Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

मार्क टली पादरी तो नहीं बन पाए लेकिन रिपोर्टर सबसे लायक साबित हुए!

दयाशंकर शुक्ला सागर-

अलविदा टली… 1998 में मार्क टली से जब मैं पहली बार लखनऊ में मिला तब पत्रकारिता में आए मुझे बमुश्किल छह साल हुए थे। तबतक टली शायद बीबीसी से इस्तीफा दे चुके थे। मैंने श्रद्धा से इस निडर और बेबाक पत्रकार के पांव छुए। उन्होंने मुझे उठाया और मेरे दुबले पतले शरीर को अपने चौड़े सीने से लगा लिया। तब उन्होंने पत्रकारिता की पहला सबक सिखाया। Write as you see it. Don’t let any other thoughts enter your mind. No personal relationships, no personal thoughts, no personal emotions. Let the truth be in its most brutal form. This is true journalism. यानी जैसा देखो वैसा लिखो। तब कोई दूसरा विचार मन में मत आने दो। न निजी संबंध, न निजी विचार, न निजी भावनाएं। सत्य को उसकी क्रूरतम अवस्था में अपनी लेखनी में स्थान दो। यही सच्ची पत्रकारिता है। यह सबक मैं कभी नहीं भूला।

टली नहीं रहे। कल उनकी मौत की खबर आई। मैं अस्पताल में था। एक छोटा-सा आपरेशन था। एनेस्थीसिया का असर दिमाग पर तारी था। टली का मुसकुराता हुआ चेहरा सामने आ गया। वह भारत के जनमानस और उनकी आत्मा को समझते थे। देश के सामाजिक तानेबाने को भी। इंदिरा गांधी के हत्यारे बेअंत सिंह जब मौके पर ही गोली मार दी गई तो मार्क ने लिखा- ‘विडम्बना देखिए, बेअंत सिंह एक मजहबी सिख था। अछूतों हरिजनों के वंश का। जिन्हें सिख पंथ में शामिल तो कर लिया गया लेकिन सिख सम्प्रदाय की प्रभावशाली जातियां उन्हें आज तक नीची निगाहों से देखती हैं।’

वे ब्रिटिश लहजे में अच्छी हिंदी बोलते थे। रेडियो पर गांव देहात में उनकी ईमानदार रिपोर्टिंग लोकप्रिय हो गई। उनकी आवाज़ लोग पहचानते थे। बरसो तक उनकी खबर ही अंतिम तौर पर प्रामाणिक मानी जाती रही थी। बीबीसी हिंदी सेवा को उन्होंने अलग पहचान दी। इसीलिए इंदिरा सरकार ने उन्हें पदम् श्री के लिए चुना।

कुरबान अली को दिए एक बेबाक इंटरव्यू में उन्होंने कहा वह पादरी बनना चाहते थे लेकिन बिशप साबह ने उनसे कहा तुम थोड़ा बदमाश आदमी हो। शराब पीते हो तुम पादरी के लायक नहीं। तो पादरी के लिए नालायक टली पत्रकारिता के लिए सबसे लायक रिपोर्टर साबित हुआ। अलविदा टली, आपको दिल की गहराइयों से मेरी श्रद्धान्जली


संदीप अग्रवाल-

अलविदा मार्क… एक दौर था, जब खबरों के लिए देश की जनता अखबारों के अलावा सिर्फ टीवी के समाचार बुलेटिन और आकाशवाणी की खबरों पर निर्भर रहा करती थी. दोनों पर सरकार का नियंत्रण था तो यह माना जाता था कि इन पर आने वाली खबरों पर भी सरकार का नियंत्रण रहता है. ऐसे में दो ही नाम लोगों की जुबां पर रहते थे एक तो बीबीसी और दूसरे मार्क ट्रुली… जिनके बारे में माना जाता था कि यहाँ खबर सबसे पहले आती है और सबसे भरोसेमंद होती है.

मार्क ट्रुली संभवत: देश के पहले ऐसे ​कॉरेसपॉन्डेंट थे, जिन्हें एक स्टार का दर्जा हासिल था. नवभारत टाइम्स के तत्कालीन फीचर प्रभारी विनोद भारद्वाज जी से, मेरा सपना के लिए मार्क का इंटरव्यू करने की इजाजत लेकर मैंने मार्क को फोन किया. उन्होंने अगले दिन का वक्त दे दिया.

अगले दिन जब मैं खोजते—खोजते मार्क के निजामुद्दीन ईस्ट स्थित बंगले पर पहुँचा तो वहाँ नेम प्लेट पर हिंदी में मार्क टल्ली लिखा देखकर शॉक लगा. आज तक उनका नाम मार्क ट्रुली ही सुनते—पढ़ते आए थे. लेकिन उनका घर था तो नाम गलत होने की संभावना न के बराबर थी. वैसे जानकारी के लिए बता दूँ कि उनका पूरा नाम सर विलियम मार्क टल्ली है.

बहरहाल, अंदर पहुँचा तो मार्क से मुलाकात हुई. करीब तीन दशकों तक भारत में बीबीसी के पयार्य रहे मार्क टल्ली सेवानिवृत्त हो चुके थे और एक फ्रीलांस ब्रॉडकास्टर के तौर पर मीडिया से जुड़े थे.

एक स्टार पत्रकार होने के नाते उनमें काफी एटिट्यूड होगा, सोचा तो यही था लेकिन आशंका के विपरीत उनका व्यवहार बेहद सौम्य, ​मिलनसारिता से भरपूर था और चेहरा काफी हँसमुख व शर्मीला. उन्होंने कहा कि आप तो बहुत यंग हैं. मैंने कहा कि आप फिक्र न करें, मैं उम्र में कम हूँ, लेकिन आपको निराशा नहीं होगी. तो उन्होंने झेंपते हुए कहा कि वे शिकायत नहीं तारीफ कर रहे थे.

इंटरव्यू शुरू हुआ. बहुत सारे सवाल—जवाब हुए. ​वे ब्रिटिश होते हुए भी किसी भी आम भारतीय जितनी ही भारतीयता से भरपूर थे. उस समय इंडिया वर्सेज भारत का जुमला पैदा नहीं हुआ था, इसलिए जब उन्होंने कहा कि उनकी ख्वाहिश हिंदुस्तान को फिर से भारत के रूप में देखने की है तो मैं चकित हुआ कि दोनों में फर्क क्या है. उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत से उनका आशय ऐसे देश से है, जो पाश्चात्य संस्कृति का अनुसरण न करते हुए अपनी संस्कृति पर गर्व करे और इतना प्रगति करे कि उसे किसी भी चीज के लिए दूसरों की ओर न देखना पड़े, बल्कि दूसरे उसकी ओर देखें.

उनकी बहुत सारी बातों ने मुझे चकित किया, जैसे कि जवानी के दिनों में एक तरफ तो हर समय सेक्स और शराब के बारे में सोचते रहते थे और दूसरी तरफ एक पादरी बनने का सपना भी देखते थे. जो उनके शौकों की वजह से साकार नहीं हो पाया. मैंने जब उनसे पूछा कि क्या उनके सपनों में भी सेक्स होता है तो उन्होंने कुछ कहने के लिए मुंह खोला फिर एकाएक संभल कर बोले कि मैं इस बारे में कुछ नहीं बताऊंगा, तुम पत्रकार लोग बहुत बदमाश होते हो.

खैर, उनके साथ एक बेहतरीन और बेहद संजीदा इंटरव्यू करने के बाद मुझे वह खुशी हासिल हुई जो बहुत कम लोगों के साथ हुई है. इंटरव्यू लिखकर जब मैं नवभारत टाइम्स ले गया तो वहाँ भी उनका सरनेम देखकर सबको बहुत हैरानी हुई कि कहीं मैंने गलती से ट्रुली को टल्ली तो नहीं लिख दिया. लेकिन, जब मैंने उनकी नेमप्लेट का हवाला दिया तो फिर उन्होंने भी इसे टल्ली ही छापा. शायद यह पहली बार था, जब किसी अखबार ने हिंदी में उनका नाम सही छापा था.

इंटरव्यू छपा, काफी सराहा गया. मार्क को बताने के लिए फोन किया तो उनकी पार्टनर ने फोन उठाया. उन्होंने कहा कि मार्क तो आउट ऑफ टाउन हैं, लेकिन जब उन्हें इंटरव्यू के बारे में बताया तो वह बोलीं कि मार्क रात को वापस आ जाएंगे. उन्होंने कहा कि उन्हें पता चल गया था और उन्होंने पेपर मंगा कर रख लिया था.

मार्क से दूसरी मुलाकात कुछ दिनों बाद हुई. इस बार मेरे साथ मेरे सहपाठी और अभिन्न मित्र अखिलेश शर्मा, जो अभी एनडीटीवी में पॉलिटिकल एडिटर हैं, भी थे. हम दोनों रेडियो के लिए यंग—तरंग नाम की एक मैगजीन प्लान कर रहे थे. हम इसे विविध भारती को देना चाहते थे, लेकिन वहाँ पहले से युवमंच चल रहा था. इसलिए हमने सोचा कि मार्क से मिलकर देखते हैं, जो तब तक टाइम्स के एफएम चैनल से जुड़ चुके थे. हमें लगा कि शायद वे वहाँ इसे फिट करवा दें.

मार्क का समय लेकर हम एक बार फिर उनके घर जा धमके. पहले की तरह इस बार भी वे बहुत प्यार और सहयोग भाव से पेश आए. मैगजीन की चर्चा चली, हमने उन्हें कॉन्सेप्ट नोट दिखाया तो उन्होंने बड़ी ईमानदारी से कहा कि आपके सारे आइडिया अलग—अलग तो अच्छे हैं, लेकिन एक साथ बहुत हौचपौच हो रहा है. टाइम्स एफएम पर इसकी शुरुआत की गुंजाइश से उन्होंने इंकार कर दिया और बताया कि उनके सारे ऑपरेशन बहुत मनीमाइंडेड होते हैं, इसलिए हमें आकाशवाणी पर ही कोशिश करनी चाहिए.

उनसे विदा लेकर हम मायूसी के साथ बाहर आ गए और यंग तरंग का आगे बढ़ाने का आइडिया वहीं ड्रॉप कर दिया.

आज पद्मश्री व पद्मभूषण मार्क हमारे बीच नहीं हैं. लेकिन सच्ची और निर्भीक पत्रकारिता की जो मशाल वो आजीवन थामे रहे, वह कभी न बुझने पाए, ये हम सब की साझा जिम्मेदारी है। खासकर ऐसे दौर में, जब मीडिया की विश्वसनीयता शून्य से भी नीचे है, हम मार्क के होने का महत्व, और न होने का नुकसान समझ सकते हैं.


खुशदीप सहगल-

अंग्रेज़ होते हुए भी उन्होंने भारत को कर्मभूमि बनाया, घर बनाया. भारत को अच्छी तरह समझने के लिए हिन्दी सीखी. लंबे अरसे तक बीबीसी से जुड़े रहे दिग्गज पत्रकार मार्क टुली का 90 साल की उम्र में निधन हो गया. वो दिल्ली के निज़ामुद्दीन इलाके में रहते थे…

बीबीसी के मुताबिक, सर विलियम मार्क टुली ने रविवार (25 जनवरी, 2026) को नई दिल्ली में आखिरी सांस ली. मार्क टुली वो पत्रकार थे, जिन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के मुकदमे से लेकर भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या तक को कवर किया…

मार्क टुली 10 साल तक BBC के नई दिल्ली में संवाददाता और फिर 20 साल तक ब्यूरो प्रमुख रहे. 24 अक्टूबर 1935 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में एक ब्रिटिश परिवार में जन्मे, टुली ने अपनी रिपोर्टिंग से दक्षिण एशिया की प्रमुख घटनाओं को कवर किया. उन्हें 1992 में पद्म श्री और 2005 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया…

उनकी शुरुआती शिक्षा दार्जिलिंग के एक बोर्डिंग स्कूल में हुई. बाद में इंग्लैंड के मार्लबोरो कॉलेज और कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी हॉल से उन्होंने उच्च शिक्षा ली…

पत्रकारिता में आने से पहले, वो पादरी बनना चाहते थे. मार्क टुली 1964 में BBC से जुड़े और 1965 में भारत के संवाददाता बनकर आए. दिल्ली के ब्यूरो प्रमुख के रूप में उन्होंने 1994 में इस्तीफा दिया। उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार और भोपाल गैस त्रासदी जैसी कई प्रमुख घटनाओं को कवर किया।

टुली ने दक्षिण एशिया और भारत पर कई पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें ‘No Full Stops in India’, ‘India in Slow Motion’ (गिलियन राइट के साथ), और ‘The Heart of India’ प्रमुख है…

बीबीसी छोड़ने के बाद वे दिल्ली में एक स्वतंत्र पत्रकार और लेखक के रूप में काम करते रहे…

मार्क टुली को 2002 में ब्रिटिश सरकार ने नाइटहुड (KBE) से सम्मानित किया…

मार्क टुली को भारत के प्रति उनके गहरे लगाव और पत्रकारिता में निष्पक्षता के लिए हमेशा याद किया जाएगा. ख़ास तौर पर आज जिस तरह की चाटुकार पत्रकारिता है, उसमें नवांकुर पत्रकारों को मार्क टुली के जीवन से सीखने के लिए बहुत कुछ है…

संबंधित खबर…

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन