लिखूं, वह मास्टरपीस ही हो। गीतांजलि श्री ने अपने उपन्यास ‘रेत समाधि’ में एक जगह लिखा है कि स्त्रियों का लेखन सीटी-घंटी लेखन होता है। यानी वे प्रेशर कुकर की सीटी और आने-जाने वालों की कॉलबेल के बीच लिखती रहती हैं। ममता जी ऐसी ही लेखिका हैं- बगल में पकती रोटी के साथ वे कागज़ पर कहानियां पकाती रही हैं।
ममता जी की एक और ताक़त उनका वैचारिक खुलापन है। शायद उम्र ने, अनुभव ने या फिर पहले से चले आ रहे अभ्यास ने, इसमें एक और ताक़त जोड़ी है। वे अपनी बात पर मज़बूती से टिकी रहती हैं। विवादों से कतराती नहीं और कई बार असहमत होने को मजबूर करती हैं। क़रीब साल भर पहले एक ऐसा अवसर था जब मैंने ख़ुद को उनके रुख से असहमत ही नहीं, असंतुष्ट भी पाया, लेकिन इसके बावजूद उनकी शख्सियत में कुछ था जिसने मुझे उनसे जोड़े रखा। उनकी कृतियों ‘रवि कथा’ और ‘बार-बार इलाहाबाद’ में उनका खुलापन भी दिखता है और अपने ढंग से जिसे सच समझा, उसे कहने का साहस भी। हालांकि वे कभी भी जान-बूझ कर, सुनियोजित ढंग से कोई विवाद पैदा नहीं करतीं, लेकिन उनकी सहज शैली में कोई बात चली आए तो उसे रहने देती हैं।
हालांकि फिर दुहराने की इच्छा होती है कि एक संस्था के रूप में साहित्य अकादेमी की जिस तरह दुर्गति हुई है, उसे देखते हुए उसके किसी भी पुरस्कार का कोई अर्थ नहीं रह जाता। शायद यह हालत हिंदी के ज़्यादातर पुरस्कारों की होती जा रही है। फिर भी किसी अपने को ऐसा कोई सम्मान मिलता है तो अच्छा लगता है। ममता कालिया हमारे समय की शान हैं। वे 85 पार की हैं, लेकिन ख़ूब सक्रिय हैं। उन्होंने बीते दिनों एक कार्यक्रम में कहा कि उनकी उम्र में लोग न जाएं, उनके पास अब भी बहुत कहानियां बची हुई हैं।
तो अभी हमें मिलने वाली हैं और भी कहानियां। बार-बार इलाहाबाद लौटता रहेगा, बार-बार एक नई दुनिया खुलती रहेगी।



